Sehore Constituency : सीहोर..यहां आयातित नेताओं का ही रहा बोलबाला

रवि अवस्थी ,भोपाल। Sehore Constituency :“कहावत है,बरगद के नीचे अन्य पौधे नहीं पनपते…राजधानी भोपाल के समीपस्थ सीहोर विधानसभा सीट भी कुछ ऐसे ही हालात से गुजरती रही है…सीहोर यानी 16 वर्ष के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह जिला… खास बात यह कि कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के लिए यह सीट प्रयोगशाला की तरह रही..स्थानीय मूल के नेताओं की जगह बाहरी या दूसरे दलों से आए नेता विधायक बनते रहे.. बीते 46 सालों में इस सीट से जीता कोई भी विधायक , मंत्री नहीं बन सका… सीहोर विधानसभा का सियासी मिजाज जानने से पहले एक नजर इसके चुनावी सफर पर….”
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सीहोर में 85 के बाद से नहीं जीती कांग्रेस
मध्य प्रदेश गठन के साथ ही सीहोर विधानसभा Sehore Constituency अस्तित्व में आई…शुरुआती एक दशक तक यह कांग्रेस के प्रभाव वाली सीट रही। …तब भोपाल व इछावर सीहोर में शामिल थे..70के दशक में यहां जनसंघ का प्रभाव बढ़ा और आपातकाल के दौर के बाद तो यह सीट पूरी तरह पहले जनता पार्टी और बाद में बीजेपी BJP का गढ़ बन गई..

कांग्रेस Congress यहां अंतिम बार 1985 में चुनाव जीती थी… तब कांग्रेस के शंकरलाल साबू चुनाव जीते थे..इसके बाद से बीते 33 सालों में यहां ‘कमल’ ही खिला…93 के चुनाव में रमेश सक्सेना व 2013 के चुनाव में सुदेश राय निर्दलीय चुनाव जीते लेकिन बाद में ये दोनों भी बीजेपी के हो गए …इस तरह इस सीट पर अब तक हुए 14 बार के चुनाव में कांग्रेस सिर्फ चार चुनाव ही जीत सकी..शेष चुनाव में जनसंघ,जनता पार्टी,निर्दलीय व बीजेपी ही चुनाव जीतती रही है…..

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मप्र गठन के साथ ही बनी सीहोर विधानसभा
1977तक भोपाल,इछावर थे सीहोर का हिस्सा
46 वर्षों से सीहोर को मंत्रिमंडल में जगह नहीं
72 में चुने गए अजीज कुरैशी थे आखिरी मंत्री
5 दशक से अपनों की उपेक्षा,’बाहरी’ को नवाजा
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आयातित चेहरों को ही बनाना पड़ा उम्मीदवार
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस वक्त मप्र भाजपा के पोस्टर मेन हैं..भोपाल से लेकर दिल्ली तक पार्टी उनके भरोसे एमपी में पांचवी बार सरकार बनाने की तैयारी में है..

सीहोर मुख्यमंत्री का गृह जिला है…बावजूद इसके बीते तीन दशक से सीहोर से भाजपा पूरी तरह गायब है.. बीते 6 चुनावों में भाजपा नेतृत्व कोई ऐसा कार्यकर्ता तैयार नहीं कर सका जो विधानसभा का चुनाव लड़ सके।

पार्टी को हर बार आयातित चेहरे को ही अपना उम्मीदवार बनाना पड़ा..यही दर्द कांग्रेस के चाहने वालों व उसके कार्यकर्ताओं का भी है। सीहोर मूल के नेताओं के साथ इस पक्षपात की शुरुआत 1972 में हुई..जब भोपाल निवासी अजीज कुरैशी को कांग्रेस ने सीहोर से अपना उमीदवार बनाया और वह जीत भी गए..अगले चुनाव में जनता पार्टी ने भोपाल से सविता वाजपयी को भेजा और वे भी चुनाव जीत गईं…इसके बाद 1980 में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा नीमच छोड़ कर सीहोर पहुंचे और विजयी हुए।
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कौन कब जीता
1957:               उमराव सिंह,                      कांग्रेस
1962:               इनायतुल्ला खान,                कांग्रेस
1967:              आर मेवाड़ा,                       जनसंघ
1972:              अजीज कुरैशी,                    कांग्रेस
1977:              सविता बाजपेयी,                 जनता पार्टी
1980:              सुंदर लाल पटवा,                बीजेपी
1985:              शंकर लाल,                        कांग्रेस
1990:              मदन लाल त्यागी,                बीजेपी
1993:              रमेश सक्सेना,                    निर्दलीय
1998:             रमेश सक्सेना,                     बीजेपी
2003:             रमेश सक्सेना,                     बीजेपी
2008:             रमेश सक्सेना,                     बीजेपी
2013:             सुदेश राय,                          निर्दलीय
2018:             सुदेश राय,                          बीजेपी
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1993 से मूल भाजपाई ने नहीं लड़ा चुनाव
प्रदेश भाजपा में आज मूल व आयातित के बीच प्रतिद्वंदिता देखी जा रही है,लेकिन भोपाल से लगे सीहोर में बीते तीन दशक से किसी मूल भाजपाई का टिकट नहीं मिला..

कहने को यह बीजेपी का गढ़ है लेकिन लंबे अर्से से यहां हमेशा दूसरे दल से आए नेता ही पार्टी के उम्मीदवार बनते रहे..मसलन,1990 के चुनाव में कांग्रेस के मदनलाल ने बीजेपी का दामन थामा और चुनाव भी लड़ा। उस वक्त की राम लहर का उन्हें फायदा मिला.. मदनलाल ने कांग्रेस के पूर्व विधायक शंकरलाल साबू को करारी शिकस्त दी।

1993 में फिर त्यागी और साबू आमने-सामने थे, इस चुनाव में कांग्रेस के बागी नेता रमेश सक्सेना ने बीजेपी ,कांग्रेस दोनों को किनारे कर दिया।

सक्सेना का विधायक बनना सीहोर की राजनीति का टर्निंग पाइंट था…1998 के चुनाव में सक्सेना बीजेपी के हो गए..इसके बाद बीजेपी के टिकट पर सक्सेना 1998, 2003 और 2008 में सीहोर से विधायक चुने गए..

बागी कांग्रेस के जीते,अपनाया बीजेपी ने 
2013 के चुनाव के ठीक पहले एक मामले में सक्सेना को सजा हुई तो भाजपा ने उनकी पत्नी उषा को अपना उम्मीदवार बनाया..वहीं कांग्रेस ने नए चेहरे हरीश राठौर को मौका दिया।

कांग्रेस में फिर बगावत हुई..इस बार उसके बागी सुदेश राय ने 1993 के घटनाक्रम को दोहराया व विधायक बने..यही नहीं ,विधायक बनते ही वह भी सक्सेना की तरह बीजेपी के हो गए और आज भी हैं। वह दो बार से बीजेपी के विधायक हैं।

हैरत की बात यह कि 1993 और 2013 दोनों बार 20 साल के अंतराल में बगावत कांग्रेस में ही हुई..दोनों बार उसके बागी ही जीते लेकिन इन्हें अपनाया बीजेपी ने। इससे कांग्रेस की टिकट वितरण रणनीति पर भी सवालिया निशान लगे।
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नब्बे के दशक में दंगे से हुआ वोटों का ध्रुवीकरण
सीहोर में कांग्रेस को महंगी पड़ी अपनों की बगावत
93 में सक्सेना,13 में राय ने निर्दलीय लड़ जीता रण
मप्र कांग्रेस के दोनों बागियों को भाजपा ने अपनाया
सक्सेना की विधायकी बनी राजनीति का टर्निंग पाइंट
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निकाय चुनाव में भी बाहरी को तवज्जो
रमेश सक्सेना की भाजपा में आमद के बाद जिले में भाजपा की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ही रही। ऐसा 2013 तक हुआ। इन 20 सालों में जनसंघ और जनता पार्टी के कार्यकर्ता घर बैठते गए।नगर पालिका चुनाव में भी यही हुआ।

2015 के चुनाव में भाजपा ने जसपाल अरोरा की पत्नी को टिकट दिया। जसपाल कांग्रेस के टिकट पर नपा अध्यक्ष रह चुके थे। एक वक्त ऐसा आया कि सीहोर में कांग्रेस से आए सक्सेना, राय और अरोरा तीनों ही सत्ता के केंद्र बन गए।

वहीं, मूल भाजपाई सुदर्शन महाजन, महेंद्र सिंह, मदनलाल त्यागी, श्रीकिशन मुनीम, हीरालाल साहू, गौरव सन्नी महाजन, बद्री प्रसाद चौरसिया आदि हाशिए पर रहे।

इसका खामियाजा भाजपा ने हाल ही में हुए नगरीय निकाय चुनाव में भी भुगता.. सीहोर विधानसभा क्षेत्र में जिला पंचायत सदस्य की तीनों सीट भाजपा हार गई।

ये संकेत हैं कि आगामी चुनाव में टिकट वितरण को लेकर सतर्कता नहीं बरती गई..तो सीहोर में तीन दशक का इतिहास बदल भी सकता है।

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