नारी शक्ति बिल: हार में भी BJP को सियासी बढ़त ?

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“नारी शक्ति विधेयक भले ही सदन में पास नहीं हो सका, लेकिन इसने राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है। यह मुद्दा अब सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दलों की संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक रणनीति का भी आईना बन गया है।”

रवि अवस्थी,भोपाल।
भोपाल। नारी शक्ति संशोधित विधेयक 54 वोट से गिर गया। मोदी सरकार के 11 साल के कार्यकाल में यह पहला मौका रहा, जब कोई बड़ा विधेयक सदन से पारित नहीं हो सका। सवाल यही है-क्या यह वास्तव में सरकार की हार है, या रणनीति का हिस्सा?

🔹 क्या यह सच में सरकार की नाकामी?

मोदी सरकार अपने 11 साल के कार्यकाल में पहली बार किसी विधेयक को पारित नहीं करा सकी। पहली नजर में यह सरकार की विफलता लगती है, लेकिन राजनीतिक संकेत कुछ और ही कहानी बताते हैं।

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी को इस बात का अंदेशा पहले से था कि बिल पास नहीं होगा। इसके बावजूद इसे सदन में लाना एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है।

🔹 33% आरक्षण पर सहमति, लेकिन तैयारी पर सवाल

संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने पर न सरकार को आपत्ति है, न विपक्ष को। असली चुनौती “तैयारी” की है।
सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल आज इतने मजबूत हैं कि वे 33% महिला उम्मीदवार मैदान में उतार सकें?

बीजेपी को छोड़ दें, तो अधिकांश दल इस स्थिति में नहीं दिखते। यही कारण रहा कि पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार स्थानीय निकायों तक ही आरक्षण सीमित रख पाईं, लेकिन संसद-विधानसभाओं तक इसे लागू नहीं कर सकीं।

🔹 विपक्ष की दुविधा और एकजुटता

आईएनडीआईए (I.N.D.I.A.)गठबंधन के दल अपनी इस संगठनात्मक कमजोरी से वाकिफ हैं। ऐसे में वे नहीं चाहते कि महिला आरक्षण जल्द लागू हो।
इसी वजह से विपक्ष एकजुट हुआ और बिल पारित नहीं हो सका। इसके साथ ही 2029 से महिला आरक्षण लागू होने की संभावना भी धुंधली हो गई।

🔹 असली नुकसान किसका?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान उन संभावित महिला उम्मीदवारों का माना जा रहा है, जो इस कानून के लागू होने की उम्मीद लगाए बैठी थीं।

🔹 संगठनात्मक कमजोरी बनाम बीजेपी की तैयारी

कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों ने समय के साथ महिला नेतृत्व को मजबूत करने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। वहीं, बीजेपी ने अपने महिला संगठनों और नेतृत्व को लगातार विकसित किया।

यही वजह है कि आज बीजेपी में महिला नेताओं की लंबी कतार दिखती है, जबकि विपक्ष में यह संख्या सीमित है।

🔹 परिसीमन का तर्क कितना मजबूत?

विपक्ष का तर्क है कि सरकार महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन को आगे बढ़ाना चाहती है। हालांकि, सामान्य तौर पर परिसीमन में केवल मतदाताओं की संख्या का पुनर्गठन होता है, न कि भौगोलिक विस्तार का सीधा प्रभाव।

यूं भी पूर्ववर्ती ,कांग्रेस सरकार के समय ही परिसीमन को 2026 तक प्रतिबंधित किया गया था। ऐसे में विपक्ष का यह आरोप कि परिसीमन में नई जनगणना को आधार बनाया जाना चाहिए,कोई बहुत अधिक मायने नहीं रखता।

बीजेपी का भी परिसीमन की राजनीति पर कोई बहुत जोर नहीं रहा। यही वजह रही कि विधेयक गिरने के बाद सरकार ने परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 एवं केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 पर वोटिंग नहीं कराई। तर्क दिया ये बिल आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग से वोटिंग आवश्यक नहीं।

🔹 क्या विपक्ष को “एक्सपोज” करना था मकसद?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बीजेपी को पहले से अंदाजा था कि विपक्ष 33% महिला उम्मीदवार उतारने की स्थिति में नहीं है। संसद में गृह मंत्री अमित शाह का भाषण इसकी बानगी है। इसमें उन्होंने कहा- विधेयक गिरता है तो इसकी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी।

इससे पहले वह कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल की शर्त पर विधेयक का संशोधित ड्राफ्ट लाने पर भी राजी हो गए।

ऐसे में, विशेष सत्र बुलाकर विपक्ष की कमजोरियों को उजागर करना बीजेपी की असल रणनीति मानी जा रही है। विशेषकर,तमिलनाडृ व पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले संसद सत्र बुलाया जाना इसकी ​बानगी है।

दोनों ही राज्यों के चुनाव में बीजेपी को उसकी इस रणनीति को कितना लाभ मिलेगा। इसका खुलासा,चुनाव के नतीजे करेंगे।

बहरहाल, बीजेपी ने संसद के इस विशेष सत्र के बहाने प्रतिद्वंदियों पर करारा प्रहार करने का जतन किया है।

🔴 आंकड़ों में समझें पूरा मामला
कुल वोटिंग: 528 सांसद
पक्ष में: 298 वोट
विपक्ष में: 230 वोट
आवश्यक बहुमत: 352 (दो-तिहाई)

बिल 54 वोट से गिर गया

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