अडानी ग्रुप शुरू करेगा एयरलाइन? सरकार कर रही फायदे-नुकसान पर विचार, जानिए पूरा मामला

अडानी ग्रुप के एयरलाइन कारोबार में उतरने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार फायदे और नुकसान का आकलन कर रही है। मौजूदा नियमों के तहत दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट के ऑपरेटरों पर किसी एयरलाइन में 10 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी रखने की सीमा है।

नई दिल्ली: भारतीय एविएशन सेक्टर में जल्द एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अडानी ग्रुप के एयरलाइन कारोबार में उतरने के प्रस्ताव पर केंद्र सरकार फायदे और नुकसान दोनों का आकलन कर रही है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सरकार का कहना है कि भारत में बढ़ती हवाई यात्रा की मांग को देखते हुए देश को और एयरलाइंस की जरूरत है, लेकिन एयरपोर्ट और एयरलाइन के एक ही समूह के नियंत्रण में होने से जुड़े संभावित हितों के टकराव पर भी विचार करना होगा।

अडानी ग्रुप ने सरकार से क्या मांग की है?

अडानी ग्रुप देश के प्रमुख एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल है। समूह ने सरकार से मौजूदा नियमों में बदलाव की मांग की है, ताकि वह एयरलाइन कारोबार में प्रवेश कर सके।

दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट को 2006 में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत निजी ऑपरेटरों को दिया गया था। इनके Operation, Management and Development Agreement (OMDA) में एयरपोर्ट ऑपरेटर के किसी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने पर रोक है। अडानी ग्रुप ने इसी प्रावधान में बदलाव का अनुरोध किया है।

Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी ग्रुप ने 4 जून को सरकार को पत्र भेजकर इस प्रतिबंध को हटाने की मांग की थी। समूह की कंपनी अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस एयरलाइन शुरू करने को मौजूदा एविएशन कारोबार के विस्तार के तौर पर देख रही है।

सरकार ने क्या कहा?

नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू के मुताबिक सरकार भारत में और एयरलाइंस चाहती है। उनका लक्ष्य कम से कम पांच एयरलाइंस ऐसी बनाने का है, जिनमें प्रत्येक के पास कम से कम 100 विमान हों।

मंत्री ने कहा कि अगर कोई कंपनी एयरलाइन शुरू करना चाहती है तो सरकार इसका समर्थन करती है। लेकिन सवाल तब उठता है जब एयरपोर्ट ऑपरेटर खुद एयरलाइन शुरू करना चाहे। इसी वजह से सरकार प्रस्ताव के फायदे और संभावित नुकसान की समीक्षा कर रही है।

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एयरपोर्ट और एयरलाइन एक ही कंपनी के पास होने पर क्या चिंता है?

सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल क्रॉस-ओनरशिप और हितों के टकराव का है।

एयरपोर्ट किसी शहर के लिए महत्वपूर्ण और सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर होते हैं। अगर उसी एयरपोर्ट को संचालित करने वाली कंपनी किसी एयरलाइन की भी मालिक हो, तो यह सवाल उठ सकता है कि क्या एयरपोर्ट की सुविधाओं, स्लॉट, शुल्क या अन्य संसाधनों के इस्तेमाल में उसकी अपनी एयरलाइन को कोई फायदा मिल सकता है।

Economic Times की रिपोर्ट में सरकारी अधिकारियों ने भी इस तरह के संभावित हितों के टकराव को लेकर सावधानी बरतने की बात कही है।

यही वजह है कि सरकार केवल एयरलाइन की संख्या बढ़ाने के फायदे को नहीं देख रही, बल्कि क्रॉस-ओनरशिप के संभावित प्रभावों का भी मूल्यांकन कर रही है।

मौजूदा नियम क्या कहते हैं?

मौजूदा व्यवस्था में दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट के ऑपरेटरों पर किसी एयरलाइन में 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी रखने की सीमा लागू है।

हालांकि नागरिक उड्डयन मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा कोई व्यापक नियम नहीं है जो हर एयरपोर्ट ऑपरेटर को एयरलाइन चलाने से रोकता हो। दिल्ली और मुंबई के मामले में प्रतिबंध उनके निजीकरण के समय किए गए विशेष समझौते से जुड़ा है।

इसलिए अगर इस व्यवस्था में बदलाव किया जाता है तो दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट से जुड़े समझौते में संशोधन करना महत्वपूर्ण होगा।

अडानी ग्रुप देश में कितने एयरपोर्ट चलाता है?

अडानी ग्रुप भारत के बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटरों में शामिल है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, समूह मुंबई एयरपोर्ट के अलावा सात अन्य एयरपोर्ट भी संचालित करता है। वहीं GMR Airports दिल्ली एयरपोर्ट समेत कई एयरपोर्ट का संचालन करती है।

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इस वजह से अडानी ग्रुप का एयरलाइन कारोबार में प्रवेश भारतीय एविएशन सेक्टर में एक महत्वपूर्ण कारोबारी बदलाव होगा।

एयरलाइन कंपनियां इस प्रस्ताव पर क्या कह रही हैं?

एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन कारोबार में प्रवेश की अनुमति देने के प्रस्ताव को लेकर एविएशन इंडस्ट्री में अलग-अलग राय सामने आई है।

Economic Times के मुताबिक, इंडिगो के प्रमोटर राहुल भाटिया ने एयरपोर्ट और एयरलाइन के क्रॉस-ओनरशिप को संभावित हितों के टकराव से जोड़ते हुए इसका विरोध किया है। दूसरी ओर, आकासा एयर के संस्थापक विनय दुबे ने इस विचार का समर्थन किया है।

इस तरह प्रस्ताव को लेकर एयरलाइन उद्योग के भीतर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।

सरकार क्यों चाहती है ज्यादा एयरलाइंस?

भारत में हवाई यात्रा की मांग बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का भी विस्तार होना है। सरकार का मानना है कि इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए एयरलाइन क्षमता में वृद्धि जरूरी है।

नागरिक उड्डयन मंत्री ने कम से कम पांच बड़ी एयरलाइंस का लक्ष्य बताया है, जिनमें प्रत्येक के पास 100 या उससे अधिक विमान हों। सरकार क्षेत्रीय स्तर पर भी नई एयरलाइंस को बढ़ावा देने की बात कर रही है।

इंडिगो और एयर इंडिया का दबदबा

मौजूदा भारतीय एविएशन मार्केट में इंडिगो और एयर इंडिया समूह की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। सरकार की एयरलाइन संख्या बढ़ाने की नीति का एक उद्देश्य बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धा और क्षमता विकसित करना भी है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इंडिगो की भारतीय घरेलू बाजार में हिस्सेदारी 66.3 फीसदी से अधिक बताई गई है।

हालांकि किसी नए बड़े खिलाड़ी की एंट्री का बाजार पर वास्तविक प्रभाव उसके परिचालन, बेड़े के आकार, रूट नेटवर्क और प्रतिस्पर्धी रणनीति पर निर्भर करेगा।

क्या अडानी एयरलाइन को मंजूरी मिल गई है?

नहीं।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अभी अडानी ग्रुप को एयरलाइन शुरू करने की अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। सरकार प्रस्ताव के फायदे और नुकसान का मूल्यांकन कर रही है।

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यदि दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट से जुड़े मौजूदा समझौते में बदलाव करना पड़ता है, तो इसके लिए संबंधित सरकारी प्रक्रिया का पालन करना होगा। Economic Times के अनुसार, OMDA में संशोधन के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है।

UDAN से भी नई एयरलाइंस को बढ़ावा देने की तैयारी

सरकार सिर्फ बड़े एयरलाइन ऑपरेटरों पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। UDAN (उड़े देश का आम नागरिक) योजना के अगले चरण को आगे बढ़ाया जा रहा है।

सरकार के मुताबिक, इस योजना के जरिए नए एयरपोर्ट और क्षेत्रीय रूट विकसित किए जाएंगे। नागरिक उड्डयन मंत्री ने क्षेत्रीय इलाकों के लिए नई एयरलाइंस की जरूरत पर भी जोर दिया है।

आगे क्या होगा?

अब सरकार को यह तय करना है कि एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन कारोबार में उतरने की अनुमति देने से प्रतिस्पर्धा और क्षमता बढ़ाने में कितना फायदा होगा और क्रॉस-ओनरशिप से जुड़े जोखिमों को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

फिलहाल अडानी ग्रुप के प्रस्ताव पर विचार जारी है। इसलिए आने वाले समय में सरकार के फैसले और किसी संभावित नियम संशोधन के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अडानी ग्रुप को एयरलाइन शुरू करने का रास्ता मिलता है या नहीं।

अडानी ग्रुप की एयरलाइन शुरू करने की संभावित योजना ने भारतीय एविएशन सेक्टर में क्रॉस-ओनरशिप को लेकर बहस तेज कर दी है। सरकार एक तरफ देश में अधिक एयरलाइंस और विमान क्षमता बढ़ाना चाहती है, वहीं एयरपोर्ट और एयरलाइन के एक ही समूह के नियंत्रण में आने से जुड़े संभावित हितों के टकराव का भी अध्ययन कर रही है। फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।