सत्ता के गलियारे से .. रवि अवस्थी, राष्ट्रपति चुनाव ने बढ़ाया धर्मसंकट
MP Satta ke Galiyare se:भाजपा ने पूर्व राज्यपाल व आदिवासी नेत्री श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर बड़ा दांव खेला है। श्रीमती मुर्मू का नाम घोषित होते ही झारखंड मुक्ति मोर्चा,बसपा सहित अन्य क्षेत्रीय दल उन्हें समर्थन देने के लिए मजबूर हुए।
मप्र की ही बात करें तो सपा,बसपा,एक निर्दलीय व कांग्रेस के बड़वाह विधायक को अपने पाले में लाकर भाजपा मप्र में पहले ही इस चुनाव में मजबूत स्थिति में है। पार्टी आधार पर बसपा की शेष एक मात्र विधायक रामबाई ने भी समर्थन देने की बात कही,लेकिन कांग्रेस के फैसले ने उसके उन विधायकों का धर्मसंकट बढ़ा दिया जो जनजातीय वर्ग से हैं
और चाहते हुए भी अपने वर्ग की महिला उम्मीदवार का खुला समर्थन नहीं कर सकते। उनकी इस दुविधा ने भाजपा को तंज कसने का मौका दे दिया है।
महामहिम ने बदली तस्वीर
प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने गत 8 जुलाई को अपना एक साल का कार्यकाल पूरा किया। राज्यपाल बनने से पूर्व वह गुजरात में आदिवासी वर्ग का बड़ा चेहरा रहे हैं। इस वर्ग के कल्याण व उनके विकास के लिए वह हमेशा प्रयासरत रहे।
बतौर राज्यपाल मप्र में भी उन्होंने यह भूमिका अब तक बखूबी अदा की और बेहद खामोशी से वह यहां भी इस वर्ग के बीच अपनी खास जगह बनाने में सफल रहे। पटेल लोगों के बीच पहुंचकर काम करने में भरोसा रखते हैं। उनकी सक्रियता का आकलन इसी बात से किया जा सकता है कि साल भर में उन्होंने जनजातीय बाहुल्य व संबंधित 45 जिलों का दौरा किया।
इस वर्ग के ढाई सौ से अधिक कार्यक्रमों में शामिल हुए। जनजातीय वर्ग में पाई जाने वाली सिकल सेल बीमारी उन्मूलन के लिए विशेष अभियान शुरू कराया।
संभवतया यह पहला मौका है जब राजभवन में इस वर्ग के लिए एक अलग प्रकोष्ठ गठित कर संबंधित योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी भी शुरू की गई। इससे संबंधित विभागों के कामकाज में भी गति आई,जो अब तक अपने ठंडे रुख के लिए जाने जाते थे।
अपनी बला,दूसरे के सिर
निकाय चुनाव के पहले चरण में हुए कम मतदान को लेकर मचा बवाल उक्त कहावत को चरितार्थ करने वाला है। बड़ा मुद्दा मतदाता पर्ची नहीं बंटने का बनाया जा रहा है। हकीकत यह कि मतदाता पर्चियां बांटे जाने के मामले में राजनीतिक दल व प्रत्याशी पहले भी कभी प्रशासनिक अमले पर आश्रित नहीं रहे।
मौजूदा चुनाव में भी प्रत्येक प्रत्याशी ने अपना यह धर्म बखूबी निभाया। मतदाता पर्चियां ही कम मत प्रतिशत का आधार होती तो जो वोटिंग हुई,वह भी न होती। जानकारों की मानें तो असल वजह है,संशोधित मतदाता सूची।
इसे कोविड काल के लिए भारत निर्वाचन आयोग द्वारा तय गाइडलाइन के आधार पर तैयार किया गया। जिस पर समय रहते न तो संबंधित राजनीतिक दलों ने गौर किया, न राज्य निर्वाचन आयोग ने। इस चूक को छिपाने,ठीकरा अब मैदानी अमले पर फोड़ा जा रहा है।
कम मत प्रतिशत ने खोली कलई
नगरीय निकाय चुनाव में हुए कम मतदान ने प्रदेश की सियासत में उबाल ला दिया है। विशेषकर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल भाजपा इसे लेकर खासी परेशान है। वजह भी है। कम मतदान के चलते,बड़ा झटका तो पार्टी के वोट शेयर बढ़ाने वाले अभियान को लगा। जिसे लेकर अब तक बड़े दावे किए जाते रहे।
इसके अलावा बूथ डिजिटलाइजेशन,त्रिदेव,पन्ना प्रमुख, एक बूथ-पांच यूथ व बूथ माइक्रो मैनेजमेंट जैसे कार्यक्रमों की हकीकत भी सामने आ गई। यही हाल रहा तो मिशन-23 का लक्ष्य कहीं दूर की कौड़ी न बन जाए।
अपना-अपना फन
स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में भाजपा की तुलना में कांग्रेस का चुनाव प्रचार फीका कहा जा सकता है। इस चुनाव में स्टार प्रचारक तो कोई है नहीं,बावजूद इसके भाजपा की बात की जाए तो समूचा चुनाव एक तरह से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर केंद्रित होकर रह गया है।
चौहान अपनी शैली के मुताबिक तूफानी दौरे भी कर रहे हैं तो कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ को घेरने का भी कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मौजूदा चुनाव में संगठन भी कहीं न कहीं पूरी तरह शिवराज के भरोसे है। दूसरी ओर नाथ की अपनी प्रचार शैली है।
संयत भाषण,ज्यादा ही हुआ तो सरकार के कामकाज व घोषणाओं को लेकर तंज। चुनाव हो या संगठन,ज्यादातर मौकों पर वह अकेले ही मोर्चा संभालते नजर आए। बीस जुलाई तक चुनाव की तस्वीर पूरी तरह साफ होगी। जो दोनों ही दलों के दावों की हकीकत भी बयां करेगी।
किस-किस पर होगी कार्रवाई
सरकारी तंत्र में दागियों की कमी नहीं है। इन्हीं से काम भी कराना है,लिहाजा कार्रवाई के भी रास्ते तलाशे जाते हैं। कुछ यही हाल मौजूदा चुनाव को लेकर राज्य के दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों का है। किस-किस के खिलाफ कार्रवाई हो,जो मंत्री के भतीजे को हराने वाले को मिठाई खिला रहे हैं या जो अपनों का टिकट व तवज्जो नहीं मिलने से दूर खडे किसी और को शह देते रहे। जाहिर है,सरकारी महकमों की तरह गाज सिर्फ छोटों पर ही गिरना है।
ये चुनाव का दौर है
चुनाव भी किसी युद्ध से कम नहीं। फिर वह भले ही गली,मोहल्ले का क्यों न हो। प्रदेश में भी बीते एक माह से जारी स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में भी सियासत का हर दांव अपनाया गया। साम,दाम,दंड,भेद सब कुछ चला। न सिर्फ प्रत्याशियों के बीच,बल्कि कई जगह तो मतदाता भी इससे बच नहीं सके।
रविवार को ही रतलाम का एक वीडियो वायरल हुआ। इसमें महापौर पद के एक प्रत्याशी कुछ घरों पर दूसरे दल के झंडे लगे देख आग बबूला हो उठे। मौके पर ही संबंधित मकानों को सूचीबद्ध करने व सबको देख लेने की खुलेआम धमकी दे डाली।
गोया,झंडे मतदाताओं ने लगाए हों। ऐसे दृश्य अकेले रतलाम ही नहीं,समूचे चुनाव के दौरान अन्य कई जगह देखे,सुने गए। कम से कम मतदाताओं को तो इससे मुक्त रखा जाना चाहिए।