नई दिल्ली: कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की कीमत को लेकर केरल हाईकोर्ट में एक अहम मामला सामने आया है। याचिका में महंगी कैंसर दवाओं के सस्ते जेनेरिक वर्जन उपलब्ध कराने और मरीजों के लिए इलाज को अधिक किफायती बनाने की मांग की गई है। वहीं, बड़ी फार्मा कंपनियों ने इस मांग का विरोध किया है।
₹5,100 के अनुमान से ₹78,400 तक कैसे पहुंची कीमत?
मामला मुख्य रूप से Ribociclib और Abemaciclib जैसी दवाओं से जुड़ा है, जिनका इस्तेमाल ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में किया जाता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दवाओं की वास्तविक निर्माण लागत और मरीजों से वसूली जा रही कीमत के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठाया गया है।
येल के ड्रग-कॉस्ट विशेषज्ञ डॉ. मेलिसा बार्बर के अनुमान का हवाला देते हुए बताया गया कि 200 mg Ribociclib की एक टैबलेट की मैन्युफैक्चरिंग लागत करीब 0.85 डॉलर, यानी लगभग ₹81 हो सकती है, जबकि API बाहर से मंगाने पर यह लागत करीब 1.29 डॉलर यानी ₹123 तक पहुंच सकती है। तय डोज के हिसाब से अनुमानित मासिक खर्च करीब ₹5,100 से ₹7,750 बताया गया है। दूसरी ओर, भारत में इसकी कीमत करीब ₹78,400 प्रति माह होने का दावा किया गया है।
फार्मा कंपनियों ने क्या कहा?
दवा कंपनियों का तर्क है कि नई दवाओं को विकसित करने में रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल और अन्य प्रक्रियाओं पर भारी रकम खर्च होती है। कंपनियों ने इसी आधार पर सस्ते जेनेरिक वर्जन से जुड़े दावे का विरोध किया है।
याचिका से जुड़े दस्तावेजों में क्लिनिकल ट्रायल की लागत के आंकड़े भी सामने रखे गए हैं। Knowledge Ecology International से जुड़े Jamie Love के हलफनामे के अनुसार, Novartis ने Ribociclib के ट्रायल पर करीब 494.5 मिलियन डॉलर और Eli Lilly ने Abemaciclib के ट्रायल पर 469 मिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए। हालांकि, दवाओं के विकास की कुल लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान और उस पर सवाल भी मौजूद हैं।
जेनेरिक दवाओं से कीमत में कितना फर्क पड़ सकता है?
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि पेटेंट अवधि खत्म होने के बाद जेनेरिक दवाओं के आने से मरीजों की लागत काफी कम हो सकती है। इसके उदाहरण के तौर पर Nexavar, Sofosbuvir और अन्य दवाओं की कीमतों में पेटेंट और जेनेरिक वर्जन के बीच अंतर का उल्लेख किया गया है।
मरीजों की जेब और दवा कंपनियों के बीच बड़ी बहस
यह मामला सिर्फ दो कैंसर दवाओं की कीमत तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल है कि महंगी जीवनरक्षक दवाओं की कीमत तय करते समय मरीजों की पहुंच, जेनेरिक विकल्प, पेटेंट अधिकार और दवा कंपनियों की रिसर्च लागत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
केरल हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सामने आ रही हैं। मामले में अदालत का अंतिम रुख यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि महंगी कैंसर दवाओं की कीमत और जेनेरिक विकल्पों को लेकर आगे क्या रास्ता निकलता है।