सिराज खान, नीमच | रवि अवस्थी, भोपाल
एक ओर वन विभाग घरेलू उपयोग के लिए सिर पर जलाऊ लकड़ी ले जाते ग्रामीणों पर कार्रवाई कर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन करता है, वहीं दूसरी ओर नीमच वन वृत्त में इमारती लकड़ी के बड़े खेल पर रहस्यमयी खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। हिंगोरिया रेलवे गेट के समीप स्थित एक निजी वेयरहाउस परिसर में करीब तीन ट्रक से अधिक मात्रा में खैर प्रजाति की लकड़ियां लंबे समय से खुले में पड़ी हैं, लेकिन न तो वन विभाग ने इन्हें जब्त किया है और न ही किसी व्यक्ति अथवा संस्था ने इन पर स्वामित्व का दावा किया है।
सूत्रों के अनुसार लकड़ियां गुल्लों और बड़े टुकड़ों के रूप में हैं, जिन्हें पेशेवर तरीके से काटा गया प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च गुणवत्ता वाले खैर की इस मात्रा का बाजार मूल्य लाखों रुपये तक हो सकता है।
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यदि सरकारी संपत्ति है तो नीलामी क्यों नहीं?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह लकड़ी वन विभाग की जब्त अथवा संरक्षित संपत्ति है, तो नियमानुसार इसकी नीलामी कर राजस्व अर्जित किया जा सकता है। इसके विपरीत लकड़ियों का लंबे समय तक खुले में पड़े रहना न केवल सरकारी संपत्ति के नुकसान का कारण बन सकता है, बल्कि इससे संरक्षण व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि यह खैर नीमच वन वृत्त के क्षेत्रों से काटी गई हो सकती है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि लकड़ियों को तस्करी के जरिए अन्यत्र भेजा जा रहा था, लेकिन मामला सार्वजनिक होने की आशंका के चलते इन्हें निजी परिसर में छोड़ दिया गया।

मौन साधे अधिकारी, जांच की बात कह रहे सीसीएफ
इस मामले में नीमच के डीएफओ ए.के. अटोदे ने कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है। मैदानी अमला भी वरिष्ठ अधिकारियों के रुख को देखते हुए खुलकर कुछ कहने से बच रहा है।
उज्जैन वन वृत्त के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) आलोक पाठक का कहना है कि वे मामले की जानकारी एकत्र कर आवश्यक तथ्य जुटाएंगे।
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खैर: नीमच के जंगलों की बहुमूल्य धरोहर


खैर का पेड़ लंबे समय से एक महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन रहा है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। यह राष्ट्रीय संपदा ही नहीं बल्कि एक मूल्यवान उपज है। इसके चलते इसकी अवैध कटाई व परिवहन को प्रतिबंधित किया गया है। खैर का सबसे प्रसिद्ध उपयोग कत्था (कथा) के उत्पादन में होता है , जिसे इसकी भीतरी लकड़ी से निकाला जाता है। इस अर्क का व्यापक रूप से पान बनाने, रंगाई और पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसका बाजार मूल्य 30 से 80 रुपए प्रति किग्रा तक होता है।