गरीब महिलाओं तक नहीं पहुंचे ₹1.08 करोड़: दमोह की जांच ने फिर उजागर की आजीविका मिशन की बड़ी खामी

दमोह में एनआरएलएम की विभागीय जांच में स्वयं सहायता समूहों के लिए जारी 1.45 करोड़ रुपये में से 1.08 करोड़ रुपये समय पर वितरित नहीं होने समेत कई वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई। दो माह बाद भी कार्रवाई लंबित है।

शरद कुमार शर्मा, दमोह/भोपाल

(9826019364)

मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मुख्यालय से लेकर जिला स्तर तक वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। अब दमोह की विभागीय जांच ने सरकारी सहायता राशि के वितरण में गंभीर गड़बड़ियों की पुष्टि की है।

जांच में सामने आया कि स्वयं सहायता समूहों (SHG) के लिए जारी कुल 1.45 करोड़ रुपये में से शिकायत दर्ज होने तक 1.08 करोड़ रुपये समूहों तक नहीं पहुंचे थे। जांच रिपोर्ट मई में जिला पंचायत को सौंप दी गई थी, लेकिन दो माह बाद भी जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकी है।

ग्रामीण आजीविका मिशन की सबसे बड़ी ताकत स्वयं सहायता समूह हैं। इन्हीं समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार, बचत और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने का दावा किया जाता है। प्रदेश में करीब 4.7 लाख स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं और उनके बैंक खातों में लगभग 1800 करोड़ रुपये जमा हैं। ऐसे में दमोह की यह जांच केवल एक जिले का मामला नहीं, बल्कि पूरे मिशन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

 

एक शिकायत से खुला पूरा मामला

सहारा संकुल स्तरीय संगठन (CLF) से जुड़ी शिकायत मिलने पर जिला पंचायत ने जांच समिति गठित की। शिकायत में आरोप था कि समूहों के लिए जारी सरकारी सहायता राशि नियमानुसार वितरित नहीं की जा रही है। बैंक खातों के संचालन, पदाधिकारियों में बदलाव और वित्तीय निर्णयों में नियमों की अनदेखी की गई। समिति ने बैंक स्टेटमेंट, कैशबुक, भुगतान अभिलेख, बैठक रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों का परीक्षण किया। कई माह चली जांच के बाद प्रस्तुत रिपोर्ट में अनेक वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि की गई

 

₹1.45 करोड़ जारी, लेकिन समूहों तक पहुंचे सिर्फ ₹43 लाख

जांच के अनुसार सहारा सीएलएफ को सामुदायिक निवेश निधि (CIF) के रूप में 1 करोड़ 45 लाख रुपये जारी किए गए थे। मिशन के नियमों के मुताबिक यह राशि ग्राम संगठनों के माध्यम से तत्काल स्वयं सहायता समूहों तक पहुंचनी चाहिए थी, ताकि महिलाएं स्वरोजगार गतिविधियां शुरू कर सकें, लेकिन जांच में पाया गया कि 145 समूहों के लिए जारी राशि में से केवल 43 लाख रुपये ही 10 ग्राम संगठनों तक पहुंचे।

शेष 1 करोड़ 2 लाख रुपये लंबे समय तक वितरित नहीं किए गए। जांच में यह भी सामने आया कि लगभग 6 लाख रुपये आवश्यकता से अधिक जारी कर दिए गए। इस प्रकार शिकायत दर्ज होने तक कुल लगभग 1.08 करोड़ रुपये समूहों तक नहीं पहुंच सके।

हालांकि, कुछ स्थानीय स्तर पर राशि के निजी उपयोग की आशंका जताई गई, लेकिन विभागीय जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं की गई है। रिपोर्ट में केवल राशि के समय पर वितरण न होने और वित्तीय प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख है।

करीब 1100 महिलाएं समय पर सहायता से वंचित

समिति ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि राशि समय पर वितरित नहीं होने से 108 स्वयं सहायता समूहों की लगभग 1100 ग्रामीण महिलाएं सरकारी सहायता से वंचित रहीं। इन महिलाओं को इसी राशि से पशुपालन, खेती, सूक्ष्म उद्यम और अन्य आजीविका गतिविधियां शुरू करनी थीं।

मानदेय भुगतान में भी मिली गंभीर गड़बड़ियां

जांच केवल CIF राशि तक सीमित नहीं रही। बल्कि,कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (CRP) के मानदेय भुगतान में भी कई अनियमितताएं सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न मदों में लगभग 20.29 लाख रुपये जारी किए गए। इनमें कई भुगतान ऐसे व्यक्तियों के खातों में पाए गए जिनका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था या जो अधिकृत सूची में शामिल नहीं थे।

इनवेस्टीगेशन में 21 अनधिकृत सीआरपी को भुगतान मिलने की पुष्टि हुई, जबकि 69 पात्र सीआरपी को मानदेय ही नहीं मिला। कुछ मामलों में निर्धारित राशि से कम तथा कुछ में नियमों के विपरीत भुगतान किया गया।

रिकॉर्ड में मिलीं गंभीर खामियां

पड़ताल के दौरान अधिकारियों को कई आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। कई वर्षों की कैशबुक अधूरी मिली। लेजर पर आवश्यक हस्ताक्षर नहीं थे। बैठक रजिस्टर प्रस्तुत नहीं किया गया। कई बिल, वाउचर और बैंक लेन-देन के दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं मिले। अध्यक्ष परिवर्तन से जुड़े अभिलेख भी अधूरे पाए गए।

जांच समिति ने माना कि रिकॉर्ड की इन कमियों के कारण कई वित्तीय निर्णयों की वैधता का परीक्षण करना भी कठिन हो गया।

नियमों के विपरीत वित्तीय लेन-देन

मिशन की व्यवस्था के अनुसार राशि जिला स्तर से सीएलएफ, वहां से ग्राम संगठन और फिर स्वयं सहायता समूहों तक पहुंचाई जानी चाहिए। लेकिन जांच में कहीं सीधे भुगतान, कहीं आवश्यकता से अधिक राशि जारी करने, कहीं कम भुगतान तथा कई मामलों में राशि लंबे समय तक रोककर रखने के तथ्य सामने आए। कुछ मामलों में नकद निकासी को भी जांच समिति ने वित्तीय अनियमितता माना है।

सिर्फ दमोह नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल

दमोह का मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं माना जा रहा। प्रदेश में लाखों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं और उनके खातों में लगभग 1800 करोड़ रुपये जमा हैं। इसके बावजूद पूरे प्रदेश में ऐसी केंद्रीकृत बैंकिंग निगरानी व्यवस्था नहीं है, जो प्रत्येक वित्तीय लेन-देन पर प्रभावी निगरानी रख सके।

NRLM ने पंजाब नेशनल बैंक को नोडल बैंक बनाया है, लेकिन अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न बैंकों में खाते संचालित होने के कारण निगरानी व्यवस्था पूरी तरह एकीकृत नहीं हो सकी।

रिपोर्ट आ गई, कार्रवाई अब भी अधूरी

जिला पंचायत को जांच प्रतिवेदन मई माह में प्राप्त हो गया था। इसके आधार पर संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए, लेकिन दो महीने बाद भी अंतिम विभागीय कार्रवाई नहीं हुई है। जिला पंचायत के अधिकारियों का कहना है कि संबंधित पक्षों के जवाब प्राप्त होने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अब सरकार के सामने तीन बड़े सवाल

1-क्या दमोह की तरह अन्य जिलों के सीएलएफ खातों का भी स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा?

2-क्या 1.08 करोड़ रुपये समय पर समूहों तक नहीं पहुंचने की जवाबदेही तय होगी?

3-क्या एनआरएलएम के वित्तीय लेन-देन के लिए राज्य स्तर पर केंद्रीकृत डिजिटल निगरानी प्रणाली लागू की जाएगी?

जांच में सामने आए प्रमुख तथ्य
बिंदु                                             स्थिति
CIF जारी                                    ₹1.45 करोड़
समूहों तक पहुंची राशि                 ₹43 लाख
शिकायत तक लंबित राशि          ₹1.08 करोड़
प्रभावित स्वयं सहायता समूह         108
प्रभावित महिलाएं लगभग             1100
CRP मानदेय                             ₹20.29 लाख
अनधिकृत CRP को भुगतान            21
पात्र CRP को भुगतान नहीं               69

गड़बड़ी सिर्फ दमोह तक सीमित नहीं

दमोह की विभागीय जांच ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि एक जिले में इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितताएं सामने आ सकती हैं, तो प्रदेशभर में संचालित हजारों सीएलएफ और लाखों स्वयं सहायता समूहों के खातों की निगरानी कितनी प्रभावी है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार इस मामले को केवल जिला स्तर तक सीमित रखती है या पूरे राज्य में व्यापक ऑडिट और जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाती है।

क्या बोले जिम्मेदार

एमपी एनआरएलएम के सीईओ विनय निगम
“मैंने हाल ही में मिशन के मुख्य कार्यपालन अधिकारी का दायित्व संभाला है। यह मामला अभी मेरे संज्ञान में नहीं था। आपने जानकारी दी है। मैं जांच प्रतिवेदन मंगवाकर पूरे प्रकरण की समीक्षा करूंगा। यदि जांच में अनियमितताएं पाई गई हैं तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”

दमोह जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रवीण फुलपागरे
“विभागीय जांच पूरी हो चुकी है। जांच प्रतिवेदन के आधार पर संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं। नियमानुसार प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोषियों के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।”

दमोह कलेक्टर प्रताप नारायण यादव
इस संबंध में उनका पक्ष जानने के लिए कई बार मोबाइल फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया। उन्हें व्हाट्सएप संदेश भी भेजा गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

सहारा संकुल स्तरीय संगठन के प्रभारी एवं विकासखंड प्रबंधक राजेंद्र उपाध्याय
उन्होंने किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता से इनकार किया। हालांकि, जब उनसे विभागीय जांच रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बाद में विस्तृत चर्चा करने की बात कहकर बातचीत समाप्त कर दी।