भोपाल ने गढ़ी थी पंडवानी की विश्वगाथा: तीजन बाई के निधन से लोक संस्कृति का एक युग अवसान

पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन से लोक संस्कृति जगत शोकाकुल है। भोपाल और मध्य प्रदेश से उनके गहरे रिश्तों को याद करते हुए कलाकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

रवि अवस्थी,भोपाल/रायपुर।

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पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। लंबी बीमारी के बाद शनिवार तड़के रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश का सांस्कृतिक जगत भी गहरे शोक में डूब गया है, क्योंकि तीजन बाई की कला यात्रा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज तक पहुंचाने में भोपाल और मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

भोपाल के मंचों से मिली पहचान

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में 1956 में जन्मीं तीजन बाई ने पंडवानी की परंपरागत सीमाओं को तोड़ते हुए उसे विश्व मंच तक पहुंचाया। अपनी ओजस्वी वाणी, प्रभावशाली अभिनय और विशिष्ट कापालिक शैली के माध्यम से उन्होंने महाभारत के आख्यानों को जन-जन तक पहुंचाया। पांच दशकों से अधिक लंबे कलात्मक जीवन में उन्होंने भारत ही नहीं, एशिया और यूरोप के अनेक देशों में भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया।

भोपाल से मिली उड़ान, मध्य प्रदेश बना कर्मभूमि

सांस्कृतिक जगत के जानकारों के अनुसार तीजन बाई की प्रतिभा को व्यापक मंच देने का महत्वपूर्ण कार्य तत्कालीन मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद और उसके प्रेरक व्यक्तित्व भाऊ साहब खिरवरडकर ने किया।

भोपाल के सांस्कृतिक परिवेश ने उन्हें गनियारी गांव की एक प्रतिभाशाली कलाकार से विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका बनने की राह दिखाई।

वरिष्ठ साहित्यकार एवं सांस्कृतिक चिंतक प्रो. मनोज कुमार ने उन्हें याद करते हुए कहा कि तीजन बाई केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि समूची भारतीय लोक परंपरा की सांस्कृतिक राजदूत थीं। उन्होंने कहा कि भाऊ साहब खिरवरडकर जैसे गुरुओं ने उनकी प्रतिभा को तराशा और भोपाल से दिल्ली होते हुए दुनिया के मंचों तक पहुंचने का अवसर दिया।

प्रो. मनोज कुमार ने लिखा, “तीजन बाई का जाना एक कलाकार का नहीं, बल्कि एक जीवंत लोक परंपरा के थम जाने जैसा है। उन्होंने पंडवानी को वैश्विक पहचान दिलाई और अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया।”

यादों में जीवित रहेंगी तीजन बाई

मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग के उप संचालक राजेश बैन ने भी तीजन बाई से जुड़े अपने संस्मरण साझा किए।

उन्होंने बताया कि वर्ष 1992 में सागर में आयोजित संस्कृति विभाग के एक समारोह के दौरान उन्होंने तीजन बाई का साक्षात्कार लिया था, जो उस समय प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था।

बाद के वर्षों में दुर्ग और भिलाई में भी उनसे कई बार मुलाकात हुई।

राजेश बैन ने कहा, “गनियारी गांव से निकली वह साधारण सी कलाकार धीरे-धीरे सात समंदर पार तक भारतीय लोक संस्कृति की पहचान बन गई।

उनका सहज व्यक्तित्व और आत्मीय व्यवहार हमेशा स्मृतियों में जीवित रहेगा।”

वरिष्ठ पत्रकार चरण सिंह चौहान ने भी तीजन बाई के निधन को लोक संस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनकी विदाई केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि लोक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का विराम है।

उनका निधन लोककला की अपूरणीय क्षति है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जताया शोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तीजन बाई के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की पंडवानी कला को अपनी असाधारण प्रस्तुतियों के माध्यम से विश्वव्यापी पहचान दिलाई। उनका निधन भारतीय कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

संघर्ष से शिखर तक का सफर

तीजन बाई ने उस समय पंडवानी की कापालिक शैली को अपनाया, जब इस पर पुरुष कलाकारों का वर्चस्व माना जाता था। सामाजिक विरोध और अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी साधना जारी रखी और अंततः भारतीय लोक परंपरा का विश्वस्तरीय चेहरा बन गईं।

लोक कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण तथा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।

आज जब तीजन बाई नहीं हैं, तब उनकी आवाज, उनका तंबूरा और महाभारत के चरित्रों को जीवंत कर देने वाली उनकी प्रस्तुति भारतीय लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर बन चुकी है। उनकी विदाई केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि लोक परंपरा के एक स्वर्णिम अध्याय का विराम है।

नम आंखों से दी विदाई