भोपाल।
राजधानी में अतिक्रमण पर नियंत्रण को लेकर नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कोहेफिजा स्थित अहमदाबाद पैलेस के सामने खड़ा बहुमंजिला निर्माण इसका ताजा उदाहरण बन गया है, जिसे जिम्मेदार अधिकारी समय रहते रोक नहीं सके।
शुरुआत में कार्रवाई, फिर ठंडे बस्ते में मामला
वार्ड क्रमांक 7 में इस निर्माण को लेकर लगातार शिकायतें मिलने के बाद नगर निगम ने जनवरी 2025 में बिल्डर को नोटिस जारी किए थे।
स्वेच्छा से निर्माण हटाने की चेतावनी भी दी गई, लेकिन इसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई।
नतीजतन, एक मंजिला निर्माण धीरे-धीरे बहुमंजिला इमारत में तब्दील हो गया।
विधानसभा तक पहुंचा मामला
मामला विधानसभा के बजट सत्र में भी उठा। कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने इस पर सवाल किया।
जिस पर नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने जवाब में निर्माण को अतिक्रमण मानते हुए कार्रवाई के प्रयासों की बात कही।
उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस बल समय पर उपलब्ध नहीं हो सका और बाद में मामला न्यायालय में पहुंच गया, जहां से स्थगनादेश जारी हो गया।
मंत्री ने अपने जवाब में दावा किया कि संबंधित प्रकरण में किसी अधिकारी द्वारा बिल्डर को संरक्षण प्रदान नहीं किया गया।
बड़ा सवालयही है कि बड़ा सवाल यदि किसी स्तर पर संरक्षण नहीं था, तो अवैध निर्माण इतनी तेजी से कैसे बढ़ता गया? और समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी?
पुलिस बल पर तर्क, लेकिन सवाल बरकरार
नगर निगम द्वारा पुलिस सहयोग न मिलने का तर्क दिया गया, लेकिन पुलिस सूत्रों के मुताबिक, बल की मांग समयबद्ध और प्रभावी तरीके से नहीं की गई।
अगस्त 2025 में भेजा गया पत्र अवकाश और बारिश के चलते प्रभावी नहीं हो सका, जिसके बाद कार्रवाई टल गई।
स्टे के बाद भी जारी रहा निर्माण
हाईकोर्ट से यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के बावजूद निर्माण गतिविधियां पूरी तरह थमी नहीं।
आरोप है कि निगम ने स्टे हटाने के लिए भी कोई ठोस कानूनी प्रयास नहीं किए, जिससे निर्माण लगभग पूरा हो गया।
जिम्मेदारों की चुप्पी
मामले को लेकर नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन सहित अन्य अधिकारियों से जवाब मांगा गया,
लेकिन कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
इससे प्रशासन की भूमिका को लेकर और सवाल खड़े हो रहे हैं।
सख्त अफसर, लेकिन सिस्टम बेअसर?
भोपाल नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन (2015 बैच) की छवि एक कड़क और ईमानदार आईएएस अधिकारी की रही है।
सिवनी में कलेक्टर रहते हुए उनके कामकाज को सराहा गया।
वहीं,रीवा सहित अन्य पदस्थापना के दौरान भी उन्होंने प्रभावी प्रशासन की पहचान बनाई।
बीते साल जब उन्हें सिवनी से हटाकर नगर निगम भोपाल की जिम्मेदारी दी गई, तब स्थानीय लोगों ने उन्हें डोली में बैठाकर भावुक विदाई दी-जो उनकी लोकप्रियता का संकेत था।
लेकिन राजधानी भोपाल में तस्वीर कुछ अलग बन रही है। निगम में सुधार के प्रयासों के बावजूद निचले स्तर का अमला अपनी कार्यशैली बदलने को तैयार नहीं है।
नतीजतन, कई मामलों में कार्रवाई कागजों तक सीमित रह जाती है। इसके चलते ‘सिस्टम कीजड़ता,सख्ती पर भारी’ पड़ रही है।