भोपाल। क्या निजी महत्वकांक्षाएं पार्टी से बड़ी हैं। यह सवाल आजकल भाजपा में तेजी से उठ रहा है। कर्नाटक के पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी के बाद छत्तीसगढ़ में बीजेपी राज्य इकाई के पूर्व अध्यक्ष नंदकुमार साय द्वारा सोमवार को पार्टी से किनारा कर लिए जाने से उठ रहे हैं। इधर,मप्र में भी पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र एवं पूर्व मंत्री दीपक जोशी ने भी आगामी 6 मई को भाजपा छोड़ कांग्रेस में जाने का ऐलान किया है।
पार्टी ने बहुत कुछ दिया,फिर भी..
सावदी जहां चुनाव का टिकट कटने से नाराज हैं तो साय व जोशी ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया है। सवाल यही कि जो आज अपनी निजी महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए पार्टी से किनारा कर गए या करने जा रहे हैं कि क्या पार्टी ने अब तक उन्हें कुछ नहीं दिया। तीनों ही नेताओं ने वर्षों तक विभिन्न संवैधानिक पद पर रहते मलाई काटी।
नंदकुमार साय तो अविभाजित मप्र,बाद में छग प्रदेश इकाई के अध्यक्ष,महासचिव,तीन बार लोकसभा सांसद,दो बार राज्य सभा सांसद रहे। सावदी बीजेपी सरकार में डिप्टी सीएम रहे तो जोशी मंत्री।उनके पिता कैलाश जोशी को पार्टी ने मुख्यमंत्री भी बनाया था। आज जब नई पीढ़ी को बढ़ाने और परिवार से इतर दूसरों को मौका देने का निर्णय हुआ तो उपेक्षा का आरोप लगाकर ये तीनों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
अभी और भी कतार में
सूत्रों का दावा है कि अभी तो और भी लोग इसी कतार में हैं। मप्र के पूर्व मंत्री दीपक जोशी की ही बात करें तो दीपक लंबे समय से स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।वह भाजपा के टिकट पर वर्ष 2018 में हाटपिपल्या विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े थे लेकिन हार गए थे। वर्ष 2020 में कमल नाथ सरकार गिरने के दौरान हाटपिपल्या से कांग्रेस विधायक मनोज चौधरी भाजपा में आ गए और भाजपा के टिकट पर विधायक बन गए। चुनाव हार चुके जोशी सरकार व पार्टी दोनों से बहुत अपेक्षा रखते हैं। मंशा पूरी नहीं हुई तो बीजेपी छोड़ने का मन बना लिया।
पचा नहीं पा रहे हैं आयतित नेताओं को
दरअसल,प्रदेश भाजपा इस वक्त एक दोराहे पर खड़ी है। एक और केंद्रीय नेतृत्व का जोर परिवारवाद के इतर नई पीढ़ी को आगे लाने पर है। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहयोग से भाजपा चौथी बार सत्ता में तो आ गई,लेकिन सिंधिया के साथ बीजेपी में आए उनके समर्थकों,विधायकों को मूल भाजपाई पचा नहीं पा रहे हैं।मूल वर्सेज आयतित के बीच का झगड़ा सिर्फ ग्वालियर,चंबल ही नहीं कुछ अन्य जिलों में भी है।
माना जा रहा है कि चुनाव के वक्त टिकट कटने या समुचित तवज्जो नहीं मिलने पर कुछ अन्य नेता भी पार्टी छोड़ कांंग्रेस सहित किसी अन्य दल का दामन थाम सकते हैं। कुछ सीटों को छोड़ कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने योग्य प्रभावी व जिताऊ चेहरों का टोटा है। इसके चलते कांग्रेस भाजपा के कई पूर्व मंत्री और पूर्व विधायकों पर डोरे डाल रही है।
ये भी खड़ी कर सकते हैं राह में मुश्किलें
ये दिग्गज नेता भाजपा के मिशन-2023 की राह में मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। कद्दावर मंत्री रहे जयंत मलैया, डा गौरीशंकर शेजवार, रामकृष्ण कुसमरिया जैसे पूर्व मंत्री आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। इसी तरह पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन अपनी बेटी को टिकट देने के लिए पार्टी पर दबाव बना रहे हैं।
पार्टी ने इंकार किया तो वे भी पैंतरा बदल सकते हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश भाजपा में बदली हुई परिस्थितियां नवंबर-दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव में अपनों से ही मुसीबत के संकेत दे रही है। जो चेहरे पार्टी में कभी कद्दावर माने जाते थे, कैबिनेट का हिस्सा थे, अब वही जीत के रास्ते पर कांटे बिछा सकते हैं।