दीपक विश्वकर्मा,उमरिया।
मध्य प्रदेश में हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के सरकारी दावों के बीच उमरिया जिले के एक आदिवासी गांव की तस्वीर जमीनी हकीकत बयां कर रही है। भीषण गर्मी के दौर में यहां ग्रामीणों को प्यास बुझाने के लिए डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित एक झिरिया का दूषित और बदबूदार पानी ढोना पड़ रहा है।
क्या बच्चे,क्या वृद्ध ? जंगेला में हर एक की चिंता एक घड़ा पानी को लेकर है। भले ही वह मटमैला व प्रदूषित हो।
इसके लिए वे गांव से करीब डेढ़ किमी.दूर एक प्रदूषित झिरिया पर आश्रित हैं।
हकीकत यह कि ग्रामीण पानी नहीं,बीमारी का खतरा ढो रहे हैं।
कागजों में बह रहा पानी, हकीकत में प्यासा जंगेला
उमरिया जिले की करकेली जनपद पंचायत अंतर्गत जंगेला गांव में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। गांव का एकमात्र कुआं गर्मी बढ़ने के साथ ही सूख गया है, जिससे सैकड़ों ग्रामीणों के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। हालात ऐसे हैं कि महिलाएं और बच्चे रोजाना लंबी दूरी तय कर जंगल के बीच स्थित झिरिया से पानी लाने को मजबूर हैं।
भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष
ग्रामीणों का कहना है कि झिरिया में जमा पानी न केवल गंदा है, बल्कि उससे दुर्गंध भी आती है। इसके बावजूद पीने के लिए यही एकमात्र सहारा बचा है।
भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीणों की परेशानी यह सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर करोड़ों रुपये की नल-जल योजनाओं का लाभ इन तक क्यों नहीं पहुंच पाया।
सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच अंतर


















