ब्राजील में अब वामपंथी सरकार, वामपंथी लूला ने हासिल की जीत

ब्रा‍ज़िलिया
वामपंथी वर्कर्स पार्टी के लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव में शानदार जीत हासिल की है। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो को हरा दिया है। 30 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है। अब ब्राजील के नए राष्ट्रपति वामपंथी नेता लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा होंगे। 77 वर्षीय लूला 1 जनवरी को पदभार ग्रहण करेंगे। चुनाव अधिकारियों के अनुसार यह लूला का तीसरा कार्यकाल होगा। 49.2% वोटों के साथ राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो भी लूला से ज्यादा पीछे नहीं रहे । लेकिन लूला 50.83 प्रतिशत वोट पाकर विजयी हुए।

ब्राजील में रविवार को हुए चुनावों में, वामपंथी गठबंधन के नेता लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो को हरा दिया है। इस तरह लूला ने एक शानदार वापसी की है। सुप्रीम इलेक्टोरल कोर्ट के अनुसार, लूला को 50.9% वोट और बोल्सोनारो को 49.2 प्रतिशत वोट मिले, जिससे वह विजेता बने। 77 वर्षीय लूला तीसरी बार 1 जनवरी को पदभार ग्रहण करेंगे।

बोलसोनारो ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया

जैर बोलसोनारो इन नतीजों के बाद पूरी तरह से खामोश हो गए हैं। उन्होंने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है…कोविड के कुप्रबंधन को उनकी हार का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। कोरोना से ब्राजील में दुनिया में सबसे अधिक मौतें होने के बावजूद ब्राजील में कोविड प्रोटोकॉल पर बहुत जोर नहीं दिया गया। बोलसोनारो से जनता में नाराजी के कारण वे दूसरा कार्यकाल नहीं पा सके हैं। नए राष्‍ट्रपति लूला दा सिल्‍वा ने उन्‍हें बेहद ही कम वोटों के अंतर से मात दे दी। लूला को 50.8 फीसदी वोट्स हासिल हुए तो बोलसोनारो के हिस्‍से में 49.2 फीसदी वोट्स आए।

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बोलसोनारो पर लगाए गए थे गंभीर आरोप

रविवार को हुए चुनावों से पहले जो प्रचार हुआ था उसमें बोलसोनारो को सिल्‍वा के तीखे आरोपों का सामना करना पड़ा था। इन चुनावों के साथ ही बोलसोनारो इतिहास में 30 सालों में देश के पहले ऐसे राष्‍ट्रपति हैं जो दोबारा राष्‍ट्रपति नहीं बन सके हैं। सन् 1990 से बोलसोनारो से पहले ब्राजील में जितने भी राष्‍ट्रपति बने उन्‍हें दोबारा पद के लिए चुना गया था। जैर बोलसोनारो देश के सबसे विवादित राष्‍ट्रपति भी रहे हैं।

पहले हाफ में आगे थे बोलसोनारा
दा सिल्‍वा ने साओ पाउलो एक होटल में मौजूद मतदाताओं की भीड़ से कहा, 'आज विजेता सिर्फ ब्राजील के लोग हैं। यह न तो मेरी जीत है, न ही वर्कर्स की और न ही उन पार्टियों की जिन्‍होंने मुझे समर्थन दिया। बल्कि यह जीत उस लोकतांत्रिक मुहिम की है जो राजनीतिक पार्टियों से ऊपर है। यह हर उस व्‍यक्तिगत हित और आदर्शवाद की भी जीत है जिसने लोकतंत्र को समर्थन दिया।'

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