भोपाल।
बजट सत्र के दौरान कांग्रेस विधायक मधु भगत ने उच्च शिक्षा विभाग की एक नोटशीट का हवाला देकर उस पर हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी।
विभाग की ओर से जवाब आया-ऐसी कोई नोटशीट प्रचलन में ही नहीं है। प्रश्न को ‘निरंक’ बताकर खारिज कर दिया गया।
RTI में 40 पन्ने,सदन में ‘नहीं है’
दूसरी ओर विभाग ने साल 2024 में सूचना के अधिकार अधिनियम अंतर्गत इसी नोटशीट से जुड़ी जानकारी आवेदक को उपलब्ध कराई। तब फिर विधानसभा में यह जानकारी देने से परहेज क्यों?
SC के निर्देश अधिनियम में शामिल नहीं !
वर्ष 2015 में उच्च न्यायालय में दायर एक याचिका के संदर्भ में विभाग की ओर से जवाब के लिए दस्तावेजी तैयारी की गई।
R-06/CMS/CC/15/38 दिनांक 01 जनवरी 2015 को तैयार इस नस्ती को तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता से भी अनुमोदन लिया गया।
नस्ती में एक निजी विश्वविद्यालय में कथित विसंगतियों, अधिनियम के पालन में कमी और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में सुझाए गए संशोधनों को “अल्ट्रा वायर्स” बताए जाने का उल्लेख है।
साथ ही यह भी दर्ज है कि इन संशोधनों को अधिनियम में शामिल नहीं किया गया।
क्या यही सिफारिश बड़ी वजह?
नोटशीट में लिखा गया कि यूजीसी निर्णय अनुसार विश्वविद्यालय में जारी अनियमितताओं को दृष्टिगत रखते हुए संबंधित अधिनियम 1995 एवं संशोधित अधिनियम 1999 को रद्द ( Repeal) किया जाए।
साथ ही संबंधित विश्वविद्यालय को भी अधिनियम 2007 के अंतर्गत लाया जाए। बताया जाता है कि तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने भी इस पर अपनी सहमति जताई,लेकिन बाद में बात आई-गई हो गई।
दरअसल,कोर्ट में विचाराधीन उक्त प्रकरण विभाग के लिए बीते डेढ़ दशक से ढाल बना हुआ है।सूत्रों का दावा है कि विभाग मुख्यालय में निचले स्तर के कुछ अधिकारी निजी संस्थाओं को संरक्षित कर रहे हैं। सदन में उक्त जानकारी नहीं दिया जाना भी इसी संरक्षण का परिणाम है।
सदन को गुमराह करने की शिकायत
इसी मामले पर कांग्रेस विधायक ने 24 फरवरी को लिखित सवाल क्रमांक 2192 लगाया। उन्होंने नोटशीट पर हुई आगे की कार्रवाई की जानकारी मांगी।
