“शुरुआती लोकप्रियता स्थायी जनाधार की गारंटी नहीं। शिक्षा, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर निरंतर काम करके ही कोई नया संगठन जनता का भरोसा जीत सकता है। CJP के सामने विकल्प साफ है- “उसे केवल आंदोलन की खबर बनना है या लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने वाला संगठन बनना है।पहली राह तत्काल सुर्खियां दे सकती है। दूसरी राह कठिन है, लेकिन स्थायी जनविश्वास की संभावना उसी में अधिक है।“
रवि अवस्थी,भोपाल।
(9826019364)
रा जनीति में शुरुआत करना आसान हो सकता है, लेकिन अपनी अलग पहचान बनाना
और उसे लंबे समय तक कायम रखना सरल नहीं होता।
किसी आंदोलन को अचानक बड़ी लोकप्रियता मिल सकती है।
युवाओं का समर्थन भी मिल सकता है।
सत्ता पर दबाव बनाकर किसी मुद्दे पर ध्यान खींचने में सफलता भी मिल सकती है।
मगर असली परीक्षा इसके बाद शुरू होती है।
क्या संगठन उस शुरुआती ऊर्जा को स्थायी जनसमर्थन में बदल पाता है?
क्या वह लोगों के बीच लगातार मौजूद रहता है?
और क्या उसके पास अपनी स्पष्ट विचारधारा, मजबूत संगठन तथा दूरगामी कार्यक्रम है?
कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के सामने आज यही सवाल खड़ा दिखाई देता है।
पहले आंदोलन से मिली पहचान, अब सामने नई चुनौती
सीजेपी का उभार एक विवादित टिप्पणी के बाद हुआ।
महाराष्ट्र के अभिजीत दीपके ने इस घटनाक्रम को एक आंदोलन का रूप दिया।
इसके बाद संगठन ने भर्ती परीक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठाए।
ये ऐसे विषय थे, जिनसे बड़ी संख्या में विद्यार्थी और युवा पहले से परेशान थे।
परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और रोजगार की अनिश्चितता ने
युवाओं के भीतर असंतोष पैदा किया है।
ऐसे में सीजेपी को समर्थन मिलना अस्वाभाविक नहीं था।
उसके आंदोलन ने उन लोगों को एक मंच दिया, जो व्यवस्था से जवाब चाहते थे।
पहले आंदोलन को मिली प्रतिक्रिया ने यह भी दिखाया कि युवा किसी मुद्दे पर एकजुट हो सकते हैं।
यदि सवाल उनके भविष्य से जुड़ा हो, तो वे सड़कों पर उतरने से भी पीछे नहीं हटते।
लेकिन किसी एक मुद्दे पर मिली सफलता का अर्थ यह नहीं कि
संगठन को हर दूसरे मुद्दे पर भी वैसा ही समर्थन मिलेगा।
यही वह बिंदु है, जहां सीजेपी को अपनी रणनीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
शिक्षा से एसआईआर तक का सफर, क्या रणनीति में जल्दबाजी हुई?
शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े सवाल सीधे युवा वर्ग के भविष्य से संबंधित हैं।
इसके विपरीत, एसआईआर और निर्वाचन आयोग से जुड़े सवालों का महत्व संवैधानिक और लोकतांत्रिक है।
इन मुद्दों पर बहस जरूरी है।
मतदाता सूची की पारदर्शिता और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं।
फिर भी दोनों मुद्दों की प्रकृति अलग है।
पहले मामले में युवाओं की व्यक्तिगत चिंता और भविष्य का सवाल सीधे सामने आता है।
दूसरे मामले में संगठन को अपनी बात समझाने, प्रमाण प्रस्तुत करने और
व्यापक जनविश्वास हासिल करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है।
CJP ने अक्टूबर में SIR और CEO के इस्तीफे की मांग से जुड़े प्रदर्शनों को आगे बढ़ाया।
इसके बाद 16 अक्टूबर को तिरंगा प्रदर्शन का आह्वान भी किया गया।
इन गतिविधियों को लेकर अलग-अलग स्थानों पर प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही।
ऐसे में सवाल यह नहीं कि सीजेपी को राजनीतिक या संवैधानिक मुद्दे उठाने चाहिए या नहीं।
सवाल यह है कि क्या संगठन ने अपने शुरुआती जनाधार, संगठनात्मक क्षमता
और जनता से संवाद की मजबूती का पर्याप्त आकलन किया?
नए संगठन के लिए हर मोर्चे पर एक साथ उतरना जरूरी नहीं होता।
कई बार सही समय पर सही मुद्दा चुनना, लगातार आंदोलन करने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
राजनीति में केवल जज्बा नहीं, संगठन भी जरूरी
भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है, जहां बड़े जनांदोलनों ने नई
राजनीतिक संभावनाएं पैदा कीं। लेकिन हर आंदोलन स्थायी राजनीतिक ताकत नहीं बन सका।
1974 के जेपी आंदोलन ने देश की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।
आपातकाल के विरोध में अलग-अलग दल और समूह एक मंच पर आए।
वर्ष 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। यह भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ था।
लेकिन अलग-अलग विचारधाराओं और नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़े।
आखिरकार सरकार और पार्टी दोनों गंभीर संकट में आ गए।
इस उदाहरण का संदेश स्पष्ट है। सत्ता के विरोध में एकजुट होना और
सत्ता चलाने या लंबे समय तक संगठन बनाए रखने के लिए एकमत रहना दो अलग बातें हैं।
किसी साझा विरोध से पैदा हुई ऊर्जा को स्थायी दिशा देने के लिए साझा विचारधारा,
अनुशासन और नेतृत्व की स्पष्टता जरूरी है।
अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने भी देशभर में व्यापक जनसमर्थन जुटाया।
इस आंदोलन से आम आदमी पार्टी के रूप में एक राजनीतिक विकल्प उभरा।
पार्टी ने दिल्ली में सत्ता हासिल की और पंजाब में भी सरकार बनाई।
यानी आंदोलन से निकली राजनीतिक ताकत सफल भी हो सकती है।
लेकिन आम आदमी पार्टी का सफर यह भी बताता है कि शुरुआती लोकप्रियता हमेशा स्थायी नहीं रहती।
समय के साथ नेतृत्व, संगठन, शासन, विश्वसनीयता और चुनावी रणनीति की परीक्षा होती है।
दिल्ली में 2025 के चुनाव परिणामों ने पार्टी की राजनीतिक यात्रा में एक बड़ा बदलाव दिखाया।
इससे यह सीख मिलती है कि आंदोलन से मिला नैतिक समर्थन लगातार काम
और भरोसे से ही कायम रखा जा सकता है।
कद्दावर नेताओं के प्रयोग भी नहीं रहे स्थायी
कॉकरोच जनता पार्टी(CJP) के सामने एक और सबक उन राजनीतिक दलों से मिलता है,
जिन्हें बड़े नेताओं ने अपनी अलग पहचान बनाने के लिए खड़ा किया था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह तथा नारायण दत्त तिवारी ने
1996 में ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) बनाई। इसे तिवारी कांग्रेस भी कहा गया।
लेकिन यह प्रयोग लंबे समय तक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में नहीं टिक सका
और कांग्रेस में वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई।
इसी तरह, मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भाजपा से अलग होने के बाद भारतीय जनशक्ति पार्टी(BJSP) बनाई।
उन्हें राजनीतिक अनुभव और सार्वजनिक पहचान हासिल थी।
इसके बावजूद यह दल राष्ट्रीय स्तर पर कोई स्थायी वैकल्पिक ताकत नहीं बन सका।
बाद में उमा भारती भाजपा में लौट गईं।
इन उदाहरणों की तुलना सीजेपी से पूरी तरह नहीं की जा सकती।
हर संगठन की परिस्थितियां अलग होती हैं। फिर भी एक समान सबक जरूर मिलता है-
केवल लोकप्रिय चेहरा, नाराजगी या किसी एक घटना से मिली पहचान लंबे समय तक
राजनीतिक आधार बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सीजेपी अभी नया संगठन है।
उसकी विचारधारा, संगठनात्मक विस्तार, नेतृत्व की स्थिरता और
दीर्घकालीन कार्यक्रम को लेकर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी है।
ऐसे में उसे अपने शुरुआती समर्थन को लेकर अति-आत्मविश्वास से बचना चाहिए।
सीजेपी के लिए बेहतर रास्ता क्या हो सकता है?
CJP को सबसे पहले उन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, जिनसे उसका शुरुआती जुड़ाव बना।
शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े मामलों पर नियमित निगरानी, पीड़ित विद्यार्थियों की
मदद और सरकारी जवाबदेही की मांग उसके लिए उपयोगी हो सकती है।
उदाहरण के लिए, वह पेपर लीक के मामलों की स्थिति पर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी कर सकता है।
भर्ती परीक्षाओं में देरी, रिक्त पदों, परीक्षा कैलेंडर और परिणामों को लेकर सरकारों से जवाब मांग सकता है।
विद्यार्थियों की शिकायतों को व्यवस्थित ढंग से एकत्र कर सकता है।
जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता और शांतिपूर्ण जनसुनवाई के माध्यम से उनकी आवाज उठा सकता है।
इससे संगठन केवल प्रदर्शन करने वाला समूह नहीं,
बल्कि समस्याओं के समाधान के लिए काम करने वाला मंच बन सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा महंगाई है।
खाद्य पदार्थों, शिक्षा, स्वास्थ्य, किराये और परिवहन की बढ़ती लागत आम परिवारों के बजट को प्रभावित करती है।
यदि सीजेपी इन विषयों पर तथ्य जुटाकर जनता के बीच जाता है,
तो उसका संपर्क केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहेगा।
वह नौकरीपेशा लोगों, छोटे व्यापारियों, किसानों और निम्न आय वाले परिवारों के बीच भी अपनी जगह बना सकता है।
तीसरा रास्ता व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं पर रचनात्मक हस्तक्षेप का है।
मणिपुर जैसे संवेदनशील मामले में शांति, पुनर्वास, विस्थापित परिवारों की सहायता और
विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली के लिए पहल करना किसी भी संगठन की गंभीरता दिखा सकता है।
इसके लिए केवल बयान देना पर्याप्त नहीं होगा।
तथ्यपरक संवाद, राहत कार्यों में सहयोग और संवैधानिक संस्थाओं से
जवाबदेही की मांग जैसे कदम ज्यादा प्रभावी साबित हो सकते हैं।
इसी तरह, बेरोजगारी, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं और
ग्रामीण समस्याओं पर लगातार काम करना सीजेपी को जमीन से जोड़ सकता है।
धैर्य कमजोरी नहीं, रणनीति का हिस्सा है
नए संगठन के लिए हर दिन सुर्खियों में बने रहना जरूरी नहीं है।
कई बार लगातार सुर्खियों में रहने की कोशिश ही उसके मूल उद्देश्य को पीछे छोड़ देती है।
जनता किसी संगठन को केवल इस आधार पर समर्थन नहीं देती कि
उसके नेता कितनी बार गिरफ्तार हुए या कितने बड़े प्रदर्शन किए।
लोग यह भी देखते हैं कि उनकी समस्याओं के समाधान में उस संगठन ने क्या भूमिका निभाई।
क्या वह मुश्किल समय में उनके साथ खड़ा रहा? क्या उसने वादे पूरे किए?क्या उसके पास समस्याओं का व्यावहारिक समाधान है?
सीजेपी को यह समझना होगा कि जनाधार तैयार करने में समय लगता है।
उसे स्थानीय स्तर पर इकाइयां बनानी चाहिए। विद्यार्थियों, युवाओं, सामाजिक संगठनों
और विशेषज्ञों से संवाद बढ़ाना चाहिए।
अपने उद्देश्य और विचारधारा को स्पष्ट करना चाहिए।
साथ ही, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के लिए आचरण तथा जवाबदेही के मानक तय करने चाहिए।
राजनीतिक मुद्दों से पूरी तरह दूर रहना भी कोई समाधान नहीं है।
लोकतंत्र में नए संगठनों को सवाल उठाने और विरोध करने का पूरा अधिकार है।
लेकिन हर आंदोलन को अपनी क्षमता, प्राथमिकताओं और संभावित परिणामों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना चाहिए।
युवाओं का जुड़ाव और भरोसे की चुनौती
राजनीति में किसी संगठन के साथ जुड़ाव हमेशा स्थायी नहीं होता।
देश ने ऐसे कई युवा नेताओं को देखा है, जिन्होंने वक्त और परिस्थितियों के साथ अपनी राजनीतिक राह बदल ली।
ऐसे में यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि आज सीजेपी के साथ कदमताल कर रहे
युवा भविष्य में किसी दूसरे विकल्प की ओर नहीं देखेंगे।
संगठन में लोगों का आना-जाना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह सिलसिला बढ़ता है,
तो उसकी स्थिरता, नेतृत्व और विचारधारा पर सवाल उठने लगते हैं।
सीजेपी के लिए चुनौती केवल युवाओं को जोड़ने की नहीं,
बल्कि उनके भरोसे को इस तरह कायम रखने की है कि
संगठन उनके लिए महज एक पड़ाव नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय विकल्प बन सके।
सीजेपी के लिए असली परीक्षा अब शुरू हुई है
सीजेपी को अपने पहले आंदोलन से मिली पहचान को अंतिम उपलब्धि नहीं मानना चाहिए।
उसे इसे शुरुआत समझना चाहिए। यदि वह रोजगार, शिक्षा, महंगाई और आमजन की
समस्याओं पर निरंतर काम करता है, तो उसकी एक अलग छवि बन सकती है।
यदि वह देश के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों पर तथ्य और समाधान के साथ अपनी
भूमिका निभाता है, तो उसका दायरा भी बढ़ सकता है।
लेकिन यदि संगठन अपनी पहचान को केवल टकराव,
गिरफ्तारी और राजनीतिक विरोध तक सीमित कर देता है,
तो उसके शुरुआती समर्थकों के साथ उसका रिश्ता कमजोर पड़ने का खतरा रहेगा।
यह भी ध्यान रखना होगा कि हर आंदोलन का समर्थन समान गति से नहीं बढ़ता।
भीड़ का आकार ही किसी विचार की वैधता या किसी संगठन की ताकत का अंतिम पैमाना नहीं है।
लोकतांत्रिक मुद्दों पर आवाज उठाने के लिए संख्या के साथ तथ्य, वैधानिकता और निरंतरता भी जरूरी हैं।
सीजेपी के सामने विकल्प साफ है- “उसे केवल आंदोलन की खबर बनना है या लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने वाला संगठन बनना है।”
पहली राह तत्काल सुर्खियां दे सकती है।
दूसरी राह कठिन है, लेकिन स्थायी जनविश्वास की संभावना उसी में अधिक है।
राजनीति में जल्दबाजी से ज्यादा जरूरी है सही दिशा।
जज्बे के साथ धैर्य, विरोध के साथ समाधान और लोकप्रियता के साथ संगठनात्मक मजबूती ही
किसी नए राजनीतिक प्रयोग को टिकाऊ बना सकती है।
सीजेपी यदि इस बात को समय रहते समझ लेता है, तो वह अपने शुरुआती समर्थन को
व्यापक और स्थायी जनाधार में बदलने की बेहतर संभावना बना सकता है।
आखिरकार, जनता को केवल यह नहीं देखना कि कोई संगठन किसके खिलाफ खड़ा है।
जनता यह भी जानना चाहती है कि वह उसके लिए क्या कर रहा है।
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