इस वर्ष मार्च में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रमुख सचिव, सहकारिता विभाग को पत्र लिखकर लघु वनोपज संघ को RTI के दायरे में लाने की मांग की। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि संघ की स्थापना शासन की करोड़ों रुपए की अंशपूंजी से हुई है तथा उसका व्यापार और विपणन सार्वजनिक हित का विषय है। इसलिए सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 2(h) के तहत उसे “पब्लिक अथॉरिटी” माना जाना चाहिए।
कांग्रेस विधायक डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने पिछले बजट सत्र में ध्यानाकर्षण सूचना के जरिए यह विषय विधानसभा में उठाया। उन्होंने कहा कि संघ मध्यप्रदेश शासन की 40 करोड़ रुपए की अंशपूंजी से स्थापित संस्था है और उसका संचालन भी सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जाता है।
पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में संघ के प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज की उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि विवाद अब इस बात तक सीमित नहीं रह गया कि संघ RTI के दायरे में आए या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि यदि संघ वास्तव में सार्वजनिक धन, सरकारी अधिकारियों और शासन के नियंत्रण से संचालित है तो पारदर्शिता से बचने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?