वंदे मातरम पर सियासी संग्राम तेज, अमित शाह ने कांग्रेस पर लगाया तुष्टीकरण का आरोप; 1937 के फैसले को लेकर छिड़ी बहस

वंदे मातरम को लेकर BJP और कांग्रेस के बीच सियासी विवाद बढ़ गया है। अमित शाह ने कांग्रेस के सिर्फ दो अंतरे गाने के फैसले को तुष्टीकरण से जोड़ते हुए निशाना साधा है, जबकि कांग्रेस ने अपने फैसले के लिए 1937 के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला दिया है।

राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कांग्रेस के उस फैसले पर तीखा हमला बोला, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत की शुरुआती दो पंक्तियों/अंतरों को ही गाने का फैसला किया है। शाह ने इसे तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस के रुख को ‘राष्ट्रविरोधी’ बताया।

कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को फैसला किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। पार्टी ने इसके लिए 1937 में लिए गए अपने पुराने फैसले का हवाला दिया है। कांग्रेस का कहना है कि वह उसी ऐतिहासिक निर्णय का पालन कर रही है, जबकि बीजेपी इसे मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में तुष्टीकरण की नीति की वापसी बता रही है।

अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना

अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि राष्ट्रगीत को केवल दो अंतरों तक सीमित करना तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। उन्होंने 1937 के कांग्रेस के फैसले को मौजूदा विवाद से जोड़ते हुए कहा कि पार्टी ने उस समय राष्ट्रगीत को लेकर समझौता किया था और अब उसी निर्णय को दोबारा लागू कर रही है।

शाह ने यह भी कहा कि देश में तुष्टीकरण की राजनीति को आगे बढ़ने नहीं दिया जाएगा। बीजेपी ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएगी और राजनीतिक मंचों पर भी कांग्रेस के फैसले का विरोध करेगी।

हालांकि, कांग्रेस के 1937 के फैसले को सीधे तौर पर देश के विभाजन की वजह बताना अमित शाह का राजनीतिक आरोप है। ऐतिहासिक रूप से 1937 में कांग्रेस के भीतर ‘वंदे मातरम’ के किन हिस्सों को सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों में गाया जाए, इस पर बहस हुई थी। इसलिए इस मुद्दे को राजनीतिक आरोप और ऐतिहासिक घटनाक्रम—दोनों अलग-अलग स्तरों पर समझना जरूरी है।

कांग्रेस ने 1937 के फैसले को बनाया आधार

कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने हालिया फैसले में 1937 के उस रुख को आधार बनाया, जिसके तहत ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो अंतरों को सार्वजनिक आयोजनों के लिए स्वीकार किया गया था। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं द्वारा उस समय लिए गए निर्णय का ही पालन कर रही है।

1937 का विवाद केवल राजनीतिक नहीं था। ‘वंदे मातरम’ के बाद के अंतरों में देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक संदर्भों को लेकर आपत्तियां उठी थीं। ऐतिहासिक दस्तावेजों और बाद की व्याख्याओं के अनुसार, कांग्रेस के भीतर यह विचार था कि ऐसे हिस्सों से अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच असहजता पैदा हो सकती है। इसी पृष्ठभूमि में शुरुआती दो अंतरों को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए उपयुक्त माना गया।

यही पुराना फैसला अब 2026 में एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है।

BJP ने बताया ‘वोट बैंक की राजनीति’

बीजेपी ने कांग्रेस के फैसले को राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि राष्ट्रगीत से जुड़े निर्णय ने पार्टी की राजनीतिक सोच पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कांग्रेस की तुलना मुस्लिम लीग से भी की, जिससे विवाद और तीखा हो गया है।

बीजेपी का तर्क है कि ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है और इसे अधूरा गाने का निर्णय राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व को कम करता है।

कांग्रेस दूसरी तरफ इसे ऐतिहासिक परंपरा और अपने 1937 के निर्णय की निरंतरता के रूप में देख रही है। पार्टी का कहना है कि शुरुआती दो अंतरों का चयन किसी राष्ट्रविरोधी भावना के कारण नहीं, बल्कि उस समय विभिन्न समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखकर किया गया था।

स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम से शुरू हुआ विवाद

‘वंदे मातरम’ को लेकर मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता दिवस के दौरान कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम से जुड़ी है। बीजेपी ने आरोप लगाया था कि वहां राष्ट्रगीत के गायन के दौरान कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इसे रोकने का संकेत दिया।

बीजेपी ने इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के अपमान का आरोप लगाया। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। पार्टी की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी का इशारा गीत रोकने के लिए नहीं था, बल्कि लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने से संबंधित था।

इस घटना के बाद दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए और मामला कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक तक पहुंच गया।

केंद्र के नए प्रोटोकॉल ने बढ़ाई बहस

वंदे मातरम पर यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत को लेकर नया आधिकारिक प्रोटोकॉल तैयार किया है। संसद में 2026 में पेश किए गए संशोधन विधेयक में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधानों के दायरे में लाने और इसके गायन को बाधित करने पर सजा का प्रावधान प्रस्तावित किया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित प्रावधान में तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।

इसका मतलब यह है कि इस मुद्दे को केवल राजनीतिक बहस के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि राष्ट्रगीत के कानूनी संरक्षण को लेकर भी केंद्र और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए हैं।

केंद्र के नए प्रोटोकॉल में आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ के क्रम को लेकर भी निर्देश दिए गए हैं। दोनों गाए जाने की स्थिति में पहले ‘वंदे मातरम’ और उसके बाद राष्ट्रगान का प्रावधान रखा गया है।

‘वंदे मातरम’ का ऐतिहासिक महत्व

‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया था।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम’ देशभक्ति और ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का लोकप्रिय नारा बन गया। 1950 में इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मान दिया गया और ‘जन गण मन’ के साथ इसे समान सम्मान दिए जाने की व्यवस्था की गई।

यही वजह है कि राष्ट्रगीत के स्वरूप और इसके सार्वजनिक गायन का मुद्दा आज भी राजनीतिक और भावनात्मक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।

1937 के फैसले और विभाजन के बीच संबंध पर बहस

अमित शाह ने 1937 के फैसले को दो-राष्ट्र सिद्धांत और बाद के विभाजन से जोड़ते हुए कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इतिहासकारों के बीच भारत के विभाजन के कारणों को लेकर व्यापक और बहुस्तरीय चर्चा रही है। इसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियां, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद, सांप्रदायिक राजनीति और 1940 के दशक की परिस्थितियां जैसे कई कारक शामिल रहे।

इसलिए 1937 में ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो अंतरों को स्वीकार करने के फैसले को सीधे तौर पर विभाजन का एकमात्र कारण बताना एक राजनीतिक व्याख्या है, न कि ऐसा निर्विवाद ऐतिहासिक निष्कर्ष जिस पर सभी सहमत हों।

आगे और बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव

‘वंदे मातरम’ को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच शुरू हुई बहस आने वाले दिनों में और तेज होने के आसार हैं। बीजेपी इसे राष्ट्रवाद और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस अपने फैसले को 1937 की ऐतिहासिक परंपरा और तत्कालीन नेताओं के निर्णय से जोड़कर देख रही है।

एक तरफ बीजेपी कांग्रेस पर राष्ट्रगीत के सम्मान से समझौता करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि उसके फैसले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। ऐसे में ‘वंदे मातरम’ अब सिर्फ एक राष्ट्रगीत से जुड़े प्रोटोकॉल का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और वोट बैंक की राजनीति के बीच नई राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर दोनों दलों के बीच टकराव और बढ़ने की संभावना है।