मध्य प्रदेश के पोषण आहार संयंत्र: अब नैफेड की ओट में कर्नाटक की निजी फर्म को सौंपने की तैयारी

रवि अवस्थी, भोपाल।
घपले–घोटालों के चलते करीब 279 करोड़ के घाटे में पहुंचे मध्य प्रदेश के सातों पोषण आहार संयंत्रों को राज्य सरकार एक बार फिर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है।

इस बार सीधे निजी कंपनी को जिम्मेदारी देने के बजाय नैफेड के जरिए काम कराने का रास्ता चुना गया है, ताकि फैसले पर उठने वाले विवादों से बचा जा सके।

सूत्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था के तहत कर्नाटक की निजी फर्म राशि फूड्स को संयंत्रों के संचालन से जोड़े जाने की तैयारी है।

महिला एवं बाल विकास विभाग की टीम दो बार कर्नाटक जाकर फर्म की व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर चुकी है और रिपोर्ट शासन को सौंपी जा चुकी है।

यह भी पढ़ें..  तबादलों की मिडनाइट सर्जरी

नैफेड की व्यवस्था का भी किया अवलोकन
सूत्रों के मुताबिक,महिला एवं बाल विकास की टीम ने हाल ही में नईदिल्ली व कानपुर पहुंचकर नैफेड के कामकाज का भी अवलोकन किया।

यह कदम,मप्र के संयंत्रों के एक बार फिर निजीकरण की खबर लीक होने के बाद उठाया गया। जबकि इससे पहले संयंत्रों को राशि फूड्स को सौंपे जाने की पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है।

कुपोषण के नाम पर भ्रष्टाचार की लंबी कहानी

कुपोषित बच्चों के लिए अमृत माने जाने वाले पोषण आहार की व्यवस्था मध्य प्रदेश में शुरुआत से ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रही है। साल 2022 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में 110 करोड़ रुपये से अधिक के फर्जीवाड़े का खुलासा किया था।

रिपोर्ट में बताया गया था कि जिन संयंत्रों से पोषण आहार की ढुलाई ट्रकों से होना दर्शाई गई, जांच में वे वाहन बाइक और ऑटो के निकले। नतीजतन, पोषण आहार न तो संयंत्र से बाहर आया और न ही गोदामों में पाया गया।

यह भी पढ़ें..  महाकाल वन मेला:आस्था के शहर में—-

महिला समूहों का प्रयोग भी साबित हुआ दिखावा

ये वही अत्याधुनिक संयंत्र हैं, जिन्हें साल 2021 में एमपी एग्रो कॉरपोरेशन से वापस लेकर स्व-सहायता समूहों के परिसंघों को सौंपा गया था। दावा किया गया था कि महिलाओं की भागीदारी से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।

हकीकत यह रही कि संयंत्रों का संचालन निजी तकनीशियनों और सरकारी अफसरों के हाथों में ही रहा। समूह परिसंघ कागजों तक सिमट गए और उनसे जुड़ी महिलाएं संयंत्रों में मजदूर बनकर रह गईं।

बदलाव भी नहीं रोक सका भ्रष्टाचार

देश में कुपोषण समाप्त करने के लिए 1975 में एकीकृत बाल विकास योजना लागू की गई थी। मध्य प्रदेश में बीते एक दशक में ही इस योजना का सालाना बजट 1200 करोड़ रुपये से अधिक रहा, लेकिन यह योजना भ्रष्टाचारियों के लिए चारागाह बनती चली गई।

शिवराज सरकार के तीसरे कार्यकाल में लगे आरोपों के बाद लंबी जांच हुई और संयंत्रों का संचालन निजी हाथों से लेकर एमपी एग्रो को सौंपा गया।

यह भी पढ़ें.. उद्योग की जमीन पर आस्था का विस्तार

निजी कंपनियों को बाहर रखने का था फैसला

साल 2019 में राज्य मंत्रिपरिषद ने तय किया था कि एमपी एग्रो किसी भी निजी कंपनी को पोषण आहार निर्माण का काम नहीं देगा। एक अंतरविभागीय समिति निगरानी करेगी और महिला एवं बाल विकास विभाग सीधे सप्लाई ऑर्डर जारी करेगा।

आजीविका मिशन के हाथ आए संयंत्र

इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव ने हाईकोर्ट में शपथ पत्र तक दिया, लेकिन दो साल बाद ही संयंत्रों को देवास, धार, नर्मदापुरम, मंडला, सागर, शिवपुरी और रीवा में आजीविका मिशन से जुड़े समूहों को सौंप दिया गया।

आधुनिकीकरण के नाम पर मिशन को करीब 400 करोड़ रुपये का बजट दिया गया और तीन महीने के अग्रिम भुगतान की व्यवस्था शुरू की गई, जो आज भी जारी है।

279 करोड़ के घाटे में फिसले सभी संयंत्र

इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद कोई भी संयंत्र घाटे से नहीं उबर सका। सूत्रों के अनुसार, बीते चार वर्षों में किसी भी संयंत्र ने अपनी कुल उत्पादन क्षमता का आधा भी उपयोग नहीं किया।

काम 30-40 प्रतिशत और खर्च सौ प्रतिशत-कच्चे माल की अफरा-तफरी और फर्जी परिवहन पर निगरानी का अभाव गड़बड़ियों की बड़ी वजह बना।

अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश के सातों संयंत्र 31 मार्च 2025 की स्थिति में करीब 267 करोड़ की घाटे में थे।

आगामी 31 मार्च तक इसमें करीब 12 करोड़ की वृद्धि होने के आसार हैं। इस तरह,आगामी 31 मार्च तक इन संयंत्रों का घाटा 279 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
विरोध के बाद बदली रणनीति

सूत्र बताते हैं कि पहली निरीक्षण टीम में शामिल कुछ महिला अधिकारी निजी फर्म को संयंत्र सौंपने के पक्ष में नहीं थीं।

इसके बाद विभाग प्रमुख और आयुक्त स्तर पर बदलाव कर नई टीम गठित की गई, जिसने दूसरी रिपोर्ट सौंपी।

नैफेड बना ‘बीच का रास्ता’

शुरुआत में विभागीय मंत्री भी प्रबंधन व्यवस्था बदलने के पक्ष में नहीं थीं, लेकिन विरोध को देखते हुए उच्चस्तरीय समीक्षा में तय किया गया कि संयंत्र सीधे राशि फूड्स को न देकर नैफेड के माध्यम से सौंपे जाएं।
बताया जाता है कि इसी कारण राशि फूड्स ने हाल ही में नैफेड में अपना पंजीयन भी करा लिया है। सूत्रों का दावा है कि जल्द ही यह प्रस्ताव कैबिनेट बैठक में लाया जा सकता है।

इस संबंध में महिला एवं बाल विकास विभाग के वित्तीय सलाहकार पंकज मोहन ने कहा कि वह सिर्फ पहली ट्रिप में कर्नाटक गए थे।इस मामले में आगे के डेवलपमेंट की जानकारी उन्हें नहीं है।

नैफेड स्वयं नहीं बनाता पोषण आहार
नैफेड(नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया) मुख्यत:खाद्य सामग्रियों का भंडारण,मार्केटिंग,फूड प्रोसेसिंग या वितरण का काम करता है। वह स्वयं पोषण आहार तैयार नहीं करता।उसकी सहयोगी संस्थान ये काम करते हैं। भविष्य में राशि फूड्स भी इनमें एक हो सकती है। जो मप्र के लिए काम करेगी।
नैफेड संचालित केंद्र इन स्थानों पर हैं—
उत्तर भारत
•आजादपुर, नई दिल्ली
• जयपुर (राजस्थान)
• पंचकुला (हरियाणा–पंजाब क्षेत्र)
• लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
इन केंद्रों में गोदाम/प्रसंस्करण सुविधाएँ

दक्षिण भारत
• बंगलोर (कर्नाटक)
• कोच्चि (केरल)
• हैदराबाद (तेलंगाना/आंध्र)
• चेन्नई (तमिलनाडु)
• विजयवाड़ा (आंध्र)

पूर्व भारत
• कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
• पटना (बिहार)
• गुवाहाटी (असम)
• भुवनेश्वर (ओडिशा)

पश्चिम भारत
• मुंबई (महाराष्ट्र)
• भोपाल (मध्य प्रदेश)
• नासिक (महाराष्ट्र)
• अहमदाबाद (गुजरात)

इन शाखाओं के अधीन गोदाम/औद्योगिक इकाइयाँ
• NAFED Warehousing Complex, लखनऊ (UP)
• NAFED Krishi Yantra Udyog — भिवाड़ी (राजस्थान)
• गोदाम एवं प्रसंस्करण इकाइयाँ — संगरगाँगर, भरतपुर (राजस्थान)
• NAFED Kinnow Grading & Waxing Plant — अबोहर (पंजाब)
• NAFED Raichur Godown — Raichur (कर्नाटक)

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *