महाकाल वन मेला:आस्था के शहर में वन,आयुर्वेद और रोजगार का संगम

उज्जैन।
उज्जैन के दशहरा मैदान में लगा ‘महाकाल वन मेला’ सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि वन संपदा, आयुर्वेद और जनजातीय आजीविका को एक मंच पर लाने की कोशिश बनकर उभरा है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे पर्यावरण जागरूकता के साथ स्थानीय वनोपज को बाजार देने की पहल बताया।

मेले में जड़ी-बूटियों से लेकर बांस शिल्प, प्राकृतिक रंग-गुलाल और नि:शुल्क आयुर्वेदिक परामर्श तक सब कुछ एक ही परिसर में उपलब्ध है।

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वन मेले से बाजार तक जनजातीय उत्पाद

मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे वन मेले जनजातीय समुदायों को अपने वनोत्पाद और काष्ठ शिल्प बेचने का सीधा अवसर देते हैं।

मप्र लघु वनोपज संघ के माध्यम से 30 लाख से अधिक संग्राहकों को लाभ मिल रहा है। उज्जैन मेले में 250 स्टॉल लगाए गए हैं।

आयुर्वेद, जड़ी-बूटियां और नि:शुल्क परामर्श

मेले में 150 से अधिक वैद्य और आयुर्वेदिक चिकित्सक मौजूद हैं। जड़ी-बूटियां, लघु वनोपज और पारंपरिक उपचार पद्धतियां नागरिकों को प्राकृतिक चिकित्सा की ओर आकर्षित कर रही हैं। ‘महाकाल वन प्रसादम्’ और विंध्य हर्बल के प्राकृतिक रंग-गुलाल जैसे उत्पाद भी लॉन्च किए गए।

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उज्जैन में आयुर्वेद संस्थान के प्रयास

मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्रीय बजट-2026 में घोषित तीन अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों में से एक को उज्जैन में स्थापित करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। प्रदेश में आयुर्वेदिक कॉलेजों की संख्या भी तेजी से बढ़ाई जा रही है।

पर्यावरण, आस्था और आजीविका का साझा मंच

महाशिवरात्रि और विक्रमोत्सव के अवसर पर लगा यह मेला आस्था के शहर में पर्यावरण और रोजगार को जोड़ता दिखा। वन विभाग की पहल से तैयार ‘काष्ठ गमले में पौधा’ जैसे नवाचार भी आकर्षण का केंद्र बने।

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सरकार की मंशा: हर शहर में वन मेला

वन विभाग के अधिकारियों ने संकेत दिए कि भोपाल और उज्जैन की तर्ज पर प्रदेश के अन्य शहरों में भी वन मेले लगाए जाएंगे, ताकि शहरी उपभोक्ताओं को प्राकृतिक उत्पाद और जनजातीय समुदायों को स्थायी बाजार मिल सके।

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