रवि अवस्थी।भोपाल / आज बात उस सीट की…जो मप्र ही नहीं देश में भी हाईप्रोफाइल सीट के नाम से जानी जाती है..जी हां हम बात कर रहे हैं..विदिशा विधानसभा सीट की..विदिशा वह जाना पहचाना नाम जिससे पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी,पूर्व विदेश मंत्री स्व.सुषमा स्वराज व सांसद एवं विधायक के तौर पर प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम भी जुडा रहा है…
विदिशा जिसका नाम इतिहास में दर्ज है.. कभी भेलसा के नाम से जाने वाला यह शहर मौर्य वंश के प्रसिद्ध सम्राट अशोक की ससुराल रही .. तो महात्मा बुद्ध का भी इस नगर से नाता रहा.. विदिशा दुनिया का एकमात्र ऐसा जिला जहां रावण की भी पूजा होती है… पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी हों या पूर्व विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज या प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विदिशा ने सभी को अपनाया और सियासत में उन्हें ऊंचाई भी दी..
इन नामों से स्पष्ट है कि विदिशा भाजपा का गढ़ रहा है..इसके चलते वर्ष 1977 से 2013 तक अर्थात 46 सालों तक भाजपा यहां अपराजेय रही… इस मिथक को पिछले चुनाव में कांग्रेस के शशांक भार्गव ने तोड़ा ..
इसकी वजह भी भाजपा की अंदरुनी कलह बताई जाती है.. वर्ष 2018 में मिली शिकस्त से बीजेपी ने सबक सीखा या नहीं, यह तो आने वाला चुनाव बताएगा.. लेकिन इससे पहले जानते हैं,अब तक के चुनावों में कैसा रहा इस सीट का सियासी मिजाज…
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.. मप्र के साथ ही विदिशा विधानसभा का गठन हुआ .. राजधानी से सटे होने से मिला वीआईपी सीट का दर्जा … अब तक इस सीट के लिए 15 बार हुए आम चुनाव .. कांग्रेस को सिर्फ 3 बार ही मिल सकी इस सीट से जीत .. शेष समय बीजेपी या इसके पूर्ववर्ती संगठन रहे काबिज .. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का भी है विदिशा से गहरा नाता …………………………………………………………………………
मप्र की प्रमुख नदियों में एक बेतवा ने विदिशा को भी सींचा है..इसके चलते इसे बेतवा नगरी के नाम से भी जाना गया… मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही विदिशा सीट भी अस्तित्व में आई.. साल 1957 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस को जीत हासिल हुई ..
तब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी हुआ करता था.. इसी बीच मध्य भारत में भी हिंदू महासभा सक्रिय हो चुकी थी.. विदिशा सीट के लिए हुए अगले चुनाव में उसने कांग्रेस से यह सीट छीन ली —- 1967 में भारतीय जनसंघ के एस सिंह ने यहाँ परचम फहराया — 1972 में विदिशा के मतदाताओं ने कांग्रेस को मौका दिया …
लेकिन 1977 में लागू हुए आपातकाल ने विदिशा के मतदाताओं को भी हिलाकर रख दिया..इसके बाद तो जैसे यहां के मतदाताओं ने कांग्रेस से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया… लेकिन 2018 के चुनाव में उसका भाजपा मोह टूटा और कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर वापसी की….. आइए जानते हैं इस सीट से कब कौन जीता…
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विदिशा से निर्वाचित विधायक व उनका दल 1957 हीरालाल पिप्पल कांग्रेस 1962 गोरेलाल हिंदू महासभा 1967 एस सिंह जनसंघ 1972 सूर्य प्रकाश कांग्रेस 1977 नरसिंह गोयल जनता पार्टी 1980 मोहर सिंह भाजपा 1985 मोहर सिंह भाजपा 1990 मोहर सिंह भाजपा 1993 मोहर सिंह भाजपा 1998 सुशीला देवी भाजपा 2003 गुरुचरण सिंह भाजपा 2008 राघव जी भाजपा 2013 शिवराज सिंह भाजपा 2014 कल्याण सिंह भाजपा 2018 शशांक भार्गव कांग्रेस
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अब तक के परिणाम बताते हैं कि विदिशा सीट पर भाजपा का ज्यादा प्रभाव रहा है…. क्षेत्र के जातिगत समीकरण यूं तो परिणाम के लिए कोई मायने नहीं रखते…लेकिन सूबे के दोनों ही प्रमुख दलों में टिकट के दावेदारों की बढ़ती तादाद ने जातिगत राजनीति को यहां भी बढ़ावा दिया…..
करीब 2.20 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर दांगी मतदाताओं की बड़ी संख्या है…..जो चुनाव के नतीजे को प्रभावित करने में अहम भूमिका अदा करते हैं…..दूसरी बड़ी संख्या अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं की है.. इनके अलावा कुशवाहा, जैन व अन्य समाज के मतदाता जिसके पाले में रहें —– , सीट उसी दल की होती है……
बीते तीन साल में भाजपा विशेषकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विदिशा सीट पर भी सभी वर्गों के मतदाताओं को साधने की पूरी कोशिश की है…. वहीं कांग्रेस के मौजूदा विधायक भी वापसी के लिए भरसक जतन कर रहे हैं….. देखना होगा कि 2023 के चुनाव में भाजपा की होगी अपने गढ़ में वापसी होती है या पंजा ही आगे भी दिखाएगा कमाल……
————————————- कुल मतदाता 2.20 लाख कुशवाहा 22 हजार दांगी 25 हजार अनुसूचित जाति 35 हजार जैन 15 हजार ब्राह्मण व अन्य शेष