चमत्कार! क्रेन-JCB भी फेल, टस से मस नहीं हुई हनुमान प्रतिमाअब होगी स्कैनिंग

उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के लिए 8 फीट ऊंची खड़े हनुमान प्रतिमा को हटाने की चार कोशिशें नाकाम रहीं। अब स्कैनिंग के बाद अगला फैसला होगा।

उज्जैन।

महाकाल की पावन नगरी   उज्जैन    में सड़क चौड़ीकरण की जद में आया प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर एक बार फिर चर्चा में है।

मंदिर का मुख्य ढांचा हटाया जा चुका है।

लेकिन करीब 8 फुट ऊंची हनुमान प्रतिमा अब भी अपनी जगह कायम है।

इसे हटाने के लिए प्रशासन और नगर निगम ने चार दिनों में चार बार कोशिश की।

क्रेन और जेसीबी तक लगाई गईं।

इसके बावजूद प्रतिमा टस से मस नहीं हुई।

अब प्रशासन ने जल्दबाजी से कदम पीछे खींच लिए हैं।

विशेषज्ञों की सलाह के बाद भारी मशीनों से प्रतिमा हटाने का काम फिलहाल रोक दिया गया है।

🔱 मशीनें फेल, अब विज्ञान का सहारा

दरअसल, प्रतिमा को नुकसान पहुंचने की आशंका है।

ज्यादा दबाव पड़ने पर इसमें दरार आ सकती है।

प्रतिमा खंडित भी हो सकती है।

इसलिए अब इसे जबरदस्ती हटाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से जांचने की तैयारी है।

प्रतिमा के आधार और आसपास की जमीन की अत्याधुनिक स्कैनिंग कराई जाएगी।

इससे पता चलेगा कि प्रतिमा जमीन के भीतर किस तरह स्थापित है।

रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की तकनीक तय होगी।

इसके साथ ही सुरक्षित विस्थापन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सलाह भी ली जा रही है।

🛣️ सड़क चौड़ीकरण की जद में आया 170 साल पुराना मंदिर

कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है।

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सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के लिहाज से इसे अहम परियोजना माना जा रहा है।

इसी चौड़ीकरण की जद में करीब 170 साल पुराना खड़े हनुमान मंदिर आया है।

मंदिर का मुख्य ढांचा और गर्भगृह हटाया जा चुका है।

अब प्रतिमा को सुरक्षित स्थानांतरित करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

फिलहाल प्रतिमा को कैनोपी और टेंट के नीचे सुरक्षित रखा गया है।

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🪨 बेसाल्ट की प्रतिमा होने का दावा

 

विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक,

प्रतिमा मालवा क्षेत्र में मिलने वाले मजबूत बेसाल्ट पत्थर से बनी हो सकती है।

उन्होंने इसे परमार काल और राजा भोज की मूर्तिकला परंपरा से जोड़ने की संभावना भी जताई है।

हालांकि, प्रतिमा पर सिंदूर की मोटी परत है।

इस वजह से इसकी मूल बनावट साफ दिखाई नहीं देती।

ऐसे में इसकी वास्तविक उम्र और ऐतिहासिक काल तय करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी माना जा रहा है।

📜 1857 से पहले का बताया जाता है इतिहास

स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के मुताबिक, मंदिर का इतिहास करीब 170 साल पुराना है।

कुछ दावे इसे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पहले के दौर से जोड़ते हैं।

यही वजह है कि स्थानीय नागरिकों का एक वर्ग मंदिर को पूरी तरह हटाने

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के बजाय उसी स्थान पर भव्य मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग कर रहा है।

ऐसे में प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है।

एक तरफ सड़क चौड़ीकरण और सिंहस्थ की तैयारियां हैं।

दूसरी तरफ धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत को बचाने का सवाल है।

🐒 प्रतिमा देखने उमड़ी भीड़

प्रतिमा हटाने की कोशिशों की खबर फैलते ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई।

कई लोग प्रतिमा के नहीं हिलने को आस्था और चमत्कार से जोड़कर देख रहे हैं।

हालांकि, प्रशासन और विशेषज्ञों का जोर फिलहाल वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके पर है।

इसी बीच रविवार को मंदिर परिसर और आसपास की छतों पर

50 से ज्यादा वानरों के पहुंचने का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

इसके बाद धार्मिक चर्चाएं और तेज हो गईं।

🔍 अब स्कैनिंग रिपोर्ट पर फैसला

चार प्रयास विफल होने के बाद प्रशासन ने फिलहाल प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाला कोई और प्रयोग नहीं करने का फैसला किया है।

अब विशेषज्ञ जांच करेंगे।

स्कैनिंग होगी।

फिर रिपोर्ट आएगी।

इसके बाद तय होगा कि प्रतिमा को स्थानांतरित किया जाए या कोई दूसरा विकल्प अपनाया जाए।

फिलहाल 8 फुट की प्रतिमा अपनी जगह सुरक्षित है।

और अब अगला फैसला मशीनें नहीं, विशेषज्ञों की रिपोर्ट तय करेगी।

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