नई दिल्ली।
दुनिया की आर्थिक व्यवस्था में एक बड़ा सवाल फिर सामने है।
क्या वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर की पकड़ कम हो सकती है?
इसी सवाल के बीच 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां ब्रिक्स(BRICS) शिखर सम्मेलन होने जा रहा है।
भारत इसकी मेजबानी कर रहा है।
सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक
सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
हालांकि, इसे डॉलर के खिलाफ किसी तत्काल मोर्चे के तौर पर देखना सही नहीं होगा।
असल चुनौती वैश्विक व्यापार में डॉलर पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की है।
स्थानीय मुद्राओं पर बढ़ रहा जोर
पिछले कुछ वर्षों में BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का प्रयोग बढ़ा है।
खासकर रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद इस दिशा में तेजी आई।
भारत ने भी रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई देशों के बैंकों को
स्पेशल रुपी वोस्ट्रो अकाउंट यानी SRVA खोलने की अनुमति दी है।
इसके बावजूद रास्ता आसान नहीं है।
किसी स्थानीय मुद्रा में तेज गिरावट आती है, तो दूसरे देश के कारोबारियों के लिए जोखिम बढ़ जाता है।
इसलिए केवल डॉलर को हटाना पर्याप्त नहीं है।
उसके स्थान पर भरोसेमंद और व्यापक रूप से स्वीकार्य भुगतान व्यवस्था भी जरूरी होगी।
रूस-चीन का मॉडल सबसे आगे

इस मामले में रूस और चीन का व्यापार अक्सर उदाहरण के तौर पर सामने आता है।
दोनों देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार काफी बढ़ा है।
इसके पीछे एक बड़ी वजह दोनों देशों का व्यापारिक ढांचा और पश्चिमी प्रतिबंध भी हैं।
लेकिन यही मॉडल हर BRICS देश के बीच आसानी से लागू हो जाए, यह जरूरी नहीं है।
भारत और रूस का उदाहरण इसे समझने के लिए पर्याप्त है।
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसके मुकाबले रूस को भारत का निर्यात उतना बड़ा नहीं है।
ऐसे में रुपये में भुगतान बढ़ने पर रूस के पास भारतीय मुद्रा का बड़ा भंडार जमा हो सकता है।
समस्या यह है कि उस रुपये का इस्तेमाल रूस को दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आसानी से करने में दिक्कत हो सकती है।
इसलिए व्यवहार में दिरहम, युआन और दूसरी मुद्राओं का इस्तेमाल भी करना पड़ता है।
असली चुनौती है ‘विश्वास’
BRICS देशों के लिए सबसे बड़ा सवाल केवल नई मुद्रा बनाना नहीं है। असली सवाल भरोसे का है।
किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा को प्रभावी बनाने के लिए तीन चीजें महत्वपूर्ण होती हैं।
पहला—स्थिरता।
दूसरा—तरलता।
तीसरा—दुनियाभर में स्वीकार्यता।
अमेरिकी डॉलर को ये तीनों फायदे लंबे समय से हासिल हैं।
इसीलिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने के बावजूद डॉलर को अचानक हटाना आसान नहीं होगा।
क्या एक साझा BRICS करेंसी संभव है?

BRICS देशों के बीच साझा मुद्रा की चर्चा समय-समय पर होती रही है।
लेकिन फिलहाल इसे तत्काल वास्तविकता मानना जल्दबाजी होगी।
सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं अलग-अलग हैं। उनकी मौद्रिक नीतियां भी अलग हैं।
चीन की अर्थव्यवस्था बड़ी है। भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है।
रूस की अर्थव्यवस्था ऊर्जा और कमोडिटी पर काफी निर्भर है।
वहीं दूसरे सदस्य देशों की आर्थिक प्राथमिकताएं अलग हैं।
इसलिए एक साझा मुद्रा के लिए केवल राजनीतिक सहमति पर्याप्त नहीं होगी।
इसके लिए लंबे समय तक वित्तीय और संस्थागत समन्वय भी जरूरी होगा।
भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का विस्तार कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।
सबसे पहले, इससे कुछ कारोबारों में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है।
दूसरे, भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ सकती है।
तीसरे, पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर किसी एकतरफा निर्भरता का जोखिम कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
लेकिन भारत के लिए रुपये को वैश्विक व्यापार की बड़ी मुद्रा बनाना भी आसान नहीं है।
इसके लिए मजबूत वित्तीय बाजार, पर्याप्त मुद्रा तरलता और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा जरूरी होगा।
डॉलर की पकड़ अभी भी मजबूत

इसके बावजूद एक तथ्य नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है।
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर की जगह कोई दूसरी मुद्रा तुरंत ले रही है।
फिलहाल तस्वीर अधिक संतुलित है।
एक तरफ डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश है।
दूसरी तरफ वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की मजबूत स्थिति बनी हुई है।
अमेरिका के लिए चुनौती कितनी बड़ी?
अगर आने वाले वर्षों में अधिक देश स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाते हैं,
तो इसका असर अमेरिकी वित्तीय प्रभाव पर पड़ सकता है।
विशेषकर तब, जब वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां और मजबूत होती हैं।
अमेरिका के लिए डॉलर सिर्फ व्यापार की मुद्रा नहीं है।
यह उसकी व्यापक वित्तीय ताकत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि, इसे तत्काल आर्थिक संकट कहना भी अतिशयोक्ति होगी।
डॉलर की जगह लेने के लिए किसी वैकल्पिक व्यवस्था को लंबे समय तक स्थिरता और भरोसा साबित करना होगा।
BRICS का अगला कदम क्या होगा?

यही वजह है कि नई दिल्ली सम्मेलन का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि BRICS डॉलर को हटाने की घोषणा करता है या नहीं।
ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि सदस्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को कितना व्यावहारिक बनाते हैं।
साथ ही, डिजिटल भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग कितना बढ़ता है।
ऊर्जा व्यापार के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था कितनी मजबूत होती है।
और सबसे बढ़कर, सदस्य देशों के बीच वित्तीय भरोसा कितना बढ़ता है।
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