नई दिल्ली: हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हिंदी भाषा के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। हालांकि, हिंदी को राजभाषा बनाने का फैसला अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे संविधान सभा में लंबे समय तक चली बहस और देश की भाषाई विविधता को लेकर गंभीर विचार-विमर्श शामिल था।
आजादी के बाद सामने आया भाषा का बड़ा सवाल
भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद देश के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियां थीं। इनमें शासन व्यवस्था को व्यवस्थित करना और संविधान तैयार करना प्रमुख था। इसी दौरान यह सवाल भी उठा कि केंद्र सरकार के आधिकारिक कामकाज के लिए किस भाषा का इस्तेमाल किया जाए।
भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में कई भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। ऐसे में किसी एक भाषा को संघ के सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर स्वीकार करना संवेदनशील विषय था। संविधान सभा में इस मुद्दे पर सदस्यों के बीच लंबे समय तक चर्चा हुई।
बहस के दौरान भाषा के सवाल के साथ-साथ क्षेत्रीय भावनाओं, प्रशासनिक जरूरतों और देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखने की चुनौती भी सामने थी।
सितंबर 1949 में आया निर्णायक मोड़
भाषा से जुड़े प्रावधानों पर संविधान सभा में सितंबर 1949 में महत्वपूर्ण चर्चा हुई। 12 सितंबर से 14 सितंबर 1949 के बीच इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।
आखिरकार 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। हालांकि, इसके साथ अंग्रेजी को तत्काल सरकारी कामकाज से हटाने का फैसला नहीं किया गया। संक्रमण काल और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए अंग्रेजी के इस्तेमाल को भी जारी रखने की व्यवस्था की गई।
बाद में संसद ने कानून बनाकर संघ के आधिकारिक कामकाज में अंग्रेजी के इस्तेमाल से संबंधित व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाया।
हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं, संघ की राजभाषा है
हिंदी दिवस के मौके पर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी समझना जरूरी है कि हिंदी को संविधान में भारत की ‘राष्ट्रभाषा’ नहीं कहा गया है।
आम बोलचाल में कई बार हिंदी को राष्ट्रभाषा कहा जाता है, लेकिन संवैधानिक रूप से हिंदी संघ की राजभाषा है। संविधान के भाग 17 में संघ की राजभाषा से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और इसकी लिपि देवनागरी है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के कारण 14 सितंबर का दिन हिंदी भाषा के इतिहास में विशेष महत्व रखता है।
1953 से मनाया जाने लगा हिंदी दिवस
14 सितंबर 1949 के ऐतिहासिक फैसले के बाद हिंदी के प्रचार-प्रसार और इस महत्वपूर्ण दिन को याद रखने के लिए हिंदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सुझाव के बाद वर्ष 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाने लगा। तब से देशभर के सरकारी संस्थानों, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न संगठनों में हिंदी दिवस के अवसर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
हिंदी दिवस का क्या है महत्व?
हिंदी दिवस केवल एक भाषा को सम्मान देने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारत की भाषाई विविधता और संवैधानिक व्यवस्था को समझने का दिन भी है। हिंदी देश के बड़े हिस्से में संचार की प्रमुख भाषाओं में शामिल है और इसका साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा तथा प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
14 सितंबर का दिन उस ऐतिहासिक संवैधानिक निर्णय की याद दिलाता है, जिसके जरिए हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था।