RTI पर पांच साल से स्टे: लघु वनोपज संघ की फाइल में क्यों जमी धूल?

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रवि अवस्थी,भोपाल।

(9826019364)

मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ को सूचना के अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने का विवाद पिछले पांच वर्षों से न्यायालय में ठहरा हुआ है।

हैरत की बात यह है कि जिस मामले का सीधा संबंध पारदर्शिता, करोड़ों रुपए के कारोबार और आदिवासी हितों से जुड़ी संस्था से है, उसमें न तो राज्य सूचना आयोग विशेष सक्रियता दिखा रहा है और न ही स्वयं संघ या सरकार जल्द सुनवाई की पहल करती दिखाई दे रही है।

हाईकोर्ट जबलपुर ने 2 फरवरी 2021 को राज्य सूचना आयोग के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके बाद से न तो स्टे हट पाया और न ही मामले की अगली प्रभावी सुनवाई हुई।

परिणाम यह है कि करोड़ों रुपए के व्यापार और सरकारी अधिकारियों द्वारा संचालित इस संघ की गतिविधियां आज भी RTI की पहुंच से बाहर बनी हुई हैं।

एक स्टे, पांच साल का सन्नाटा

विवाद की शुरुआत 2009 में हुई थी, जब लघु वनोपज संघ ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष शपथपत्र देकर खुद को एक सहकारी संस्था बताया । उसने कहा- वह न तो सरकारी उपक्रम है और न ही उसे सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है। इसी आधार पर आयोग ने उसे RTI अधिनियम से बाहर मान लिया।

लेकिन 2020 में एक आरटीआई एक्टिविस्ट की याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग ने अपना रुख बदल दिया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संघ का पूरा संचालन भारतीय वन सेवा (IFS) और राज्य वन सेवा के अधिकारियों के हाथ में है।

संघ को पुनः RTI के दायरे में माना

प्रबंध संचालक से लेकर शीर्ष पदों पर सरकारी अधिकारी पदस्थ हैं, कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा वन विभाग से जुड़ा है तथा वाहन और अन्य संसाधन भी शासकीय हैं। ऐसे में संघ को RTI से बाहर रखना न्यायसंगत नहीं हो सकता।

आयोग ने इन तथ्यों के आधार पर संघ को पुनः RTI के दायरे में माना। इसके खिलाफ संघ हाईकोर्ट पहुंच गया और आयोग के आदेश पर अंतरिम रोक हासिल कर ली।

सवाल: आखिर किसे फायदा दे रही है यह चुप्पी?

दिलचस्प यह है कि पांच वर्षों में न तो राज्य सूचना आयोग ने मामले के शीघ्र निराकरण के लिए कोई विशेष पहल की और न ही संघ ने।

राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त विजय यादव का कहना है कि आयोग स्वयं आगे बढ़कर कोर्ट नहीं जाता, कोई आवेदक या शिकायतकर्ता पहल करे तो आयोग भी शीघ्र सुनवाई का आग्रह कर सकता है।

दूसरी ओर संघ के अधिकारियों का तर्क है कि वे स्वयं याचिकाकर्ता हैं, इसलिए अपनी ही याचिका के खिलाफ सक्रियता दिखाने का प्रश्न नहीं उठता।

नतीजा यह है कि मामला न्यायिक फाइलों में स्थगित पड़ा है और पारदर्शिता का प्रश्न भी।

राजनीतिक स्तर पर भी उठते रहे सवाल

इस वर्ष मार्च में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रमुख सचिव, सहकारिता विभाग को पत्र लिखकर लघु वनोपज संघ को RTI के दायरे में लाने की मांग की। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि संघ की स्थापना शासन की करोड़ों रुपए की अंशपूंजी से हुई है तथा उसका व्यापार और विपणन सार्वजनिक हित का विषय है। इसलिए सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 2(h) के तहत उसे “पब्लिक अथॉरिटी” माना जाना चाहिए।

सिंघार ने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि आदिवासियों के हित में गठित संस्था के कामकाज में पारदर्शिता आवश्यक है और सूचना उपलब्ध कराना जनहित में है।

विधानसभा में भी गूंजा मुद्दा

कांग्रेस विधायक डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने पिछले बजट सत्र में ध्यानाकर्षण सूचना के जरिए यह विषय विधानसभा में उठाया। उन्होंने कहा कि संघ मध्यप्रदेश शासन की 40 करोड़ रुपए की अंशपूंजी से स्थापित संस्था है और उसका संचालन भी सरकारी अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

ध्यानाकर्षण सूचना में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि संघ सरकारी पूंजी और अधिकारियों के सहारे संचालित है तो उस पर RTI लागू क्यों नहीं है। उन्होंने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा विषय बताते हुए सरकार का ध्यान आकर्षित किया।

पूर्व सांसद ने लगाए थे गंभीर आरोप

पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में संघ के प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज की उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।

पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि संघ में पिछले दस वर्षों के दौरान प्रशासक और प्रबंध संचालक स्तर पर कई निर्णय बिना पर्याप्त जवाबदेही के लिए गए तथा RTI लागू न होने से पारदर्शिता प्रभावित हुई।

गुड्डू ने अपने पत्र में संचालक मंडल की बैठकों, विकास मद के उपयोग, विज्ञापन एवं प्रचार-प्रसार खर्चों और विभिन्न प्रशासनिक निर्णयों की जांच कराने की मांग भी उठाई थी।

सबसे बड़ा प्रश्न: क्या RTI से बाहर रहना ही उद्देश्य बन गया है?

मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि विवाद अब इस बात तक सीमित नहीं रह गया कि संघ RTI के दायरे में आए या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि यदि संघ वास्तव में सार्वजनिक धन, सरकारी अधिकारियों और शासन के नियंत्रण से संचालित है तो पारदर्शिता से बचने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?

विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगा, लेकिन जब तक मामला लंबित है, तब तक आदिवासी हितों और करोड़ों रुपए के कारोबार से जुड़ी संस्था की जवाबदेही पर सवाल बने रहेंगे।

 एक नजर में पूरा मामला
2009: संघ ने खुद को RTI से बाहर रखने की मांग की।
2009: सूचना आयोग ने राहत दी।
2020: आयोग ने आदेश बदलते हुए संघ को RTI के दायरे में माना।
2 फरवरी 2021: हाईकोर्ट ने आयोग के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई।
2021-2026: न अगली प्रभावी सुनवाई, न स्टे समाप्त।
2026: नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और विधायक राजेंद्र सिंह ने फिर उठाया मुद्दा।