SIR के शोर में आम मतदाता कहां? कौआ कान ले उड़ा जैसी स्थिति

SIR विवाद में विपक्ष के आरोप, चुनाव आयोग का पक्ष और मतदाता सूची के आंकड़े। क्या आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रमाण हैं? जानिए पूरा विश्लेषण।

रवि अवस्थी, भोपाल।

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर इन दिनों देश की राजनीति में खूब शोर है।

विपक्षी दल चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है।

मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटने को लोकतंत्र और मताधिकार से जोड़कर देखा जा रहा है।

शनिवार को CJP के प्रदर्शन ने भी इस विवाद को नई चर्चा दी।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक बुनियादी सवाल पीछे छूटता दिख रहा है।

आखिर वह आम मतदाता कहां है, जिसके नाम पर यह पूरा आंदोलन खड़ा किया जा रहा है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम होना

किसी भी नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार की पहली शर्त है।

यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से काटा जाता है, तो यह गंभीर मामला है।

लेकिन यदि नाम हटने के आंकड़ों को बिना पूरी जांच के गलत निष्कासन का प्रमाण मान लिया जाए,

तो तस्वीर का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज हो सकता है।

फिलहाल SIR पर जारी बहस में कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है।

आंकड़े सामने हैं, आरोप भी हैं और राजनीतिक दावे भी।

लेकिन आरोपों और प्रमाणों के बीच की दूरी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

कौआ कान ले उड़ा, लेकिन किसी ने कान देखा भी?

गांवों में एक कहावत प्रचलित है—कौआ कान ले उड़ा।

कोई व्यक्ति यह सुनकर कौए के पीछे दौड़ने लगता है।

वह यह देखना भी जरूरी नहीं समझता कि उसका कान अपनी जगह है या नहीं।

SIR को लेकर मौजूदा शोर में भी इस कहावत का संदर्भ प्रासंगिक लगता है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं कि मतदाता सूची से नाम हटने की शिकायतें निराधार हैं।

सवाल केवल इतना है कि किसी बड़े आरोप को स्वीकार करने से पहले उसके तथ्यों की जांच भी होनी चाहिए।

विपक्ष का दावा है कि SIR के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटे हैं।

वह इसे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जोड़ रहा है।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण उसकी वैधानिक जिम्मेदारी है।

इसका उद्देश्य सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना है।

इन दोनों पक्षों को समझने के लिए आंकड़ों को उनके संदर्भ में देखना होगा।

केवल किसी संख्या का बड़ा होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है।

उसी तरह, नियमित प्रक्रिया का हवाला देकर किसी वास्तविक शिकायत को खारिज भी नहीं किया जा सकता।

यही वह बिंदु है, जहां राजनीतिक शोर के बजाय तथ्य और जांच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

13 करोड़ नाम हटने का आंकड़ा क्या कहता है?

द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और

केंद्रशासित प्रदेशों में SIR के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए।

यह संख्या निश्चित रूप से बड़ी है।

इसी आधार पर विपक्ष चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

ड्राफ्ट सूची से हटाए गए नामों की संख्या और गलत तरीके से

हटाए गए पात्र मतदाताओं की संख्या एक जैसी नहीं होती।

नाम हटने के पीछे मृत्यु, स्थायी रूप से स्थान बदलना,

दोहरी प्रविष्टि या सत्यापन में सामने आई दूसरी वजहें हो सकती हैं।

इसके विपरीत, दस्तावेजों में गड़बड़ी या प्रक्रिया की त्रुटि

के कारण किसी पात्र मतदाता का नाम छूट भी सकता है।

इसलिए 13 करोड़ के आंकड़े को सीधे 13 करोड़ गलत निष्कासनों का प्रमाण बताना उचित नहीं होगा।

इसके लिए यह जानना जरूरी है कि कितने नाम किस कारण हटे,

कितने लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई और कितने नाम बाद में बहाल किए गए।

वर्ष 2024 की अंतिम मतदाता सूची में देशभर में 96.88 करोड़ मतदाता थे।

26 सितंबर 2026 के चुनाव आयोग संबंधी आधिकारिक बयान में

देश में लगभग 95 करोड़ मतदाता होने का अनुमान बताया गया था।

उस समय 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम SIR सूचियां प्रकाशित होना बाकी थीं।

इन दोनों संख्याओं को एक ही समय की अंतिम मतदाता संख्या मानना ठीक नहीं होगा।

मतदाता सूची में नए नाम जुड़ते हैं और अपात्र प्रविष्टियां हटाई जाती हैं।

अंतिम स्थिति का आकलन तभी संभव है,

जब सभी संबंधित सूचियों का प्रकाशन हो जाए और आंकड़ों का मिलान किया जाए।

यदि 13 करोड़ को 95 करोड़ से विभाजित किया जाए,

तो अनुपात लगभग 13.68 प्रतिशत निकलता है।

लेकिन यह केवल गणितीय तुलना है।

इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि 13.68 प्रतिशत पात्र मतदाताओं के अधिकार छीन लिए गए।

चुनाव आयोग पर सवाल उठाना गलत नहीं, लेकिन प्रमाण जरूरी

चुनाव आयोग कोई ऐसी संस्था नहीं है, जिसके फैसलों पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।

उसकी जिम्मेदारी ही ऐसी है कि उसकी प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्रवाई पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए।

यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए।

यदि किसी क्षेत्र में असामान्य संख्या में नाम हटे हैं, तो उसकी जांच होनी चाहिए।

यदि किसी प्रक्रिया में ऑनलाइन और ऑफलाइन आवेदन के नियम अलग-अलग हैं, तो आयोग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

लेकिन इन सवालों की गंभीरता का अर्थ यह भी है कि उनके उत्तर प्रमाणों के आधार पर खोजे जाएं।

विपक्ष ने SIR की प्रक्रिया, ऑनलाइन फॉर्म और

मतदाता सूची में कथित विसंगतियों को लेकर सवाल उठाए हैं।

चुनाव आयोग ने अपनी प्रक्रिया का बचाव किया है।

सितंबर में फॉर्म-6 से जुड़े विवादित अतिरिक्त घोषणा संबंधी प्रावधान को वापस लेने की खबर भी सामने आई थी।

इस घटनाक्रम से कम से कम इतना स्पष्ट होता है कि

प्रक्रियागत सवालों पर चर्चा और सुधार की गुंजाइश हो सकती है।

लेकिन किसी प्रावधान को वापस लेने मात्र से पूरे SIR में गड़बड़ी साबित नहीं होती।

उसी तरह आयोग का स्पष्टीकरण भी हर व्यक्तिगत शिकायत को स्वतः समाप्त नहीं कर देता।

विवाद के प्रत्येक पहलू को उसके प्रमाणों के आधार पर ही परखना चाहिए।

राष्ट्रपति के सामने भी प्रमाण का सवाल

9 अक्टूबर को इंडिया गठबंधन के नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की।

उन्होंने SIR और कथित वोट चोरी से जुड़े आरोपों पर हस्तक्षेप की मांग की।

विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR रोकने सहित कई मांगें रखीं।

इस मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा।

इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आईं।

लेकिन इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है

कि गंभीर आरोपों के समर्थन में प्रमाण होना चाहिए।

राष्ट्रपति के सामने अपनी बात रखना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है।

वहीं, आरोपों की जांच के लिए दस्तावेज और

सत्यापन योग्य तथ्य प्रस्तुत करना भी उतना ही जरूरी है।

सिर्फ आरोपों की गंभीरता से उनका सच साबित नहीं हो जाता।

इसी तरह, केवल राजनीतिक दल द्वारा आरोप लगाने से उसे निराधार भी नहीं कहा जा सकता।

फैसला तथ्यों और जांच के आधार पर ही होना चाहिए।

आंदोलन में आम मतदाता की भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

SIR के विरोध में विपक्षी दलों और CJP के प्रदर्शन का अपना राजनीतिक महत्व है।

विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है।

लेकिन इस आंदोलन की वास्तविक ताकत इस बात से भी

तय होगी कि कथित रूप से प्रभावित मतदाताओं की शिकायतें कितनी स्पष्टता से सामने आती हैं।

किसी मतदाता का नाम कटा है, तो उसके पास क्या जानकारी है?

उसे नोटिस मिला या नहीं?

उसने नाम बहाल कराने के लिए आवेदन किया या नहीं?

उसके मामले का निपटारा कैसे हुआ?

इन सवालों के जवाब बहस को ठोस आधार दे सकते हैं।

यदि ऐसे मतदाता अपने अनुभव और दस्तावेज लेकर सामने आते हैं,

तो आयोग के लिए भी जवाब देना आसान होगा।

जरूरत पड़ने पर किसी विशिष्ट गलती को सुधारा जा सकेगा।

इससे आंदोलन केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहेगा।

इसके विपरीत, यदि पूरा विमर्श केवल इस्तीफे की मांग

और आरोप-प्रत्यारोप के बीच घूमता रहा, तो मूल सवाल पीछे छूट सकता है।

वह सवाल है—किस पात्र मतदाता का नाम छूटा और उसे वापस कैसे जोड़ा जाए?

हालांकि, प्रदर्शन में आम मतदाताओं की संख्या देखकर ही उनकी चिंता या समर्थन का

अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

बहुत से लोग अपनी शिकायतें प्रशासनिक माध्यमों से भी दर्ज कराते हैं।

इसलिए आंदोलन में प्रत्यक्ष भागीदारी और आम जनता की राय, दोनों को एक ही बात नहीं मानना चाहिए।

मतदाता सूची की शुद्धता भी जरूरी, मताधिकार की सुरक्षा भी

मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।

सूची में मृतकों, दोहरी प्रविष्टियों और ऐसे लोगों के नाम बने रहना भी उचित नहीं है,

जो संबंधित नियमों के अनुसार मतदाता नहीं रह गए हैं।

लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना भी उतना ही गंभीर विषय है।

इसलिए बहस को केवल नाम हटने की कुल संख्या तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

यह देखना होगा कि नाम किन कारणों से हटे, कितने मतदाता पात्र पाए गए,

कितनों की शिकायतें सही निकलीं और कितने नाम बहाल हुए।

चुनाव आयोग ने SIR के बाद छूटे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं।

यह व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है,

बशर्ते पात्र मतदाताओं को इसकी जानकारी मिले

और उनकी शिकायतों का समय पर समाधान हो।

आयोग के लिए भी यह अवसर है कि वह अपने आंकड़े अधिक स्पष्टता से सार्वजनिक करे।

राज्यवार निष्कासन, उसके कारण, अपीलों की संख्या

और बहाली के आंकड़े उपलब्ध होने से संदेह कम करने में मदद मिलेगी।

शोर से आगे बढ़कर तथ्यों तक पहुंचना होगा

SIR को लेकर विपक्ष के सवालों को पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं होगा।

लेकिन सभी आरोपों को प्रमाणित गड़बड़ी मान लेना भी सही रास्ता नहीं है।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा जरूरी है।

उतना ही जरूरी है कि यह भरोसा पारदर्शिता,

जवाबदेही और वास्तविक शिकायतों के समाधान से मजबूत हो।

विपक्ष को चाहिए कि वह अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने रखे।

चुनाव आयोग को चाहिए कि वह आंकड़ों और प्रक्रियाओं पर उठे सवालों का स्पष्ट जवाब दे।

और आम मतदाता को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसका नाम सूची में है या नहीं,

इसकी जानकारी प्राप्त करना और किसी गलती को सुधारना उसके लिए कठिन नहीं होगा।

अभी की स्थिति में सबसे बड़ी जरूरत यही है कि

राजनीतिक शोर से अलग हटकर तथ्यों की पड़ताल की जाए।

आखिर लोकतंत्र में किसी का कान सचमुच कौआ ले गया है या केवल शोर मचा है,

यह जानने के लिए पहले कान देखना जरूरी है।

Keywords

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