सत्ता के गलियारे से…..जहां फाइलों से ज्यादा इशारे बोलते हैं।

‘सत्ता के गलियारे से..’ मध्य प्रदेश की राजनीति, नौकरशाही और शासन व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक साप्ताहिक स्तंभ है। इसका उद्देश्य कटाक्ष के माध्यम से जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों को उनकी जवाबदेही का अहसास कराना है।

‘सत्ता के गलियारे से..’ मध्य प्रदेश की राजनीति, नौकरशाही और सत्ता के भीतर की उन हलचलों पर पैनी नजर डालता है, जो अक्सर सुर्खियों से परे रह जाती हैं। यह व्यंग्य, कटाक्ष और तथ्यों के संतुलित मिश्रण के साथ जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कार्यशैली पर सवाल उठाता है। इसका मकसद किसी व्यक्ति या दल का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था को उसकी जवाबदेही का आईना दिखाना है।

रवि अवस्थी,भोपाल। (9826019364)

मौन भी मायने रखता है

एक समय लिकर किंग विजय माल्या की कंपनी शॉ वालेस के नाम रही भोपाल की करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन दो साल पहले फटाफट बिक गई।

दिलचस्प यह रहा कि 2007 से लंबित लीज विवाद की अपील पर 16 साल बाद, सितंबर 2023 में (तब सरकार चुनावी मोड में थी )अचानक सुनवाई हुई।

इसके कुछ ही महीनों में जमीन दो बार हाथ भी बदल गई।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। करीब 60 हजार वर्गफीट हिस्से पर पौधरोपण और ट्रीटमेंट प्लांट प्रस्तावित था।

कुछ अफसरों ने सुझाव दिया कि यहां बहुमंजिला व्यावसायिक परिसर बनाया जाए। इससे सरकारी जमीन भी बचती और नया विकल्प भी मिलता।

विडंबना देखिए, अब सरकार अलग से मल्टी कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के लिए जमीन तलाश रही है।

विभागीय मंत्री चैतन्य कश्यप ने जांच का भरोसा दिया था। भरोसा आज भी कायम है, बस जांच का इंतजार लंबा हो गया।

आखिर कुछ फाइलें दौड़ती हैं, तो कुछ में सन्नाटा ही सबसे तेज चलता है।

शायद इसलिए इस मामले में मौन भी बहुत कुछ कह रहा है।

संवेदनशीलता के अलग-अलग पैमाने

उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा अपने विभाग के अफसरों के प्रति खासे संवेदनशील हैं।

सिंगरौली के उप पंजीयक अशोक सिंह परिहार की बर्खास्तगी के अगले ही दिन सेवा बहाली इसका बड़ा उदाहरण है।

तर्क था कि अपील लंबित है और तब तक सेवा से बाहर रहने पर उन्हें “अपूर्तनीय क्षति” होगी।

सरकार की यह संवेदनशीलता काबिले-गौर है।

आखिर दो-चार महीने का वेतन रुकना किसी भी अफसर के लिए चिंता की बात हो सकती है!

हालांकि, विभागीय गलियारों में चर्चा कुछ और है।

सूत्रों के मुताबिक अधिकारी के खिलाफ कई शिकायतें पहले से लंबित हैं।

मुख्य सचिव के आदेश की अवहेलना का मामला भी तीन साल से दर्ज बताया जाता है।

आरोप सही हैं या नहीं, यह जांच तय करेगी।

लेकिन “अपूर्णीय क्षति” की चिंता जिस तेजी से दिखी, वैसी फुर्ती आम कर्मचारी या नागरिक के मामलों में कम ही नजर आती है।

शायद सरकारी व्यवस्था में भी संवेदनशीलता के अपने-अपने पैमाने हैं।

मनमर्जी का काम

राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (सिया) के अध्यक्ष जहां अपने अधिकारों को लेकर लंबे समय तक संघर्ष करते रहे।

 वहीं इसकी एक सदस्य अधिकार मिलने के बाद भी उनका इस्तेमाल करने से बचती दिख रही हैं।

मामला सिंगरौली में अवैध रेत खनन की शिकायत का है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के निर्देश पर सिया सचिव सुधीर कोचर ने मई में सदस्य डॉ. सुनंदा सिंह रघुवंशी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई।

समिति को 15 दिन में रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन तीन महीने बाद भी जांच शुरू तक नहीं हो सकी।

पहले सदस्य ने प्रदेश से बाहर होने और फिर अस्वस्थता का हवाला दिया।

अब उन्होंने समिति से अलग होने का मन बना लिया है।

उधर, सिया सचिव उनके लिखित इनकार का इंतजार कर रहे हैं, ताकि नई समिति गठित की जा सके।

इस पूरी हीलाहवाली का सबसे बड़ा फायदा किसे मिला, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

जिस अवैध खनन की जांच होनी थी, उसके कई संभावित साक्ष्य मानसून की बारिश के साथ बह चुके होंगे।

ऐसे में सवाल यही है कि जब कार्रवाई भी मनमर्जी से हो, तो जवाबदेही आखिर किससे पूछी जाए?

अपने हिसाब से सरकार !

मुरैना में थोड़ी बारिश ने नगर निगम की तैयारियों की पोल खोल दी।

सड़कें तालाब बनीं तो महापौर शारदा सोलंकी जवाब मांगने पहुंचीं।

निशाने पर थे निगम कमिश्नर सत्येंद्र सिंह धाकरे।

सवालों के जवाब में उन्होंने साफ कहा-“मैं अपने हिसाब से ही काम करूंगा।”

बस, यही एक वाक्य पूरी व्यवस्था का आईना बन गया।

अगर अफसर अपने हिसाब से काम करेंगे, तो सरकार, जनप्रतिनिधि और जनता किस हिसाब में आएंगे?

प्रदेश की नौकरशाही में ऐसे उदाहरण नए नहीं हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि कोई यह बात बंद कमरे में कहता है, तो कोई खुलकर।

धाकरे 2009 बैच के प्रमोटी आईएएस हैं।

वह, अगले साल सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

शायद इसलिए उन्हें अब किसी के हिसाब से चलने की जरूरत महसूस नहीं होती।

लेकिन सवाल वही है-अफसर अपने हिसाब से चलेगा या सरकार और जनता के हिसाब से?

नागपुर में मिला सम्मान, बन गई कुलगुरु की योग्यता!

धार्मिक महाकुंभ में मिला सम्मान भी अब कुलगुरु बनने की योग्यता माना जा सकता है।

आम लोग इसे सम्मान मानें, लेकिन सरकारी जवाब अलग कहानी कहता है।

कांग्रेस विधायक नारायण सिंह पट्टा ने विधानसभा के पिछले सत्र में पूछा कि एक निजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु को ‘वेद-वैदिक मार्तंड’ और इसी विषय में पीएचडी किस विश्वविद्यालय ने दी।

जवाब में उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि संबंधित व्यक्ति को धर्म-संस्कृति महाकुंभ, नागपुर में इस उपाधि से सम्मानित किया गया।

यानी उपाधि किसी विश्वविद्यालय ने नहीं दी, लेकिन उसे योग्यता मानने से सरकार भी पीछे नहीं हटी।

जबकि संबंधित अधिनियम में कुलगुरु के लिए वैदिक शास्त्र में उत्कृष्ट उपाधि का प्रावधान है।

अब सवाल यह है कि यदि धार्मिक आयोजनों के सम्मान ही विश्वविद्यालयी योग्यता का विकल्प बन जाएं, तो यूजीसी और विश्वविद्यालयों की डिग्रियों का महत्व क्या रह जाएगा?

वैसे मामला ‘नागपुर’ से जुड़ा है, इसलिए सत्ता की चुप्पी भी कई सवाल छोड़ जाती है।