मप्र विधानसभा में नया समीकरण : विश्नोई बन सकते हैं मुख्य सचेतक, नहीं कर पाएंगे विजयवर्गीय की होड़

रवि अवस्थी,भोपाल।
मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत के साथ ही सत्ता पक्ष में नई राजनीतिक हलचल दिखाई दे रही है।

चर्चा है कि सत्तारूढ़ भाजपा जल्द ही विधानसभा में अपना मुख्य सचेतक नियुक्त कर सकती है। इस पद के लिए जबलपुर के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अजय विश्नोई का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है।

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विश्नोई को यह जिम्मेदारी मिलती भी है, तो भी वे संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के प्रभाव और अधिकारों की बराबरी नहीं कर पाएंगे।

अंदरूनी खींचतान का असर?

बीते दिनों इंदौर में हुए दूषित जलकांड के बाद नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और मुख्यमंत्री मोहन यादव के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। विजयवर्गीय सरकार की कार्यशैली को लेकर सार्वजनिक और कैबिनेट बैठकों में भी मुखर रहे हैं।

ऐसे में मुख्य सचेतक की नियुक्ति को भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन साधने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है।

विश्नोई के संकेत मजबूत

बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर कृतज्ञता ज्ञापन का प्रस्ताव अजय विश्नोई ने ही पेश किया। इसे इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व उन पर भरोसा जता सकता है।

मुख्य सचेतक की दौड़ में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा का नाम भी चर्चा में है, लेकिन फिलहाल विश्नोई आगे दिखाई दे रहे हैं।

क्यों नहीं कम होगा विजयवर्गीय का कद?

राजनीतिक समीकरण चाहे जो बनें, संसदीय कार्य मंत्री का पद संवैधानिक और शासकीय है। वह भारसाधक मंत्री हैं।

सत्र बुलाने से लेकर स्थगन और विधायी कार्य संचालन में संसदीय कार्य मंत्री की अहम भूमिका होती है।

व्यवस्था संबंधी मुद्दे उठाने का अधिकार भी मुख्य रूप से संसदीय कार्य मंत्री को होता है।

इसके उलट, मुख्य सचेतक की भूमिका मुख्यतः पार्टी विधायकों को व्हिप जारी करने और सदन में मार्गदर्शन तक सीमित रहती है।

ऐसे में विजयवर्गीय की औपचारिक और राजनीतिक ताकत पर सीधा असर पड़ना आसान नहीं माना जा रहा।

कैबिनेट दर्जे की संभावना

सूत्रों के अनुसार, यदि अजय विश्नोई को मुख्य सचेतक बनाया जाता है तो उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया जा सकता है।

इससे एक ओर जबलपुर और महाकौशल क्षेत्र में राजनीतिक संतुलन साधा जाएगा, तो दूसरी ओर वरिष्ठ नेता को संतुष्ट करने का संदेश भी जाएगा।

सीताशरण क्यों पीछे?

सीताशरण शर्मा का नाम भी चर्चा में है, लेकिन उनका सौम्य स्वभाव और पूर्व में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका निभा चुके होने के कारण वे इस पद के लिए उतने आक्रामक दावेदार नहीं माने जा रहे।

साथ ही, वे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के प्रभाव क्षेत्र से आते हैं, और वर्तमान प्रदेश राजनीति में शक्ति संतुलन बदला हुआ माना जा रहा है।

तीसरा नाम भी चर्चा में

यदि विश्नोई और शर्मा पर सहमति नहीं बनती, तो बुरहानपुर की तेजतर्रार विधायक एवं पूर्व मंत्री अर्चना चिटनिस का नाम भी सामने आ सकता है।

संगठन और सरकार के बीच संतुलन साधने की रणनीति में उनका विकल्प भी विचाराधीन बताया जा रहा है।

अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व के हाथ

मुख्य सचेतक की नियुक्ति को लेकर अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को करना है।

फिलहाल भाजपा नेतृत्व “तेल और तेल की धार” परखने की मुद्रा में है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह नियुक्ति महज संगठनात्मक फेरबदल है या फिर विधानसभा की राजनीति में नए शक्ति समीकरणों की शुरुआत।

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