गया/प्रयागराज, 27 सितंबर 2026।
पितृपक्ष शुरू होते ही देश के प्रमुख तीर्थस्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ गई है।
गया के फल्गु तट से लेकर प्रयागराज के संगम तक पिंडदान और तर्पण का सिलसिला जारी है।
देश के अलग-अलग राज्यों से लोग अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंच रहे हैं।
वहीं, जो लोग तीर्थस्थल नहीं पहुंच पा रहे हैं, वे डिजिटल माध्यम से भी इन परंपराओं से जुड़ रहे हैं।

गया में एक किलोमीटर तक लगी कतार
गया में पितृपक्ष मेले के पहले दिन ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
रिपोर्टों के मुताबिक, दो लाख से अधिक लोगों के पहुंचने की बात सामने आई है।
देवघाट पर पिंडदानियों की कतार करीब एक किलोमीटर तक पहुंच गई।
सुबह से ही फल्गु नदी के तट पर श्रद्धालु जुटने लगे।
पहले संकल्प लिया गया।
इसके बाद पितरों के नाम पर जलांजलि और तर्पण किया गया।
फिर पुरोहितों के मार्गदर्शन में पिंडदान की प्रक्रिया पूरी हुई।
बारिश ने भी श्रद्धालुओं की आस्था नहीं रोकी।
कई लोगों ने खुले स्थानों पर ही श्राद्ध कर्म किया।
फल्गु नदी, विष्णुपद और अक्षयवट जैसे स्थानों पर भी चहल-पहल रही।
16 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की उम्मीद
पितृपक्ष को लेकर प्रशासन ने भी व्यापक तैयारियां की हैं।
इस साल 16 लाख से अधिक पिंडदानियों के पहुंचने का अनुमान है।
इसलिए शहर को अलग-अलग सेक्टरों में बांटा गया है।
साथ ही, प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई है।
पुलिस बल की तैनाती भी बढ़ाई गई है।
श्रद्धालुओं की आवाजाही के लिए ई-रिक्शा की व्यवस्था की जा रही है।
इसके अलावा CCTV और ड्रोन से निगरानी रखी जा रही है।
बच्चों की सुरक्षा के लिए QR कोड आधारित बैंड की व्यवस्था भी की गई है।
प्रयागराज के संगम पर भी बढ़ी भीड़

उधर, प्रयागराज में भी पितृपक्ष के चलते संगम क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है।
गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लोग तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं।
आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों से श्रद्धालु यहां पहुंचे हैं।
लोग अपने दिवंगत माता-पिता और अन्य पूर्वजों को याद कर रहे हैं।
इसके साथ ही परिवार की परंपरा के अनुसार पितृ कर्म किया जा रहा है।
संगम पर पिंडदान का धार्मिक महत्व
धार्मिक परंपराओं में प्रयागराज को तीर्थराज कहा जाता है।
संगम को भी विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
इसी वजह से पितृपक्ष में यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
श्रद्धालु पहले संगम में स्नान करते हैं।
इसके बाद पूर्वजों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करते हैं।
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, प्रयागराज के साथ गया और काशी भी पितृ कर्म से जुड़े प्रमुख तीर्थ हैं।
अब घर बैठे भी पितृ कर्म से जुड़ रहे लोग
प्रयागराज में पितृपक्ष की परंपरा अब डिजिटल माध्यम से भी जुड़ रही है।
जो लोग किसी कारण से संगम नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनके लिए ऑनलाइन पिंडदान और तर्पण की व्यवस्था की जा रही है।
तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, श्रद्धालु वीडियो कॉल या अन्य डिजिटल माध्यम से जुड़ सकते हैं।
इस दौरान पुरोहित संगम क्षेत्र में धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
वहीं, श्रद्धालु अपने स्थान से पूजा प्रक्रिया में शामिल होते हैं।
हालांकि, ऑनलाइन पिंडदान को लेकर सभी धार्मिक परंपराएं एक जैसी नहीं हैं।
इसलिए श्रद्धालु अपने परिवार की परंपरा और पुरोहित की सलाह के अनुसार निर्णय लेते हैं।
विदेश में बैठे लोग भी जुड़ रहे
ऑनलाइन व्यवस्था का लाभ विदेश में रहने वाले लोग भी ले रहे हैं।
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, विदेश में बसे श्रद्धालु भी वीडियो कॉल के जरिए अनुष्ठान से जुड़ रहे हैं।
इस तरह हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी वे अपने पूर्वजों के लिए होने वाले धार्मिक कर्म में शामिल हो रहे हैं।
परंपरा के साथ तकनीक का संगम
इस बार पितृपक्ष में गया और प्रयागराज दोनों जगह आस्था का बड़ा दृश्य देखने को मिल रहा है।
एक ओर श्रद्धालु तीर्थस्थलों पर पहुंचकर सीधे पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं।
दूसरी ओर, तकनीक दूर बैठे लोगों को भी इस धार्मिक परंपरा से जोड़ रही है।
गया में फल्गु तट पर भीड़ है।
प्रयागराज में संगम पर आस्था का सैलाब है।
और डिजिटल माध्यम से देश-विदेश के श्रद्धालु भी पितृ कर्म से जुड़ रहे हैं।
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