केंद्र सरकार ने E85 और E100 जैसे हाई-एथनॉल ईंधन पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए नियमों में संशोधन को मंजूरी दे दी है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के इस फैसले से भारत में ज्यादा एथनॉल इस्तेमाल करने वाली गाड़ियों को बाजार में लाने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, सभी पेट्रोल कारों में E100 ईंधन नहीं डाला जा सकेगा। इसके लिए वाहन का खास तकनीक से बना और प्रमाणित होना जरूरी है।
E100 फ्यूल वाली गाड़ियों को सरकार की मंजूरी, अब एथनॉल से चलेंगी कारें; जानें क्या बदलेगा
नई दिल्ली: भारत में वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में संशोधन करते हुए E100 और E85 जैसे हाई-एथनॉल ईंधन पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए नियामकीय रास्ता साफ कर दिया है। इस फैसले से वाहन कंपनियों को ज्यादा एथनॉल इस्तेमाल करने वाली गाड़ियां बाजार में उतारने में मदद मिलेगी।
सरकार का मानना है कि घरेलू स्तर पर उत्पादित एथनॉल के इस्तेमाल से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और कुछ हानिकारक उत्सर्जन को घटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस तकनीक का व्यापक इस्तेमाल वाहन कंपनियों की तैयारी, ईंधन की उपलब्धता और कीमत पर भी निर्भर करेगा।
क्या है E100 फ्यूल और कैसे चलेगी कार?
E100 ऐसा ईंधन है जिसमें लगभग पूरी मात्रा एथनॉल की होती है। वहीं, E85 में मात्रा के हिसाब से 85 प्रतिशत तक एथनॉल और बाकी पेट्रोल होता है। एथनॉल का उत्पादन गन्ने, मक्का और दूसरे जैविक स्रोतों से किया जा सकता है।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन खास तौर पर इस तरह तैयार किए जाते हैं कि वे पेट्रोल और एथनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले ईंधन पर चल सकें। वाहन के डिजाइन और प्रमाणन के अनुसार इनमें E85 या E100 का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन गाड़ियों में इंजन कंट्रोल सिस्टम ईंधन की संरचना के अनुसार इंजन के संचालन को समायोजित करता है। इसके लिए इंजन और फ्यूल सिस्टम के पुर्जों को भी ज्यादा एथनॉल के अनुकूल बनाना पड़ता है।
क्या आपकी मौजूदा पेट्रोल कार में भी चलेगा E100?
इस फैसले के बाद वाहन मालिकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौजूदा पेट्रोल कारों में भी E100 डलवाया जा सकता है। इसका जवाब है—नहीं, जब तक वाहन को इस ईंधन के लिए विशेष रूप से डिजाइन और प्रमाणित नहीं किया गया हो।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि E85 और E100 का इस्तेमाल केवल उन वाहनों में किया जा सकता है, जिन्हें इनके लिए बनाया और प्रमाणित किया गया है। केवल E20 पेट्रोल के अनुकूल होने का मतलब यह नहीं है कि कोई गाड़ी E85 या E100 पर भी चल सकती है।
इसलिए मौजूदा कार या बाइक में बिना निर्माता की मंजूरी के ज्यादा एथनॉल वाला ईंधन इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वाहन मालिकों को फ्यूल कम्पैटिबिलिटी स्टिकर और कंपनी की ओर से दी गई गाइडलाइन जरूर देखनी चाहिए।
सरकार के फैसले से वाहन कंपनियों को क्या फायदा होगा?
नियमों में बदलाव से वाहन निर्माता कंपनियों को E100 जैसे हाई-एथनॉल ईंधन पर चलने वाली गाड़ियों के प्रमाणन और बाजार में लॉन्च की प्रक्रिया में मदद मिलेगी। भारत में फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर काम पहले से चल रहा है और कुछ वाहन निर्माता इस दिशा में मॉडल विकसित कर रहे हैं।
जून 2026 में मारुति सुजुकी ने अपनी वैगनआर का फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण पेश किया था, जिसे E20 से E100 तक के एथनॉल-पेट्रोल मिश्रण के अनुकूल बनाने की योजना के तहत विकसित किया गया है। हालांकि, किसी मॉडल की वास्तविक ईंधन क्षमता और बाजार में उपलब्धता उसके प्रमाणन तथा कंपनी की आधिकारिक घोषणा पर निर्भर करेगी।
नियमों में बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि सभी कंपनियों की E100 गाड़ियां तुरंत बाजार में उपलब्ध हो जाएंगी। इसके लिए तकनीकी परीक्षण, वाहन प्रमाणन और ईंधन वितरण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।
क्या E100 फ्यूल से पेट्रोल का खर्च कम होगा?
एथनॉल आधारित ईंधन का इस्तेमाल पेट्रोल की खपत और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकता है। इससे घरेलू स्तर पर उत्पादित जैव ईंधन की मांग बढ़ने की संभावना भी है।
लेकिन E100 का इस्तेमाल करने से हर स्थिति में वाहन चलाने का खर्च कम होगा, इसकी गारंटी नहीं है। एथनॉल में प्रति लीटर पेट्रोल की तुलना में कम ऊर्जा होती है। इसलिए समान दूरी तय करने के लिए कुछ वाहनों में ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। वास्तविक बचत ईंधन की कीमत, वाहन की माइलेज और उसके इंजन की तकनीक पर निर्भर करेगी।
पर्यावरण के लिहाज से कितना फायदेमंद है E100?
एथनॉल का इस्तेमाल कुछ प्रकार के निकास प्रदूषकों को कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, यदि एथनॉल का उत्पादन कम कार्बन उत्सर्जन वाली प्रक्रिया से किया जाता है, तो पूरे ईंधन चक्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने की संभावना रहती है।
हालांकि, पर्यावरण को होने वाला वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि एथनॉल किस कच्चे माल से बनाया गया है, उसके उत्पादन में कितनी ऊर्जा खर्च हुई है और उसे वाहनों तक पहुंचाने की प्रक्रिया कितनी कार्बन-गहन है।
भारत में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का भविष्य
E85 और E100 को लेकर नियमों में बदलाव भारत में वैकल्पिक ईंधन तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम है। इससे वाहन निर्माताओं को हाई-एथनॉल ईंधन के अनुकूल मॉडल विकसित करने के लिए स्पष्ट नियामकीय ढांचा मिलेगा।
हालांकि, इस तकनीक की सफलता के लिए सिर्फ गाड़ियों का निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। पेट्रोल पंपों पर उपयुक्त ईंधन की उपलब्धता, उसकी कीमत, वाहन की लागत और ग्राहकों का भरोसा भी अहम होगा।
E100 फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को मिली मंजूरी से भारत में एथनॉल आधारित परिवहन को बढ़ावा मिल सकता है। लेकिन अभी सभी पेट्रोल कारों में E100 का इस्तेमाल संभव नहीं है। केवल इस ईंधन के लिए डिजाइन और प्रमाणित वाहन ही इसका उपयोग कर सकेंगे।