भोपाल।
राजधानी के ईदगाह हिल्स स्थित चर्चित केसर बंगला एक बार फिर विवाद के केंद्र में है।
एक सामाजिक कार्यकर्ता ने इसे सरकारी संपत्ति बताते हुए अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की है।
इस संबंध में मध्यप्रदेश जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई गई है।
शिकायत के आधार पर मामले को जांच के लिए लिया गया है।
दूसरी ओर, बंगले में रह रहे बदरे आलम के परिवार ने इसे अपनी निजी संपत्ति बताया है।
परिवार का कहना है कि वे कई पीढ़ियों से यहां निवास कर रहे हैं।
इस बीच, संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े एक मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले ने विवाद को फिर चर्चा में ला दिया है।
हालांकि, इस फैसले के आधार पर संपत्ति पर तत्काल किसी पक्ष का अंतिम कब्जा या अतिक्रमण सिद्ध हो गया है,
ऐसा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
संपत्ति के अधिकार और सरकारी दावे से जुड़े प्रश्न अलग कानूनी प्रक्रिया के विषय हैं।
1956 से जुड़ा है बंगले का इतिहास
(वर्ष 1956 में केसर बंगले का स्वरूप कुछ इस तरह था।)
भोपाल के जिला बनने के बाद वर्ष 1956 में बदरे आलम को यहां कलेक्टर पद पर पदस्थ किए जाने का उल्लेख मिलता है।
विवादित संपत्ति को लेकर राज्य सरकार का पक्ष रहा है कि बदरे आलम को यह बंगला रहने के लिए आवासीय अनुमति अथवा लाइसेंस के आधार पर दिया गया था।
सरकार का तर्क है कि यह स्वामित्व का अधिकार नहीं था।
हालांकि, परिवार की ओर से संपत्ति के निजी होने और पुराने पारिवारिक अधिकार का दावा किया जाता रहा है।
इसी विरोधाभास के कारण यह विवाद वर्षों से न्यायालय और प्रशासनिक स्तर पर अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा है।
मालिकाना हक को लेकर अदालत तक पहुंचा मामला
संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा करते हुए सरवत जहां बेगम ने वर्ष 1989 में मध्यप्रदेश शासन और लोक निर्माण विभाग के खिलाफ दीवानी वाद दायर किया था।
उनका पक्ष था कि संपत्ति पर उनका वैध अधिकार है।
दावा परिवार और तत्कालीन भोपाल रियासत से जुड़े संबंधों तथा पुराने दस्तावेजों के आधार पर किया गया।
वादी पक्ष ने यह भी कहा था कि संपत्ति उन्हें पारिवारिक व्यवस्था और मौखिक हिबा के माध्यम से मिली।
बाद में इस दावे को मजबूत करने के लिए पुराने दस्तावेज, निकाहनामा और वंशावली से संबंधित सामग्री भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।



