जस्टिस वर्मा नहीं बता पाए,कहां से आई नोटों की बोरी,आरोप साबित

सरकारी आवास के स्टोररूम में मिली नकदी के मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें बढ़ गईं। संसदीय जांच समिति ने बेहिसाब कैश, सबूतों से छेड़छाड़ और भ्रामक जवाबों से जुड़े तीनों आरोप साबित माने।

नई दिल्ली।

सरकारी आवास के स्टोररूम में मिले नोटों की बोरी आखिर आई कहां से?

इस सवाल का संतोषजनक जवाब जस्टिस यशवंत वर्मा नहीं दे सके।

संसद की जांच समिति ने इसी मामले में उनके खिलाफ लगे तीनों आरोपों को सही पाया है।

मामला सिर्फ बड़ी मात्रा में नकदी मिलने तक सीमित नहीं रहा।

जांच में आग लगने के बाद सबूतों के सुरक्षित नहीं रखे जाने और जस्टिस वर्मा के जवाबों पर भी गंभीर सवाल उठे।

समिति ने तीनों बिंदुओं पर आरोप साबित माने।

बुधवार, 12 अगस्त को समिति की रिपोर्ट लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई।

रिपोर्ट ने उस पूरे मामले की परतें खोल दीं,

जिसमें सरकारी आवास के स्टोररूम में ₹500 के नोटों के बंडल और अधजली नकदी मिलने की बात सामने आई थी।

सबसे बड़ा सवाल, नकदी किसकी थी?

जांच समिति के सामने सबसे अहम सवाल यही था कि स्टोररूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी पहुंची कैसे और उसकी मालिक कौन था।

जस्टिस वर्मा नकदी के स्रोत, उसके मालिकाना हक या वहां रखे जाने की कोई संतोषजनक वजह नहीं बता सके।

समिति ने इसे उनके खिलाफ गंभीर परिस्थिति माना।

हालांकि, नकदी को जब्त नहीं किया गया।

उसकी गिनती भी नहीं हुई और नोटों के नमूने सुरक्षित नहीं रखे गए।

इसलिए समिति यह तय नहीं कर सकी कि वहां कुल कितनी रकम थी।

आरोप नंबर-1: स्टोररूम में मिली बेहिसाब नकदी

रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी आवास के स्टोररूम में ₹500 के नोटों के बंडल और अधजले नोट मिले थे।

फायर सर्विस और पुलिस कर्मचारियों ने बताया कि नोट किसी एक कोने में नहीं थे।

वे स्टोररूम के बड़े हिस्से में फैले हुए थे।

दिल्ली फायर सर्विस के कर्मचारी अंकित सहगल ने बताया कि उसने ₹500 के नोटों के बंडल देखे थे,

जो करीब 7-8 फीट के हिस्से में फैले हुए थे।

एक पुलिस अधिकारी से जब पूछा गया कि क्या नकदी ₹5 लाख से अधिक थी,

तो उनका जवाब था कि यह अनुमान बहुत कम है।

समिति का निष्कर्ष: आरोप साबित।

आरोप नंबर-2: आग के बाद सबूतों से छेड़छाड़?

जांच में दूसरा गंभीर पहलू आग बुझने के बाद की गतिविधियों को लेकर सामने आया।

स्टोररूम को तत्काल सील नहीं किया गया।

सुरक्षा अधिकारी ने जस्टिस वर्मा के स्टाफ को रात करीब 3 बजे वहां सफाई करते हुए देखा।

सुबह तक जला हुआ सामान बाहर निकाल दिया गया और कमरा साफ कर दिया गया।

वहां मौजूद नोट भी सुरक्षित नहीं किए गए और बाद में उपलब्ध नहीं मिले।

समिति ने माना कि महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित रखने में गंभीर चूक हुई और उनके साथ छेड़छाड़ की स्थिति बनी।

समिति का निष्कर्ष: आरोप साबित।

आरोप नंबर-3: सफाई बदलती रही, सबूत नहीं मिले

जस्टिस वर्मा ने शुरुआत में कहा था कि उन्हें नकदी के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

बाद में उनके बचाव में नकदी के नकली होने और उसे साजिश के तहत रखे जाने जैसी बातें सामने आईं।

लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई FIR, शिकायत या ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

जस्टिस वर्मा ने जांच समिति के सामने खुद गवाही नहीं दी।

उनके परिवार या स्टाफ के सदस्यों को भी गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया।

समिति ने उनकी सफाई को अधूरी, टालमटोल वाली और प्रभाव में भ्रामक माना।

समिति का निष्कर्ष: आरोप साबित।

तीन आरोप, तीनों पर समिति की मुहर
आरोप जांच समिति का निष्कर्ष
सरकारी आवास में बड़ी मात्रा में नकदी मिली साबित
आग के बाद सबूत सुरक्षित नहीं रहे और छेड़छाड़ हुई साबित
जस्टिस वर्मा के जवाब अधूरे और भ्रामक पाए गए साबित

अप्रैल में दे चुके हैं इस्तीफा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने इसी साल 9 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था।

अपने इस्तीफे में उन्होंने कहा था कि इस पद पर सेवा करना उनके लिए सम्मान की बात रही है,

लेकिन गहरे दुख के साथ वह तत्काल प्रभाव से पद छोड़ रहे हैं।

अब संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट के बाद यह मामला न्यायपालिका से जुड़े सबसे चर्चित विवादों में एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।