“तीजन बाई से मेरी पहली मुलाकात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के ऑफिस में हुई थी। परिषद की गामक भाऊ साहब यानी खिरवड़कर साहब से थी। कहने को तो वो अफसर थे लेकिन सच्चाई यह कि वे एक स्कूल की तरह थे।”
तीजन बाई नहीं रहीं। ख़बर दुखदायक है लेकिन होनी है। अभी वे 70 वर्ष की थीं। कुछ समय से बीमार भी थीं और इससे भी बड़ी बात यह कि वे इन दिनों लगभग गुमनाम सी भी थीं।
मेरी पहली मुलाकात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के ऑफिस में हुई थी।
तब यह ऑफिस मालवीय नगर में आज के मुकाबले विपन्न सा था लेकिन इसकी गामक भाऊ साहब से थी। भाऊ साहब बोले तो खिरवरडकर साहब। कहने को तो वो अफसर थे लेकिन सचाई यह थी कि वे चलते फिरते स्कूल थे। कम से कम मुझ जैसे के लिए। या वही समय था। तीजन बाई, तब तीजन बाई नहीं बनी थी, बावजूद इसके इनकी प्रतिभा चमकने लगी थी।
कला उनकी थी और कलाकार बनाने में भाऊ साहब की भूमिका बड़ी थी। वो गुरु थे और वो तराशना जानते थे। तीजन को मंच दिया। गनियारी गांव से निकली लड़की भोपाल से दिल्ली और लोगों के दिलों में उतरती सात समंदर पार पंडवानी की नायिका बन गई।
इस पहली मुलाकात करते समय मैं और दोस्त सुनील मिश्र साथ थे। मैं उनसे एक पत्रकार बनकर सवाल कर रहा था तो सुनील एक कला समीक्षक के नाते। जब मैने तीजन से सवाल किया कि वो देहाती कपड़ों को छोड़ कर ये शहरी फैशन वाले कपड़े पहनने लगी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया।
सुनील को तब ये सवाल और ऐसे ही कुछ सवाल तल्ख लगे। हालांकि बाद में हम दोनों एक साथ तब की प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका सारंगा स्वर में छपे। इसके पहले धर्मयुग और बाद में सहारा, लोकमत समाचार सहित अनेक जगह तीजन पर फीचर आर्टिकल छपा।
तीजन,संभवतः उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्हें तीन पद्म सम्मान मिले। उन्होंने एक तरफ पांडवानी को दुनिया के समक्ष प्रतिष्ठित किया तो वे छत्तीसगढ़ की अघोषित सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम करती रहीं। निजी जीवन उनका सरल नहीं रहा। महाभारत का गायन वो करती रहीं और निजी जीवन में उनके लड़ाइयाँ लड़ीं। उनकी मंशा थी कि वे तीजन विद्यापीठ बन जाए।
भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधन ने अपने स्कूल में पंडवानी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था लेकिन वह भी औपचारिक ही रहा। तीजन की परंपरा से रितु वर्मा और शांति बाई चेलक आईं लेकिन तीजन के पासंग खड़ी नहीं हो पाई। शांति का पता नहीं, शायद रितु को भी भाऊ साहब का सानिध्य मिला। सही भी है, हर कोई तीजन नहीं हो सकता।
छत्तीसगढ़ क्या, मध्यप्रदेश क्या, वो पूरी लोक कला की राजदूत थीं। उनका जाना एक परंपरा का थम जाना है। तीजन को याद करते समय बार बार भाऊ साहब की याद भी आ जा जाती है। और एक सच यह भी है कि उनके जाने बाद संस्कृति विभाग में अफसर आए, गुरु नहीं।
वैसे ही जैसे स्वामीनाथन ने ईट गारा उठाने वाली के भीतर की कलाकार तलाश कर लिया था।