जेन G के बाद जेन अल्फा की दस्तक: व्यवस्था के खिलाफ उठती नई पीढ़ी की आवाज
जेन जी के बाद जेन अल्फा भी व्यवस्था के खिलाफ मुखर है। मध्य प्रदेश में बच्चों के प्रदर्शन बताते हैं कि स्कूल, भोजन, पानी और सुविधाओं की अनदेखी अब नई पीढ़ी चुपचाप स्वीकार करने को तैयार नहीं।
व्यवस्था के खिलाफ असंतोष की आवाज अब सिर्फ युवाओं यानी जेन जीतक सीमित नहीं रही है।
नई तस्वीर यह है कि अब जेन अल्फा भी सवाल पूछने लगी है।
सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर बच्चे और किशोर सीधे सड़क, कलेक्ट्रेट और अधिकारियों के दरवाजे तक पहुंच रहे हैं।
मध्य प्रदेश में सिर्फ एक दिन में सामने आए अलग-अलग घटनाक्रम इस बदलते तेवर की ओर इशारा कर रहे हैं।
कहीं बच्चे अपने स्कूल को मर्ज किए जाने के खिलाफ पोस्टर लेकर उतरे,
छात्राओं ने धमकियों की परवाह किए बिना कलेक्टर तक शिकायत पहुंचाई।
खराब भोजन और दूषित पानी के खिलाफ छात्रावास की छात्राएं कलेक्ट्रेट पहुंचीं
तो कहीं करीब 35 छात्राएं रात में खिड़की की ग्रिल काटकर शिकायत करने थाने तक निकल पड़ीं।
यह केवल अलग-अलग जिलों की स्थानीय घटनाएं नहीं हैं।
इन घटनाओं में एक साझा संदेश छिपा है—
नई पीढ़ी व्यवस्था से सिर्फ आदेश सुनने के बजाय जवाब मांगने लगी है।
स्कूल में खड़ा जेन अल्फा कल का मतदाता है।
वह देख रहा है कि उसकी शिकायत पर व्यवस्था कैसी प्रतिक्रिया देती है।
उसे सुना जाता है या दबाने की कोशिश की जाती है।
उसकी समस्या का समाधान होता है या उसे सिर्फ आश्वासन देकर वापस भेज दिया जाता है।
यही अनुभव आने वाले वर्षों में व्यवस्था और राजनीति के प्रति उसकी सोच तय कर सकते हैं।
1.भोपाल में ‘सेव डीएमएस’ के साथ सड़क पर उतरे छात्र
राजधानी भोपाल में मंगलवार को शैक्षणिक संस्थान से जुड़े मुद्दे पर बच्चों का एक अलग तरह का विरोध सामने आया।
स्थानीय रीजनल स्कूल को केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) में मर्ज किए जाने के प्रस्ताव के खिलाफ छात्र-छात्राएं सड़क पर उतर आए।
बच्चों के हाथों में ‘सेव डीएमएस’समेत अलग-अलग संदेशों वाले पोस्टर थे।
छात्रों ने रीजनल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एसके गुप्ता को ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित संविलयन का विरोध किया।
छात्रों ने साफ कहा कि यदि उनकी बात नहीं सुनी गई तो वे चरणबद्ध आंदोलन करेंगे।
इससे पहले विदिशा में बस किराए से जुड़े मामले में बच्चों के विरोध की बात सामने आ चुकी थी।
मुद्दा चाहे स्थानीय हो, लेकिन तरीका बदल रहा है।
बच्चे अब केवल घर में शिकायत नहीं कर रहे, बल्कि सामूहिक रूप से अपनी बात रखने लगे हैं।
2-गुना में FIR की धमकी भी नहीं रोक सकी छात्राओं को
गुना जिले के पीएमश्री स्कूल धरनावदाकी छात्राओं ने भी मंगलवार को एक अलग उदाहरण पेश किया।
छात्राएं स्कूल की समस्याएं लेकर जनसुनवाई में कलेक्टर के सामने अपनी बात रखने के लिए निकलीं।
आरोप है कि उन्हें रोकने की कोशिश की गई
और FIR कराने तक की धमकी दी गई।
लेकिन छात्राएं पीछे नहीं हटीं।
वे जनसुनवाई में पहुंचीं और अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं रखीं।
छात्राओं का आरोप है कि स्कूल की मूलभूत सुविधाओं से लेकर अन्य समस्याओं पर आवाज उठाने पर उन्हें धमकाया जाता है।
प्रैक्टिकल परीक्षा में कम अंक देने या फेल करने की धमकी के आरोप भी लगाए गए।
परिजनों के साथ अभद्र व्यवहार और उन्हें स्कूल परिसर में प्रवेश से रोकने के आरोप भी सामने आए।
यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—
क्या नई पीढ़ी को डराकर चुप कराया जा सकता है?
कम से कम गुना की इन छात्राओं ने इसका जवाब अपने तरीके से दे दिया।
3-बालाघाट में पानी और भोजन पर बच्चों ने उठाई आवाज
बालाघाट जिले के शासकीय आदिवासी छात्रावासकी छात्राएं भी मंगलवार को कलेक्ट्रेट पहुंचीं।
उनकी शिकायत थी कि छात्रावास में पेयजल की किल्लत है
और उन्हें दूषित पानी का उपयोग करना पड़ रहा है।
छात्राओं ने भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए।
आरोप लगाया गया कि साफ-सफाई के नाम पर छात्राओं से पैसे लिए जाते हैं
और शिकायत करने पर उनके साथ अनुचित व्यवहार होता है।
छात्राओं ने अधीक्षिका को हटाने और जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
यहां भी तस्वीर वही है। बच्चे व्यवस्था की कमियों को सहन करने के बजाय सीधे प्रशासन तक पहुंच रहे हैं।
4-अशोकनगर में 7 किलोमीटर दूर स्कूल भेजने का विरोध
अशोकनगरमें मंंगलवार को शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-1 को सीएम राइज संदीपनी विद्यालयमें स्थानांतरित करने के फैसले के खिलाफ छात्र-छात्राएं और उनके पालक कलेक्ट्रेट पहुंच गए।
बच्चों का तर्क था कि नए स्कूल तक पहुंचने के लिए उन्हें करीब सात किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा।
इससे आने-जाने, सुरक्षा और पढ़ाई की व्यावहारिक समस्याएं पैदा होंगी।
छात्रों और पालकों ने कलेक्ट्रेट के मुख्य गेट के बाहर बैठकर विरोध किया।
अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर उनसे बातचीत करनी पड़ी।
यह विरोध केवल स्कूल भवन बदलने का नहीं था।
बच्चों और पालकों का सवाल था कि नीति बनाने से पहले उनकी रोजमर्रा की मुश्किलों को क्यों नहीं समझा गया?
5-धार में खिड़की की ग्रिल काटकर निकलीं 35 छात्राएं
सबसे चौंकाने वाला मामला धार जिले के निसरपुर स्थित माता शबरी आवासीय कन्या शिक्षा परिसर से सामने आया।
छात्रावास की व्यवस्थाओं से नाराज करीब 35 छात्राएं
रात करीब 10 बजे खिड़की से निकलकर कुक्षी थाने की ओर पैदल चल पड़ीं।
छात्राओं का आरोप था कि छात्रावास की क्षमता लगभग 50 बेड की है,
लेकिन वहां करीब 140 छात्राओं को रखा गया है।
भोजन और नाश्ते की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर शिकायतें की गईं।
उनका कहना था कि अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान व्यवस्थाएं सुधर जाती हैं,
लेकिन निरीक्षण खत्म होते ही स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।
रात में छात्राओं को सड़क पर देखकर स्थानीय लोगों ने सुरक्षा को लेकर चिंता जताई
और उनके साथ रहे। बाद में थाने में प्रशासनिक अधिकारियों ने उनकी शिकायतें सुनीं।
यह घटना सिर्फ छात्रावास की अव्यवस्था का मामला नहीं है।
यह बताती है कि जब शिकायत के सामान्य रास्ते प्रभावी नहीं लगते, तो नई पीढ़ी खुद रास्ता तलाशने लगती है।
नई पीढ़ी का तरीका अलग है, लेकिन संदेश साफ है
जेन अल्फा को मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर की पहली पूरी तरह डिजिटल पीढ़ी माना जाता है।
यह पीढ़ी बहुत कम उम्र से ही जानकारी, वीडियो और अलग-अलग विचारों तक पहुंच रखती है।
इसलिए उसके सवाल भी पहले की पीढ़ियों से अलग हो सकते हैं।
उसे यह समझाना आसान नहीं कि—
“अभी बच्चे हो, तुम्हें इन बातों से क्या मतलब।”
आज का बच्चा देखता है, तुलना करता है और सवाल पूछता है।
उसे स्कूल की व्यवस्था खराब दिखती है
तो वह अपनी शिकायत सार्वजनिक कर सकता है।
उसे पानी, भोजन या सुरक्षा की समस्या दिखती है
तो वह समूह बनाकर अधिकारियों तक पहुंच सकता है।
भोपाल से लेकर गुना, बालाघाट, अशोकनगर और धारतक सामने आए मामले इसी बदलते व्यवहार की झलक हैं।
राजनीति के लिए संकेत: वोटर बनने से पहले बनती है राय
राजनीतिक दल अक्सर युवा मतदाता को 18 साल की उम्र के बाद अपने अभियान का केंद्र बनाते हैं।
लेकिन नई पीढ़ी की राय 18 साल में अचानक नहीं बनती।
वह बचपन और किशोरावस्था में ही अपने आसपास की व्यवस्था को देख रही होती है।
स्कूल कैसा है?
छात्रावास में भोजन कैसा मिलता है?
शिकायत करने पर अधिकारी सुनते हैं या धमकाते हैं?
क्या बच्चों की सुरक्षा और सुविधा को फैसलों में महत्व मिलता है?
इन सवालों के जवाब ही भविष्य के नागरिक की व्यवस्था के प्रति धारणा बनाते हैं।
संदेश इससे आगे का है—जेन अल्फा को भी सुना जाए।
सवाल दबाने के बजाय समाधान की जरूरत
इन घटनाओं से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि हर छात्र विरोध कोई बड़ा राजनीतिक आंदोलन है।
हर मामले के अपने स्थानीय कारण और तथ्य हैं, जिनकी प्रशासनिक जांच और समाधान जरूरी है।
लेकिन लगातार अलग-अलग जगहों पर बच्चों और किशोरों का सड़क पर आना एक सामाजिक संकेत जरूर है।
नई पीढ़ी अब केवल अनुशासन के नाम पर चुप रहने को तैयार नहीं दिखती।
वह अपने स्कूल, भोजन, पानी, सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर सवाल कर रही है।