नई दिल्ली: अमेरिका में काम करने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए बड़ी खबर है। अमेरिकी सरकार ने इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी समेत आठ प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से निलंबित कर दिया है। इस सूची में अमेरिकी कंपनियां माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी भी शामिल हैं। इस फैसले के बाद संबंधित कंपनियों के विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सॉन्डरलिंग ने 8 अक्टूबर को इस कार्रवाई की घोषणा की। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी इस दौरान मौजूद थे। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देकर अमेरिकी कामगारों के हितों को नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, सरकार ने प्रत्येक कंपनी के खिलाफ आरोपों का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया है।
किन भारतीय आईटी कंपनियों पर हुई कार्रवाई?
अमेरिकी श्रम विभाग की कार्रवाई के दायरे में छह प्रमुख आईटी सेवा कंपनियां शामिल हैं:
- इंफोसिस (Infosys)
- टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS)
- विप्रो (Wipro)
- एचसीएल टेक्नोलॉजीज (HCLTech)
- कॉग्निजेंट (Cognizant)
- कैपजेमिनी (Capgemini)
इसके अलावा माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को भी कार्यक्रम से निलंबित किया गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी के मामले में जारी संघीय जांचों का हवाला दिया है।
क्या है PERM प्रोग्राम?
PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन अमेरिका में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। इसके तहत नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद पर विदेशी कर्मचारी को स्थायी रूप से नियुक्त करने से अमेरिकी कामगारों के रोजगार और वेतन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
किसी कंपनी के PERM आवेदन रोक दिए जाने का मतलब है कि वह प्रभावित कार्यक्रम के तहत नए आवेदन जमा नहीं कर सकेगी और लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ेगी। इससे संबंधित विदेशी कर्मचारियों के स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की योजना में देरी हो सकती है।
हालांकि, इस कार्रवाई का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका में मौजूद सभी भारतीय कर्मचारियों के H-1B वीजा या पहले से जारी ग्रीन कार्ड अपने आप रद्द हो गए हैं।
अमेरिकी श्रम मंत्री ने क्या कहा?
कीथ सॉन्डरलिंग ने कहा कि सरकार का उद्देश्य वीजा प्रक्रिया में कथित दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों का नाम लेते हुए कहा कि इन कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित करना अमेरिकी कामगारों के लिए बड़ी जीत है।
माइक्रोसॉफ्ट को लेकर भी अमेरिकी अधिकारियों ने सवाल उठाए। प्रशासन ने आरोप लगाया कि कंपनी ने 2025 में लगभग 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि विदेशी कर्मचारियों के लिए वीजा और स्थायी निवास से जुड़े आवेदन भी किए गए।
ये आरोप अमेरिकी प्रशासन की ओर से लगाए गए हैं। इन्हें संबंधित कंपनियों के खिलाफ साबित हो चुके कानूनी निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भारतीय कर्मचारियों पर क्या पड़ेगा असर?
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ सकता है जो अमेरिका में काम कर रहे हैं और अपनी कंपनी के माध्यम से रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करने की तैयारी में हैं।
PERM प्रक्रिया रुकने से नए आवेदन दाखिल करने और पहले से लंबित मामलों को आगे बढ़ाने में परेशानी हो सकती है। खासकर उन कर्मचारियों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है जिनकी अमेरिका में लंबे समय तक काम करने की योजना ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर निर्भर है।
हालांकि, इसका वास्तविक असर प्रत्येक कर्मचारी की वीजा स्थिति, आवेदन के चरण और कंपनी की ओर से उपलब्ध वैकल्पिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।
TCS ने क्या कहा?
इस घटनाक्रम के बाद TCS ने कहा कि अमेरिकी PERM कार्यक्रम से निलंबन का उसकी कार्यबल रणनीति या ग्राहकों के कामकाज पर कोई बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। कंपनी के मुताबिक, उसने पिछले दो वर्षों में इस कार्यक्रम के तहत सीमित संख्या में आवेदन जमा किए थे। TCS ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका में 15,000 अतिरिक्त कर्मचारियों को नियुक्त करने की अपनी योजना के प्रति भी प्रतिबद्धता जताई है।
इससे संकेत मिलता है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी बाजार में स्थानीय भर्ती और कैंपस प्लेसमेंट पर अधिक निर्भर रह सकती हैं।
आगे क्या होगा?
अमेरिकी सरकार की यह कार्रवाई विदेशी कर्मचारियों के रोजगार आधारित स्थायी निवास कार्यक्रमों पर बढ़ती निगरानी का संकेत देती है। हालांकि, निलंबन कितने समय तक लागू रहेगा और प्रत्येक कंपनी के लंबित आवेदनों का क्या होगा, यह आगे की सरकारी कार्रवाई और जांच के नतीजों पर निर्भर करेगा।
भारतीय आईटी कंपनियों और अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के लिए अब सबसे अहम सवाल यही है कि इस फैसले से ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में कितनी देरी होगी और कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए क्या विकल्प अपनाएंगी।