“भोपाल की गोविंदपुरा विधानसभा सीट Govindpura Constituency को बीजेपी का गढ़ समझा जाता है..यह सीट सार्वजनिक क्षेत्र में देश की नवरत्न कंपनी ‘भेल’ के लिए ही नहीं बल्कि मप्र विधानसभा में अपने नाम दर्ज एक अनोखे रिकॉर्ड के लिए भी जानी जाती है..10 बार की विधायकी का यह रिकॉर्ड बनाया इस सीट से 8 बार अपराजेय रहे बीजेपी के दिग्गज नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने..अब उनकी पुत्रवधु कृष्णा गौर यहां से विधायक हैं..”

रवि अवस्थी,भोपाल। जिले की गोविंदपुरा विधानसभा Govindpura assembly और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर Babulal Gaur कभी एक -दूसरे के पूरक रहे..एक ऐसा अपराजेय राजनीतिक योद्धा (पहले चुनाव को छोड़कर ) जिसने 46 सालों के इतिहास में न केवल लगातार 10 बार चुनाव जीते, बल्कि कई बार तो अपनी ही जीत का रिकॉर्ड भी तोड़ा ..गौर चुनाव दर चुनाव अपने निर्वाचन क्षेत्र में लोकप्रिय होते चले गए..
मध्यप्रदेश में सर्वाधिक समय विधायक रहने का रिकॉर्ड सिर्फ गौर के नाम ही दर्ज है…और अब उनकी पुत्रवधु एवं पूर्व महापौर श्रीमती कृष्णा गौर Krishna Gaur इस सीट से विधायक हैं..2023 में यह सीट इतिहास दोहराएगी या बदलेंगे यहां के समीकरण इस समझने से पहले जानते हैं,गोविंदपुरा सीट का इतिहास...
गौर ने 1974 में बतौर निर्दलीय जीता पहला चुनाव
वर्ष 1962 के आम चुनाव तक भोपाल जिले में तीन ही विधानसभा सीटें हुआ करती थीं..भोपाल,भोपाल न्यू व बैरसिया…1967 के चुनाव में जिले की नई सीट बनी गोविंदपुरा..यहां से पहला चुनाव कांग्रेस के K.N.Pradhan ने जीता..72 के चुनाव में भी कांग्रेस भी कांग्रेस इस सीट से विजयी हुई।
कांग्रेस के मोहनलाल अस्थाना ने पहली बार निर्दलीय चुनाव लड़े जनसंघ के श्रमिक नेता बाबूलाल गौर को मामूली अंतर से पराजित किया..चुनाव में हार-जीत का यह मामला न्यायालय तक पहुंचा ….और फैसला आता इससे पहले ही विधायक अस्थाना का निधन हो गया…..
1974 में हुए उपचुनाव में गौर जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह तीर कमान पर पहली बार विधायक निर्वाचित हुए..चंद दिनों बाद ही देश में आपातकाल लागू हुआ…1977 में भोपाल दक्षिण नई सीट बनी तो जनसंघ ने अपने उम्मीदवारों में फेरबदल किया..बैरसिया के विधायक रहे लक्ष्मीनारायण शर्मा को गोविंदपुरा और भोपाल के गौरीशंकर कौशल को बैरसिया से चुनाव लड़ाया गया ..
वहीं बाबूलाल गौर Babulal Gaur भोपाल दक्षिण से जनसंघ के उम्मीदवार बने ..तीनों ही जगह जनसंघ को कामयाबी मिली..लेकिन 1980 में बीजेपी बनते ही गौर ने एक बार फिर गोविंदपुरा में वापसी की..वह चुनाव और 2013 का चुनाव, गौर लगातार आठ बार इस सीट से विधायक चुने गए.. 2018 के चुनाव में अधिक उम्र का हवाला देने पर मजबूरी में सक्रिय राजनीति से सन्यास लेना पड़ा ,लेकिन बदले में वह अपनी पुत्रवधु श्रीमती कृष्णा गौर को अपनी सीट से टिकट दिलाने में सफल रहे — . पूर्व महापौर श्रीमती कृष्णा गौर वर्तमान में इस सीट से विधायक हैं ..
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गोविंदपुरा सीट से अब तक चुने गए विधायक एवं उनके दल
1967 केएन प्रधान कांग्रेस
1972 मोहनलाल अस्थाना कांग्रेस
1974 बाबूलाल गौर निर्दलीय
1977 लक्ष्मीनारायण शर्मा जेएनपी
1980 ————————
से बाबूलाल गौर(8बार) बीजेपी
2013
2018 श्रीमती कृष्णा गौर बीजेपी
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अपना ही रिकॉर्ड तोडा
गोविंदपुरा सीट के लिए अब तक 13 चुनाव हुए। इसमें 8 बार यहां ‘कमल’ खिला…और इससे पहले तीन बार जनसंघ का चुनाव चिन्ह ‘दीपक’ रोशन हुआ..इस तरह देखा जाए तो गोविंदपुरा सीट बीजेपी का गढ़ ही नहीं ,उसका अभेद किला है। इसे कांग्रेस सिर्फ शुरुआती दो चुनाव में भेद पाई..
इस सीट के चुनावी समीकरण से अधिक महत्वपूर्ण यहां एक ही राजनेता का अजेय योद्धा बन जाना है..एक ऐसा दिग्गज जिसके नाम मप्र में सर्वाधिक 10 बार विधायक रहने का रिकॉर्ड है..यह गौरव उन्हें इसी सीट के मतदाताओं ने दिया..जहां से वह नौ बार जीते..बल्कि एक-दो अवसर तो ऐसे भी रहे जब गौर ने जीत का अपना ही पुराना रिकॉर्ड तोडा..लगातार जीत के चलते मजदूर से नेता बने गौर का कद भी बढ़ता गया….यहां तक कि वह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने..
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जातिगत समीकरण
कुल मतदाता 3,77,829
यूपी.बिहार के वोटर्स 20 से 22 हजार
असमिया,मलयालम 18 से 20 हजार
ईसाई मतदाता 10 से 12 हजार
ब्राह्मण 38 से 40 हजार
मुस्लिम 24 से 25 हजार
एससी,एसटी 35 से 40 हजार
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मसलन, 1990 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के नारीमल नरियानी को 25 हजार 113 मतों से हराया तो अगले ही चुनाव में कांग्रेस के ही डॉ आरके बिसारिया को 59 हजार 567 वोटों से शिकस्त दी..2003 के चुनाव में गौर ने कांग्रेस के शिवकुमार उरमलिया को 64 हजार 212 मतों से हराया तो 2013 के चुनाव में उन्होंने 70 हजार 644 मतों की सबसे बड़ी जीत दर्ज की..
पिछले चुनाव(2018) में भी बीजेपी उम्मीदवार कृष्णा गौर को सवा लाख से अधिक मत मिले और कांग्रेस उम्मीदवार एवं क्षेत्र से तीन बार के पार्षद गिरीश शर्मा को 46 हजार 359 मतों से करारी मात दी…
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गोविंदपुरा सीट बीजेपी का अभेद किला
56 साल में सिर्फ 2 चुनाव जीती कांग्रेस
सीट पर वर्ष 1974 से बीजेपी का कब्जा
गोविंदपुरा से 9 बार जीते बाबूलाल गौर
3 बार तोडा अपनी ही जीत का रिकॉर्ड
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आबादी के साथ बढ़ी समस्याएं
करीब पौने चार लाख मतदाताओं वाली गोविंदपुरा विधानसभा में 20 फीसदी हिस्सा भेल में आता है। जिसके चलते यहां यूपी-बिहार के करीब 15 से 20 हजार वोटर हैं। असमिया 8 हजार, मलयालम 8 से 10 हजार और ईसाई 10 हजार..राजधानी विकास के साथ ही गोविंदपुरा सीट का भी विस्तार हुआ..अनेक नई कालोनियां विकसित होने से जातिगत समीकरण भी बदले..तो समस्याएं भी बढ़ीं..
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क्षेत्र की प्रमुख समस्याएं
. क्षेत्र में नर्मदा जलापूर्ति शुरू नहीं
. पानी में कैल्शियम की अधिकता
. कालोनियों में प्रॉपर सीवेज नहीं
. गंदे नाले भी क्षेत्र की बडी समस्या
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इसके चलते पिछले चुनाव में ही कुछ जगह बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ विरोध के स्वर उभरे..क्षेत्र की समस्याओं से निपटने से बड़ी चुनौती रही …अपनों का विरोध,जिनकी निगाहें इस सुरक्षित सीट पर है..मौजूदा विधायक को भी इन चुनौतियों से गुजरना पड़ा है..वहीं कांग्रेस लगातार मिली पराजय के बाद इस सीट पर कोई बड़ा चेहरा तैयार नहीं कर सकी..
कांग्रेस के लिए यह सीट रही ‘प्रयोगशाला’

उसके लिए गोविंदपुरा एक प्रयोगशाला की तरह रही..जहां हर बार बदल-बदलकर उम्मीदवार उतारे जाते रहे..2023 में चुनाव लड़ने के मामले में किसकी लॉटरी खुलेगी और कौन होगा इस सीट का अगला सिकंदर..इसके लिए अगले चुनाव तक करना होगा इंतजार