नीमच वन वृत्त में लकड़ी तस्करी का साया, तीन ट्रक खैर पर किसका हक?
नीमच के एक निजी वेयरहाउस कैंपस में तीन ट्रक से अधिक खैर की लकड़ी लावारिस पड़ी है। स्वामित्व, संभावित तस्करी और वन विभाग की चुप्पी को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
एक ओर वन विभाग घरेलू उपयोग के लिए सिर पर जलाऊ लकड़ी ले जाते ग्रामीणों पर कार्रवाई कर अपनी सक्रियता का प्रदर्शन करता है, वहीं दूसरी ओर नीमच वन वृत्त में इमारती लकड़ी के बड़े खेल पर रहस्यमयी खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। हिंगोरिया रेलवे गेट के समीप स्थित एक निजी वेयरहाउस परिसर में करीब तीन ट्रक से अधिक मात्रा में खैर प्रजाति की लकड़ियां लंबे समय से खुले में पड़ी हैं, लेकिन न तो वन विभाग ने इन्हें जब्त किया है और न ही किसी व्यक्ति अथवा संस्था ने इन पर स्वामित्व का दावा किया है।
सूत्रों के अनुसार लकड़ियां गुल्लों और बड़े टुकड़ों के रूप में हैं, जिन्हें पेशेवर तरीके से काटा गया प्रतीत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च गुणवत्ता वाले खैर की इस मात्रा का बाजार मूल्य लाखों रुपये तक हो सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यह लकड़ी वन विभाग की जब्त अथवा संरक्षित संपत्ति है, तो नियमानुसार इसकी नीलामी कर राजस्व अर्जित किया जा सकता है। इसके विपरीत लकड़ियों का लंबे समय तक खुले में पड़े रहना न केवल सरकारी संपत्ति के नुकसान का कारण बन सकता है, बल्कि इससे संरक्षण व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि यह खैर नीमच वन वृत्त के क्षेत्रों से काटी गई हो सकती है। आशंका यह भी जताई जा रही है कि लकड़ियों को तस्करी के जरिए अन्यत्र भेजा जा रहा था, लेकिन मामला सार्वजनिक होने की आशंका के चलते इन्हें निजी परिसर में छोड़ दिया गया।
मौन साधे अधिकारी, जांच की बात कह रहे सीसीएफ
इस मामले में नीमच के डीएफओ ए.के. अटोदे ने कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है। मैदानी अमला भी वरिष्ठ अधिकारियों के रुख को देखते हुए खुलकर कुछ कहने से बच रहा है।
उज्जैन वन वृत्त के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) आलोक पाठक का कहना है कि वे मामले की जानकारी एकत्र कर आवश्यक तथ्य जुटाएंगे।
नीमच वन वृत्त उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती एवं कंटीले वनों के लिए जाना जाता है। गांधी सागर अभयारण्य क्षेत्र से जुड़े इस वन क्षेत्र में 70 से अधिक प्रजातियों के वृक्ष और वनस्पतियां पाई जाती हैं।
इनमें प्रमुख रूप से सागौन,खैर,सलाई, धावड़ा, बबूल, नीम, महुआ, तेंदू, पलाश और बांस शामिल हैं। वन विशेषज्ञों के अनुसार नीमच क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाला खैर भी मिलता है, जिसका उपयोग इसका उपयोग कत्था बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही कारण है कि इसकी अवैध कटाई और तस्करी लंबे समय से वन विभाग के लिए चुनौती बनी हुई है।
वन्यजीव मामलों में भी सवालों के घेरे में वन वृत्त
नीमच वन वृत्त हाल के वर्षों में केवल लकड़ी तस्करी ही नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण को लेकर भी विवादों में रहा है। इसी वर्ष जनवरी में एक तेंदुआ खेत में करंट युक्त बाड़ में फंस गया था। बाद में उसके सिर पर कुल्हाड़ी से वार कर हत्या किए जाने का मामला सामने आया। आरोप है कि विभाग ने मुख्य आरोपियों तक पहुंचने के बजाय केवल तीन मजदूरों के खिलाफ कार्रवाई की। मामले की शिकायत के बाद वन मुख्यालय ने दो सदस्यीय एसआईटी गठित की थी, जिसे एक माह में रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है।
उठ रहे अहम सवाल
👉तीन ट्रक से अधिक खैर की लकड़ी आखिर किसकी है?
👉यदि यह जब्त माल है तो इसकी नीलामी क्यों नहीं हुई?
👉क्या लकड़ियां किसी तस्करी नेटवर्क का हिस्सा थीं?
👉जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के पीछे क्या वजह है?
👉क्या नीमच वन वृत्त में अवैध कटाई और तस्करी का संगठित तंत्र सक्रिय है?
नीमच के जंगलों से जुड़े इन अनुत्तरित प्रश्नों ने वन संरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। स्थानीय लोगों की मांग है कि मामले की स्वतंत्र जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि लाखों रुपये मूल्य की यह खैर आखिर किसकी है और इतने लंबे समय से खुले में क्यों पड़ी है।
जनप्रचार नॉलेज
खैर का पेड़ लंबे समय से एक महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधन रहा है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। यह राष्ट्रीय संपदा ही नहीं बल्कि एक मूल्यवान उपज है। इसके चलते इसकी अवैध कटाई व परिवहन को प्रतिबंधित किया गया है। खैर का सबसे प्रसिद्ध उपयोग कत्था (कथा) के उत्पादन में होता है , जिसे इसकी भीतरी लकड़ी से निकाला जाता है। इस अर्क का व्यापक रूप से पान बनाने, रंगाई और पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसका बाजार मूल्य 30 से 80 रुपए प्रति किग्रा तक होता है।
कत्था के अलावा, खैर की लकड़ी अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए भी जानी जाती है। इसका उपयोग आमतौर पर कृषि उपकरणों, निर्माण कार्यों और ईंधन के लिए किया जाता है। खैर की लकड़ी कठोर होती है। यह अच्छी, मूल्यवान तथा टिकाऊ होती है। इसमें दीमक नहीं लगती और इस पर पाॅलिश अच्छी चढ़ती है। मकानों के खम्भे, तेल तथा गन्ने के रस निकालने वाले यंत्रों, हलों तथा औजारों के दस्ते भी अच्छे बनाये जाते हैं। इस लकड़ी का कोयला बहुत अच्छी श्रेणी का होता है। इस वृक्ष का औषधीय महत्व भी है।