बढ़वाई का लोकगीत बना महंगाई के खिलाफ जनभावना का चेहरा

बढ़वाई,रायसेन(MP)।

मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के बढ़वाई गांव में जन्मा लोकगीत ‘महंगाई डायन खाए जात है’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि आम लोगों की आर्थिक परेशानियों का सशक्त दस्तावेज बन चुका है।

ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करने वाला यह गीत समय के साथ लोक संस्कृति की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गया।

चौपालों से शुरू हुआ सफर

इस गीत की रचना जिले की गौहरगंज तहसील अंतर्गत आने वाले बढ़वाई के लोक कलाकार गयाप्रसाद प्रजापति ने की थी।

गांव की ‘बढ़वाई विलेज मंडली’ द्वारा इसे चौपालों और स्थानीय आयोजनों में गाया जाता था।

किसानों, मजदूरों और निम्न आय वर्ग के लोगों ने इसमें अपनी पीड़ा और संघर्ष की झलक देखी, जिससे यह तेजी से लोकप्रिय होता गया।

‘पीपली लाइव’ ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान

वर्ष 2010 में रिलीज हुई फिल्म ‘पीपली लाइव’ ने इस लोकगीत को देशभर में पहुंचा दिया। अभिनेता और लोकगायक रघुबीर यादव की आवाज़ में प्रस्तुत इस गीत ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।

फिल्म के जरिए यह गीत न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा और ग्रामीण भारत की आर्थिक चुनौतियों का प्रतीक बन गया।

महंगाई के खिलाफ जनभावनाओं की अभिव्यक्ति

गीत में महंगाई को ‘डायन’ के रूप में चित्रित किया गया है, जो आम आदमी की आय और जीवन स्तर को लगातार निगल रही है।

यही कारण है कि यह गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि महंगाई और आर्थिक असमानता के खिलाफ जनभावनाओं की अभिव्यक्ति बन गया।

डिजिटल दौर में भी बरकरार है लोकप्रियता

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार ने इस गीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया है।

यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे माध्यमों पर इसे लाखों लोग सुन और साझा कर रहे हैं।

समय बदलने के बावजूद गीत की प्रासंगिकता बनी हुई है क्योंकि महंगाई का मुद्दा आज भी आम जनता के जीवन को प्रभावित करता है। (Photo: Raghuveer Yadav)

लोकगीत से सामाजिक चेतना तक

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस गीत ने लोक संगीत की ताकत को नई पहचान दी है। अब कई युवा कलाकार सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर इसी शैली में नए गीत तैयार कर रहे हैं।

इससे लोक कला केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी बन रही है।

लोक कलाकारों को चाहिए नया संबल

सांस्कृतिक जानकारों का मानना है कि ग्रामीण कलाकारों को आर्थिक सहायता, रिकॉर्डिंग सुविधाएं और डिजिटल मंच उपलब्ध कराए जाएं।

इससे न केवल लोक परंपराएं संरक्षित होंगी, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज़ भी व्यापक स्तर तक पहुंच सकेगी।

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