भोपाल:आरक्षक का अपहरण, FIR के लिए कई घंटे जूझता रहा स्टाफ

भोपाल में गश्त के दौरान आरक्षक को कथित तौर पर कार में बंधक बनाकर मारपीट करने का मामला सामने आया। FIR में करीब कई घंटे की देरी के बाद दो आरोपी गिरफ्तार हुए।

भोपाल।

पुलिस केवल अपराधियों से ही नहीं जूझती, कई बार अपने ही सिस्टम के भीतर कार्रवाई कराने की चुनौती भी सामने आ जाती है।

राजधानी के शाहपुरा थाने में आरक्षक के अपहरण और मारपीट का मामला इसका उदाहरण है।

हैरत की बात यह है कि जिस पुलिसकर्मी के साथ वारदात हुई, उसकी FIR दर्ज कराने के लिए उसके साथी पुलिसकर्मियों को ही करीब दो दिन तक मशक्कत करनी पड़ी।

सूत्रों के मुताबिक, मामला दर्ज होने से पहले थाने का स्टाफ कश्मकश में रहा।

आखिरकार निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के लामबंद होने के बाद सोमवार शाम FIR दर्ज की गई।

इतना ही नहीं, सूत्रों का दावा है कि मामला मीडिया तक नहीं पहुंचने देने के लिए स्टाफ को शपथ तक दिलाई गई।

खबर बाहर आने पर पुलिस की बदनामी और संबंधित पुलिसकर्मी के निलंबन का डर दिखाए जाने की बात भी सामने आई है।

यही वजह है कि अब इस मामले में सवाल सिर्फ आरक्षक के अपहरण पर नहीं,

बल्कि FIR दर्ज करने में हुई देरी और मामले को दबाए रखने की कोशिश पर भी उठ रहे हैं।

दो दिन तक FIR को लेकर क्यों बनी रही कश्मकश?

सूत्रों के अनुसार घटना शनिवार-रविवार की दरमियानी रात हुई थी।

इसके बावजूद FIR सोमवार शाम दर्ज की गई।

बताया जाता है कि इस दौरान थाने के स्टाफ के बीच कार्रवाई को लेकर असमंजस बना रहा।

आखिरकार कुछ पुलिसकर्मियों ने दबाव बनाया।

उनका तर्क था कि अगर आरोपियों को इसी तरह छोड़ा गया तो उनके हौसले बढ़ेंगे।

यह भी सवाल उठाया गया कि आज एक आरक्षक के साथ ऐसा हुआ है,

कल किसी दूसरे पुलिसकर्मी को भी निशाना बनाया जा सकता है।

FIR हुई, लेकिन खबर बाहर न जाने की शर्त पर?

सूत्रों के मुताबिक FIR दर्ज होने के बाद भी मामला सार्वजनिक नहीं करने को लेकर स्टाफ पर दबाव रहा।

विशेष रूप से पत्रकारों तक जानकारी नहीं पहुंचने देने की हिदायत दिए जाने की बात सामने आई है।

इसके लिए स्टाफ को शपथ दिलाने का भी दावा किया जा रहा है।

साथ ही, खबर लीक होने पर पुलिस की बदनामी और संबंधित व्यक्ति पर कार्रवाई की चेतावनी दिए जाने की बात भी सूत्र बता रहे हैं।

हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

नई भर्ती का आरक्षक है सुंदर

पीड़ित आरक्षक सुंदर पटेल हाल ही में पुलिस विभाग में भर्ती हुआ है।

उसकी पदस्थापना शाहपुरा थाने में बताई गई है।

8-9 अगस्त की रात वह आरक्षक मयंक ठाकुर के साथ रूटीन गश्त पर था।

इसी दौरान दोनों को दाना-पानी रेस्तरां के पास कार में शराब पीते दो युवक मिले।

पुलिसकर्मियों ने पूछताछ के बाद उन्हें थाने चलने के लिए कहा।

मयंक बाइक से थाने की ओर रवाना हो गए।

वहीं सुंदर आरोपियों की कार में बैठ गया।

थाने की जगह कार एमपी नगर की ओर दौड़ी

आरोप है कि दोनों युवक कार को थाने ले जाने के बजाय एमपी नगर की ओर ले गए।

इसके बाद आरक्षक को कथित तौर पर बंधक बनाकर घुमाया गया।

उसके साथ मारपीट की गई। उसे जंगल में ले जाकर फेंकने की धमकी भी दी गई।

सुंदर ने हिम्मत दिखाते हुए अपने साथी को मोबाइल से लोकेशन शेयर कर दी।

इसकी जानकारी आरोपियों को हुई तो उन्होंने कथित तौर पर फिर उसके साथ मारपीट की।

घेराबंदी हुई तो कार से बाहर फेंका

इस बीच पुलिस को घटना की जानकारी मिल गई। पुलिस ने आरोपियों की घेराबंदी शुरू कर दी।

खुद को घिरता देख आरोपियों ने डीबी मॉल के पास आरक्षक को कार से बाहर धकेल दिया और फरार हो गए।

बताया जाता है कि कि धकेलते समय पर एक आरोपी ने आरक्षक को पैर मारा।

इसके बाद CCTV फुटेज के आधार पर उनकी तलाश शुरू हुई।

दो आरोपी गिरफ्तार, लेकिन सवाल बाकी

पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।

उनके खिलाफ अपहरण, मारपीट, धमकी और शासकीय कार्य में बाधा सहित अन्य धाराओं में कार्रवाई की गई है।

लेकिन अब इस मामले का दूसरा सवाल ज्यादा अहम हो गया है।

अगर पुलिसकर्मी के साथ हुई वारदात की FIR के लिए भी थाने के भीतर संघर्ष करना पड़े, तो पुलिस की जवाबदेही किसके प्रति है?

यही वह पहलू है, जो इस पूरे मामले को महज आरक्षक के अपहरण की घटना से आगे ले जाता है।