मप्र:दलबदल की सियासत में जिला बनवाने की शर्त !

सत्ता के गलियारे से … रवि अवस्थी,Bhopal (4/8/2024)   
** संघं शरणम गच्छामि
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ दशहरा बाद नया साल शताब्दी वर्ष के रूप में मनाने की तैयारी में है। संघ व बीजेपी का रिश्ता चोली-दामन सा रहा है। लगातार एक दशक केंद्र की सत्ता में रहते एक दौर ऐसा भी आया जब बीजेपी को लगने लगा कि उसे संघ की जरूरत नहीं,लेकिन हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उसकी गलत फहमी दूर कर दी।नतीजों पर रार हुई तो संघ भी’भगवान’को आईना दिखाने से नहीं चूका।

इसके बाद से केंद्र ही नहीं राज्यों की इकाईयां भी’संघ शरणम गच्छामि’की भूमिका में आ गई हैं। आएं भी क्यों न ?बीजेपी को इस मुकाम तक पहुंचाने में संघ की ही भूमिका सबसे बड़ी रही है। ऐसे में आगे सुशासन व संगठन के कामकाजों में संघ की रीति-नीति की छाया दिखे तो आश्चर्य नहीं।

** यहां भी हाथ खाली
बीजेपी ने पहले विभिन्न राज्यों के प्रभारियों की सूची जारी की फिर दस राज्यपालों की,लेकिन दोनों ही सूची में मप्र,कहीं नजर नहीं आया। राष्ट्रीय संगठन की ही बात करें तो कार्यकारिणी सदस्यों के तौर पर भले ही मप्र के नेताओं की भरमार हो लेकिन राष्ट्रीय पदाधिकारियों में दो नाम छोड़ कर तीसरे को जगह नहीं।यह दो नाम भी जातिगत समीकरण के लिहाज से जगह पा सके।
मप्र को बीजेपी का ओरिजन स्टेट व यहां की इकाई को आदर्श माना जाता है। विधानसभा हो या लोकसभा चुनाव,बीते एक-डेढ़ दशक में मप्र भाजपा ने पार्टी की मनचाही मुराद पूरी की।बावजूद इसके,हृदय प्रदेश के नेताओं की ऐसी उपेक्षा!वाकई हैरान करने वाली है।
** सतर्कता में ही समझदारी
सतर्कता वह भी अतिरिक्त तौर पर बरती जाए तो संभावित दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। मप्र की डॉ.मोहन यादव सरकार ने गुजरते सप्ताह में इसी से जुड़े दो अहम फैसले लिए। पहला,दिल्ली में हुए कोचिंग हादसे के बाद मप्र में तलघरों में चलते संस्थानों की जांच। दूसरा,उज्जैन के एक आश्रम की करतूत सामने आने पर प्रदेशभर के छात्रावासों,आश्रमों की जांच के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की 11 सदस्यीय टीम का गठन।
सभी अधिकारी दो माह में कम से कम तीन दिन इन संस्थानों का औचक निरीक्षण कर संबंधित महकमों के एसीएस को अपनी रिपोर्ट देंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि त्योहारी सीजन में मिलावटखोरों की भी नकेल कसी जाएगी और जारी अभियान की निरंतरता बनी रहेगी।
** पंचायत मंत्री के रुख से हड़कंप
मप्र के पंचायत,ग्रामीण विकास व श्रम मंत्री प्रहृलाद पटेल की सख्त मिजाज वाली कार्यशैली ने उनसे से जुड़े विभागों के अफसरों के कान खड़े कर दिए हैं। पंचायत के बाद पटेल ने हाल ही में राज्य बीमा निगम के अफसरों को फटकार लगाई। पटेल ने दो टूक लहजे में कहा-मुझे ज्ञान देने की कोशिश मत करो,मैं केंद्र में रहा हूं।
अगली बार आओ तो तैयारी के साथ।अगली बैठक श्रम विभाग की समीक्षा को लेकर है। बताया जाता है कि इसकी तैयारी को लेकर विभागीय अफसरों के हाथ-पैर फूले हुए हैं।
** मामला जिलों का है
दलबदल की सियासत में अब अपने क्षेत्र को जिला बनवाने की शर्त भी अहम हिस्सा बन गई है। नया मामला छिंदवाड़ा जिले की जुन्नारदेव विधानसभा का है। यहां से कांग्रेस के सुनील उईके विधायक हैं। जुन्नारदेव को जिला बनाने की प्रक्रिया शुरू होती देख,परासिया के कांग्रेस विधायक सोहन वाल्मीक भी सीएम से मिले।
बीना विधायक निर्मला सप्रे पहले ही अपनी जिले वाली शर्त पूरी न होने से विधायकी छोड़ने को राजी नहीं। यह अलग बात है कि विधानसभा ​सचिवालय ने उन्हें नोटिस थमा उनकी मुश्किलें बढ़ा दी है।
बहरहाल,प्रस्तावित नागदा व चौचाड़ा को शामिल किया जाए तो जुन्नारदेव 58 वां जिला बनने की तैयारी में है। इसी तरह,नए जिले बनते रहे तो अगले विधानसभा चुनाव तक यह आंकड़ा कहीं सौ की गिनती न पार कर जाए!
**उप चुनाव को लेकर रस्साकसी
रिक्त हुई विजयपुर व बुदनी विधानसभा सीटों को लेकर चुनाव आयोग ने भले ही कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया,लेकिन राज्य के दोनों ही प्रमुख दल बीजेपी,कांग्रेस ने अपनी गोटियां बैठाना शुरू कर दिया है। बुदनी को लेकर पूरी तरह आश्वस्त बीजेपी ने विजयपुर में विकास की गंगा बहाना शुरू कर दिया है।
वहीं कांग्रेस दोनों ही सीटों के लिए तय प्रभारियों का मन अब तक नहीं टटोल पाई। पहले बुदनी के लिए उसने पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह व साथ में इछावर के पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल को जिम्मा सौंपा। जयवर्धन ने रुचि नहीं दिखाई तो अब उन्हें विजयपुर का प्रभारी बनाया गया। अपनी कोठी की नपाई मामले में राहत पा चुके डॉ गोविंद सिंह तो यहा जयवर्धन के साथ रहेंगे ही।
** चर्चा में रहने की कवायद
बात-बे-बात चर्चा में बने रहना कोई,कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से सीखे।लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद पार्टी प्रदेश इकाई के दिग्गज जहां चुप्पी साधे हुए हैं। वहीं दिग्विजय कभी आरएसएस की तारीफ को लेकर तो कभी विरोध को लेकर चर्चा में हैं।
कांग्रेस सांसद ने हाल ही में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ को पत्र सौंपकर संघ की तारीफ में कहे गए शब्द वापस लेने और इस मामले में विस्तार से अपनी बात रखने की मांग रखी है। जबकि इससे पहले वह संघ की कार्यशैली की तारीफ कर पार्टी कार्यकर्ताओं को नसीहत दे चुके हैं। संसद सत्र शुरू होने से पहले उन्होंने राजगढ़ लोकसभा चुनाव नतीजे को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की तो नर्सिंग घोटाले मामले में कार्यकर्ताओं संग सड़क पर भी उतरे।
** दुविधा में सियासतदार
एससी,एसटी के आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला स्वाभाविक तौर पर समाज व राजनीति की दशा और दिशा बदलने वाला है। कोटे में कोटा लागू हुआ तो इन वर्गों की सियासत करने वालों के दिन लदना तय है। दुविधा बड़ी है। किसकी पैरवी करें,किसकी नहीं। गौंड की पैरवी की तो ​भील नाराज और भीलों के पक्ष में खड़े हुए तो भिलाला व कौल नाराज। हर बात में सियासत करने वाले राजनीतिज्ञ इस गजब फैसले पर चुप्पी साधे फिलहाल,’तेल और इसकी धार’ देखने का काम कर रहे हैं।
** फिर मुझसे बुरा कोई नहीं होगा
लांजी से बीजेपी विधायक राजकुमार कर्राहे और पूर्व मंत्री अंचल सोनकर ने प्रशासन व पुलिस को अपने-अपने अंदाज में सुधरने की समझाइश दी। कर्राहे झोला छाप डॉक्टर्स के खिलाफ छापामार कार्यवाही से नाराज हैं। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी दी कि कार्यवाही नहीं रुकी तो फिर उनसे बुरा कोई नहीं होगा।
वहीं सोनकर अपने क्षेत्र की थाना पुलिस से नाराज हैं। उन्होंने इलाके के सीएसपी को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि वे थाना नहीं सुधार पाए तो फिर यह काम उन्हें करना पड़ेगा। बतौर जनप्रतिनिधि दोनों से ऐसी अपेक्षा तो नहीं की जा सकती,लेकिन व्यवस्था का कड़वा सच भी कई बार जनप्रतिनिधियों को आईना दिखाने के लिए मजबूर कर देता है।
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** वन बल प्रमुख की पीड़ा
वह दौर नहीं रहा,जब अफसर अपने मातहतों को डांटने-फटकारने के साथ उन्हें संरक्षित भी करते थे। अब ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते हैं। मप्र के वन बल प्रमुख असीम श्रीवास्तव ने हाल ही में इसी कार्यशैली का परिचय दिया। उन्होंने वन सचिव को पत्र लिखकर चंबल अभ्यारण्य के मैदानी कर्मचारियों पर दर्ज एकतरफा आपराधिक प्रकरण का विरोध किया।
पीसीसीएफ ने पुलिस की कार्यशैली को वन कर्मियों का मनोबल तोड़ने वाला बताया।अब बारी विभाग के नए मंत्री रामनिवास रावत की है। जो कभी दस्यु उन्मूलन को लेकर अपने तीखे तेवरों के लिए पहचाने जाते थे।
** हर्ष दीक्षित का दिल्ली कनेक्शन
वर्ष 2013 बैच के आईएएस अधिकारी व राजगढ़ कलेक्टर हर्ष दीक्षित 5साल के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के निज सचिव बनाए गए। केंद्र से देर शाम आदेश जारी होते ही 24घंटे में दीक्षित का रिलीविंग आदेश भी जारी हो गया।
यह सब इतने ताबड़तोड़ व अप्रत्याशित तरीके से हुआ कि राज्य मंत्रालय के जिम्मेदार भी हैरत में पड़ गए। दीक्षित के दिल्ली कनेक्शन की टोह लेने का जतन भी हुआ। बताया जाता है कि हर्ष की प्रतिनियुक्ति में मप्र कैडर के ही एक वरिष्ठ अधिकारी की अहम भूमिका है।जिनका नाम मप्र के भावी सीएस के तौर पर चर्चा में रहा है।
** टी.इलैया राजा रुके
हर्ष दीक्षित के साथ ही साल 2009 बैच के आईएएस टी.इलैया राजा का नाम भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में जाने को लेकर चर्चा में रहा।बताया गया कि वह केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह के निज सचिव बनाए जा रहे हैं।सूत्रों की मानें तो तैयारी पूरी थी,लेकिन मामला डीओपीटी में ही अटक गया।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के कार्यकाल में टी.इलैया राजा भिंड,रीवा,जबलपुर व इंदौर के कलेक्टर रहे।जनहितैषी कार्यों ने उन्हें इन जिलों में लोकप्रिय भी बनाया। वर्तमान में राज्य पर्यटन निगम के एमडी व तमिलनाडु मूल के राजा ने हाल ही कोयम्बटूर में आयोजित इंडस्ट्रियल कांफ्रेंस में सीएम डॉ यादव के दुभाषिया की भूमिका भी अदा की थी। वह मल्टी टैलेंटेड हैं।माना जा रहा है कि देर-सबेर उन्हें भी प्रतिनियुक्ति पर बुलाया जा सकता है।
** सहकारिता तक पहुंची नर्सिंग की आंच
मंत्रालय स्तर पर दस आला अफसरों की नई पदस्थापना व 4 को दिए गए अतिरिक्त प्रभार में सरकार ने एक साथ कई संकेत दिए।नए सीएस का रास्ता तो साफ हुआ ही,ग्रामीण विकास में पीएस दीपाली रस्तोगी की पदस्थापना कर एक म्यान में दो तलवार वाले हालात बना दिए।इस विभाग में एसीएस मलय श्रीवास्तव हैं।
इधर,सहकारिता का अतिरिक्त प्रभार वन विभाग के प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल को सौंपा गया है। वर्णवाल कुछ दिन पहले ही पूर्व वन मंत्री नागर​ सिंह चौहान के आदेश को पलटकर चर्चा में रहे।नर्सिंग मामले ने हेल्थ ही नहीं,सहकारिता पर भी असर डाला।
** मनमानी का मजबूत इलाज
नर्मदापुरम् में राजस्व से जुड़े एक मामले में मातहतों ने जिला कलेक्टर सोनिया मीणा की भी किरकिरी करवा दी। साल 2013 बैच की आईएएस सोनिया यूं तो ब्रिलियंट अफसर हैं,लेकिन इसी मामले में सीधे न्यायाधीश को पत्र लिखना उन्हें ही नहीं मातहतो को भारी पड़ गया। न्यायाधीश ने न केवल जिला कलेक्टर के खिलाफ कार्रवाई का आदेश जारी कर 30 अगस्त तक कोर्ट को सूचित करने का आदेश सुनाया,बल्कि उनके मातहत अपर कलेक्टर देवेंद्र कुमार सिंह व तहसीलदार राकेश खजूरिया के भी मजिस्ट्रियल पॉवर छीनते हुए,इनकी नए
सिरे से ट्रेनिंग कने व जब तक काबिल न हों जाएं,अधिकार नहीं दिए जाने के आदेश दिए।
** मैदानी अफसरों के लिए सबक
न्यायालय का यह आदेश उन मैदानी अफसरों के लिए सबक हैं जो खुद को’भगवान’समझने की गलतफहमी पाल लेते हैं। कुमार व खजूरिया ने भी कोर्ट के आदेश के इतर जमीन का नामांतरण करने की बजाए मनमाने तरीके से इसका बंटवारा कर डाला। कलेक्टर भी इसी मामले में कोर्ट से हाजिरी माफी चाहती थीं। यूपीएससी परीक्षा में 36वीं रैंक हासिल करने वाली व केरल कैडर में सीएस स्तर के सेवानिवृत अधिकारी की बिटिया सोनिया का बतौर कलेक्टर,यह दूसरा जिला है।
राष्ट्रपति मैडल पर भारी पड़ा बस हादसा
बिहार में अपनी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति मैडल से सम्मानित साल 1989 बैच के आईपीएस संजय झा पर गुना का बस हादसा भारी पड़ा। इस मामले में परिवहन आयुक्त पद से हटाए गए झा ने अपने कार्यकाल के आखिरी सात महीने पुलिस मुख्यालय में ही बतौर डीजी ट्रेनिंग गुजारे।
झा रिटायर हुए तो उनकी जगह 91 बैच के एडीजी आलोक रंजन को स्पेशल डीजी बनने का अवसर मिला।स्पेशल डीजी के तौर पर अगला नंबर 91 बैच की ही प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव का है।यानी एक ही बैच के दो अधिकारी विशेष पुलिस महानिदेशक होंगे।
फिर चर्चा में नियाज खान
मप्र कैडर से साल 2014 बैच के प्रमोटी आईएएस अधिकारी नियाज खान एक बार फिर अपने नए उपन्यास ‘वार अगेंस्ट कलियुग’ को लेकर चर्चा में हैं। खान का यह दसवां उपन्यास है। इससे पहले वह ‘ब्राह्मण द ग्रेट’ व ब्राह्मण द ग्रेट पार्ट-2 जैसे उपन्यास लिख चुके हैं।
फिल्म ‘द कश्‍मीर फाइल्‍स’ फिल्‍म को लेकर अपने विवादित ट्वीट पर शोकॉज नोटिस का सामना कर चुके खान का नजरिया बिल्कुल बदला हुआ है। अब वह उपन्यासों के जरिए सनातन धर्म को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ बताने के साथ ही सिर्फ ब्राह्मणों का राष्ट्र का असली मार्गदर्शक मानते हैं। उनका नया उपन्यास भी कुछ यही कहता है। इसमें बॉलीवुड पर भी निशाना साधा गया है।
15 अगस्त पर कैसे बजे बैंड ?
सरकार के नए फरमान पर पुलिस मुख्यालय सभी जिलों में स्वतंत्रता दिवस पर पुलिस बैंड बजाने की तैयारी में है,लेकिन इसे लेकर उसके शुरुआती तीन आदेशों ने उसकी मुश्किल बढ़ा दी। दरअसल,इन आदेशों में पीएचक्यू ने मैदानी सिपाहियों से उनकी मंशा पूछकर बैंड टीम बनाने व इन्हें पर्याप्त ट्रेनिंग दिलाने की बात कही।
अब अपराधियों का बैंड बजाने की मंशा से पुलिस सेवा में आए सिपाही बैंड वादक बन क्यों अपने कॅरियर पर विराम लगाएं ? इसके चलते कुछ ने हाईकोर्ट की इंदौर तो कुछ ने ग्वालियर खंडपीठ का रुख किया। एक जगह से स्टे तो दूसरी जगह से संगीत को देवभाषा बताकर इस पर अमल का आदेश मिला।
इस दोहरे आदेश से पुलिस मुख्यालय भी सांसत में और सिपाही भी।अफसरी दिखाते हुए जबरिया बैंड टीम बनाने की कोशिश नाकाम रही तो 25 सिपाही एकमुश्त निलंबित कर दिए गए। निलंबन अपनी जगह है,लेकिन असल समस्या अनट्रेंड टीम से बैंड धुन निकलवाने की है।अपराध से जुड़ा मामला होता तो किसी को भी बैंड मास्टर बता पेश कर देते।

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