“चुनाव में टोने-टोटके और अजब-गजब वाले संयोग भी खूब चलते हैं। सत्ता की चाहत रखने वाले कई नेता इन पर आंख बंद कर भरोसा भी करते हैं। करें भी क्यों न ,चुनाव लड़ना कोई हंसी-खेल तो है नहीं ? बैतूल विधानसभा के साथ एक अजीब संयोग यह कि यहां जिस दल का विधायक चुना गया,प्रदेश में सरकार उसकी बनना तय है।”
रवि अवस्थी,भोपाल।Betul assembly मप्र में अशोकनगर,सीहोर जिले में इछावर और उज्जैन जिले में महिदपुर के बारे में कहा जाता है कि यहां जिस मुख्यमंत्री ने दौरा किया,वह दोबारा इस पद पर काबिज नहीं हो सका। मप्र में नवंबर में चुनाव प्रस्तावित हैं।
राज्य के तमाम दल चुनावी मोड में आ चुके हैं। एक-एक सीट का हिसाब अंगुलियों पर है। अगली सरकार किसकी बनेगी,कोई भी राजनीतिक दल दावे के साथ कहने की स्थिति में नहीं,लेकिन मप्र की बैतूल विधानसभा एक ऐसी सीट है,जिसके परिणाम बताते हैं कि यहां जिस दल का विधायक चुनाव जीता। सरकार भी उसी दल की बनना तय है। अब तक के चुनाव परिणाम तो यही बताते हैं।
ताप्ती नदी का उदगम स्थल कहे जाने वाला बैतूल प्रदेश के प्रमुख जिलों में एक हैा यहां की मिली-जुली संस्कृति की तरह मतदाताओं का रुझान भी वक्त के साथ बदलते रहा है। इसके चलते बैतूल विधानसभा सीट पर कभी किसी दल का एक छत्र राज नहीं रहा।
हर दल को जिताऊ चेहरे की दरकार बैतूल के इस अजब संयोग की वजह से,’हंडी के एक चावल’ की तर्ज पर सूबे के दोनों ही प्रमुख दल बैतूल में अपनी संभावना तलाशते रहे हैं । इस अवधारणा के चलते हर दल को जिताऊ चेहरे की दरकार रहती है।
हालांकि मुकाबला यहां आर्थिक रूप से सक्षम व लोकप्रिय उम्मीदवारों के बीच ही होता रहा है। वर्ष 2018 में भी यहां मुकाबला दो वैश्य उम्मीदवारों के बीच रहा। साल के अंत में प्रस्तावित चुनाव में भी इसी जोड़ी को दोहराए जाने के पूरे आसार हैं ।
जातिगत समीकरण प्रभावी नहीं बैतूल विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण पर गौर किया जाए तो यहां कुनबी, पवार जाति और आदिवासी वोट बड़ी संख्या में हैं । लेकिन विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण ज्यादा प्रभाव नहीं डालता।
यही वजह हैं कि दोनों ही प्रमुख दल टिकट वितरण के दौरान जातिगत समीकरण की बजाए सक्षम और लोकप्रिय कैंडिडेट पर दांव लगाते हैं।
वहीं बैतूल के मतदाता उम्मीदवार के काम के आधार पर ही अपना प्रतिनिधि चुनते रहे हैं । मुददों की बात करें तो विकास व रोजगार लगभग हर चुनाव में यहां मुददा रहा ।आरोप-प्रत्यारोप की सियासत बैतूल में भी खूब होती रही है । चुनावी सभाओं में ये आगे भी देखे—सुनें जा सकते हैं..।
काम को तरजीह देते हैं मतदाता
कुल मतदाता 2,50,229
पुरुष मतदाता 1,27,393
महिला मतदाता 1,22,836
विधानसभा सीट की विशेषताएं
..बैतूल विधानसभा के अब तक हुए 13 बार चुनाव
* 7 चुनाव कांग्रेस,6 बीजेपी व संबंद्ध संगठनों ने जीते
* जिताऊ चेहरे पर ही दांव लगाते हैं सियासी दल
* कुनबी,पंवार,आदिवासी Tribal वोट की बड़ी संख्या
* जातिगत समीकरण जीत में नहीं रखते मायने
बैतूल में जो जीता वहीं दल सत्ता का भी सिकंदर बैतूल सीट के बारे में एक खास संयोग यह कि यहां से अब तक जिस पार्टी का विधायक जीता,प्रदेश में सरकार भी उसी दल की बनी। इस तरह बैतूल के परिणाम प्रदेश की अगली सरकार की ओर संकेत करते रहे हैं। वर्ष 1962 से अब तक यहां 7 बार कांग्रेस और 6 बार भाजपा या उसके पूववर्ती संगठनों के विधायक चुने गए और इतनी ही बार प्रदेश में संबंधित दल की सरकारें भी बनीं। है न गजब का संयोग..अब हम आपको बताते हैं वर्षवार जीते विधायक,उनकी पार्टी और प्रदेश में बनी सरकार का ब्योरा..
कुछ ऐसा है बैतूल सीट का संयोग
1962 में कांग्रेस के दीपचंद गोठी विधायक चुने गए ..सरकार बनी कांग्रेस के पं.द्वारका प्रसाद मिश्र की।
1967 में जनसंघ के जीडी खंडेलवाल विधायक चुने गए, गोविंद नारायण सिंह संविद सरकार के मुख्यमंत्री बने।
1972 में कांग्रेस के मारोति पांसे जीते,सरकार बनी कांग्रेस की और पीसी सेठी मुख्यमंत्री बने
1977 में जनता पार्टी के माधव नासेरी जीते,सरकार बनी जपा के वीरेंद्र कुमार सकलेचा की।
1980 में कांग्रेस के डॉ. अशोक साबले विधायक बने,अर्जुनसिंह मुख्यमंत्री बने।
1985 में कांग्रेस के अशोक साबले पुन: विधायक बने,और मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री।
1990 में भाजपा के भगवत पटेल विधायक बने, मुख्यमंत्री बने सुंदरलाल पटवा।
1993 में डॉ. अशोक साबले पुन: विधायक बने और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री
1998 में कांग्रेस के विनोद डागा विधायक बने और दिग्विजय सिंह पुन: मुख्यमंत्री।
2003 में भाजपा के शिवप्रसाद राठौर विधायक बने और इसी दल की उमा भारती मुख्यमंत्री
2008 में भाजपा के अलकेश आर्य चुने गए और मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह
2013 में भाजपा के हेमंत खंडेलवाल चुनाव जीते और मुख्यमंत्री पुन: शिवराज सिंह
2018 में कांग्रेस के निलय डागा विधायक चुने गए तो सरकार कमलनाथ की बनी।