74th Republic Day: मजबूत पुरातन संस्कृति से निखरता गणतंत्र

ऐसा क्या सकारात्मक है जो बेतहाशा फड़फड़ाती इस गणतंत्र की लौ को अखंड रखने में कायम है। तो वो है भारत की मूल तासीर, श्रेष्ठता, स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता की हजारों साल पुरानी एक यशस्वी परंपरा। जो भारत की संस्कृति और जीवनशैली में रची बसी है। ”                                            — प्रांजल प्रखर

कहते हैं- तारीखें खुद को दोहराती हैं। वक्त गुज़रता है, पीढियां खपती हैं – मिटती हैं। पर तारीखें अपने गर्भ में इतिहास समेटे होती हैं।

26 जनवरी 1930 – एक ऐसी ही तारीख जब जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता वाली कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा कर ब्रिटिश भारत में पहला स्वाधीनता दिवस मनाया था।

वैसे तो वास्तविक आजादी के बाद देश की संविधान सभा ने 2 साल 11 महीनों और 17 दिन के बाद 26 नवंबर 1949 को संविधान देश को सौंपा दिया था। पर देश के नेतृत्व की पुकार थी कि गणतंत्र होना ही पूर्ण स्वराज की पहली सीढ़ी है। इसीलिए देश 61 दिनों का और इंतज़ार कर 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र बन गया।

जो तारीखें खुद को दोहराती हैं, इतिहास समेट लेती हैं – वही तारीखें तीखे और सटीक प्रश्न करती हैं। सीमित प्रशंसा और कड़ी आलोचना करती हैं।

भारतीय गणतंत्र की कल्पना में – राम का सुराज्य था, बुद्ध का सत्व था, लोहिया का समाजवाद था, गांधी का स्वराज्य था, जेपी का मिश्रित साम्यवाद था। भारतीय गणतंत्र की कल्पनाज विवेकानंद के विवेक से पोषित थी, भगत और उधम सिंह के पराक्रम से सिंचित थी और बाबा साहेब के ज्ञान से शिक्षित थी।
साल 2023 का भारतीय गणतंत्र एक तथ्य को भली भांति स्पष्ट करता है कि कल्पना के पास विकल्प होता है अधूरा रह जाने का या टूट जाने का। 73 साल के इस गणतंत्र में पूर्वोत्तर के सीमांत राज्य, पंजाब, कश्मीर और तमिलनाडु के द्रविड़ आंदोलनकर्ता अलगाव की आग में भारतीय गणतंत्र को शुद्र मानकर बैठे हैं।

वहीं उत्तर और पश्चिम भारत में लोकतांत्रिक शांति विद्यमान है। उत्तर और पश्चिम भारत में गणतंत्र कुछ इस स्तर पर सफल रहा है कि मध्यावधि में ही चुनी हुई सरकार को विस्थापित करने पर भी आम जनता में कोई रोष नहीं है। वहीं पूर्वोत्तर और कश्मीर को प्राप्त अनेक आर्थिक और प्रशासनिक विशेषाधिकारों के बावजूद भी वहां का आमजन शेष भारत से विभिन्न मुद्दों से दूर हो जाता है।
एक महान विचार है कि ‘प्रक्रिया नतीजे से अधिक महत्वपूर्ण होती है’। यह राजनीतिक और नीतिगत प्रक्रिया का अंतर ही है जो भारतीय गणतंत्र को विभिन्न राज्यों में विभिन्न तरह से लागू करता है।
किसी भी गणतंत्र के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू होते हैं – पहला चुनाव और दूसरा नागरिकता।
गणतंत्र जितना सरकार से नहीं होता उतना विपक्ष और नागरिकों से होता है।

पिछले कुछ चुनावों से अपने जीते हुए चुनावों को लोकतंत्र की जीत और हारे हुए चुनावों को ईवीएम का खेल बताने वाले विपक्ष को गणतंत्र के संरक्षक के तौर पर पेश करना महज़ बेमानी है।

एक तरह सरकार सत्ता के सुरूर में निर्वाचित राज्य सरकारों को महत्वहीन करती जा रही है। वहीं दूसरी ओर नेतृत्वहीन विपक्ष पंगु सिद्ध हो रहा है। वहीं मौन जनमानस बीते 75 वर्षों से बखूबी निभा रहा है।

ऐसा क्या सकारात्मक है जो बेतहाशा फड़फड़ाती इस गणतंत्र की लौ को अखंड रखने में कायम है। तो वो है भारत की मूल तासीर, श्रेष्ठता, स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता की हजारों साल पुरानी एक यशस्वी परंपरा। जो भारत की संस्कृति और जीवनशैली में रची बसी है।

हजारों – करोड़ डॉलर के बजट की वैश्विक संस्थाएं भी मानव कल्याण के समावेशी उपाय नहीं कर पाई। लेकिन भारत में एक पांच साल का अनपढ़ बच्चा भी रोज सुबह दोनों हाथ उठा कर कहता है-

“धर्म की जय हो” – धर्म चाहे कोई भी हो।

“अधर्म का नाश हो” – अधर्म का हमारे संस्कारों में कोई
स्थान नहीं।

“प्राणियों में सद्भावना हो” – सिर्फ इंसानों में नहीं

” विश्व का कल्याण हो” – सिर्फ हमारे देश का नहीं।

जिस देश में बहुसंख्यक आबादी की जुबान पर इतना गहरा दर्शन हो – वो तमाम राजनीतिक कुप्रबंधन की बेड़ियों को तोड़कर भी अखंड है और इतनी परेशानियों के बावजूद भी एक वैश्विक शक्ति के तौर पर उभर रहा है।
इस जटिल लेकिन जीवंत भारतीय गणतंत्र के अंत में दो पंक्ति लिखना ही सही है –

हमसे पहले भी कोई था, हमारे बाद भी कोई होगा

पर हम जैसा न पहले कोई था और न बाद में कोई होगा।।

 

 

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