MP: लोस चुनाव में बीजेपी की राह नहीं आसान

सत्ता के गलियारे से.. रवि अवस्थी
** राह नहीं आसान
तमाम कवायदों व ‘लाड़ली बहना’ लहर के बावजूद प्रदेश के ज्यादातर आदिवासी मतदाताओं का मूड विधानसभा चुनाव में नहीं बदला। नतीजतन,बीजेपी को सिर्फ 8 सीटों की बढ़ोत्तरी के साथ इस वर्ग की 24 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। छिंदवाड़ा तो अभेद रहा ही,8 विधानसभा सीटों वाले मंडला,खरगोन,धार,मुरैना लोस क्षेत्र में भी 3-3 सीटें ही हाथ लगीं। ग्वालियर,भिंड में भी मामला बराबरी का रहा।

चुनाव में चेहरा तो तब भी वही था जो लोकसभा चुनाव में रहने वाला है।आदिवासी मतदाताओं के बीच राष्ट्रीय मुद्दे आमतौर पर निष्प्रभावी ही रहते आए हैं। ऐसे में रातोंरात इनका हृदय परिवर्तन होगा,इसकी संभावना क्षीण है।

प्रदेश में इस वर्ग के लिए यूं तो लोकसभा की छह सीटें ही आरक्षित हैं,लेकिन हाल के चुनाव नतीजों को देखते हुए कहा जा सकता है कि करीब सात सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी की राह आसान नहीं रहने वाली। क्लीन स्वीप का सपना पूरा करना है तो पसीना जमकर बहाना पड़ सकता है। वैसे चुनौती कांग्रेस के समक्ष भी कम नहीं,लेकिन उसके पास खोने को भी कुछ ज्यादा नही।

** टूटे मन से…

मौका पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेई की जयंती का है। स्व.वाजपेई कवि हृदय भी रहे हैं। प्रदेश बीजेपी कार्यालय में चस्पा उनकी कविता को उदृधृत करता एक पोस्टर बरबस ही लोगों का ध्यान आकृष्ट करता है। इस कविता की दो पंक्ति है..छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता। टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।। पीढ़ी परिवर्तन के दौर से गुजर रही मप्र बीजेपी में तो इस बार कई के मन टूटे हैं। अब कौन पहली और कौन दूसरी पंक्ति का अनुसरण करता है। यह तो वक्त बताएगा।

** चोट गहरी है..
बीजेपी ने मप्र की सत्ता में भी चेहरे बदल डाले। अपने अनोखे अंदाज से चुनाव में बाजी पलटने वाले शिवराज को पार्टी ने एक तरह से घर बैठाने का ही काम किया। दिल्ली से लौटने के बाद उनकी अमरकंटक यात्रा इस बात का संकेत हैं कि चोट गहरी है। जिसे आध्यात्म के सहारे सहलाने का जतन हो रहा है। वर्ना पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय चिंतन बैठक के बीच शिवराज जी अपना वक्त मां रेवा की पूजा-अर्चना में गुजारे,ऐसा पहले कभी देखा नहीं गया।

** महंगा न पड़े ‘जंगल में मंगल’
पूर्व वन मंत्री विजय शाह अपनी अजब-गजब कार्यशैली को लेकर ही चर्चा में रहने वाले राजनेता हैं। पहले भी उनके बिगड़े बोल उनके लिए मुसीबत बनते रहे हैं। एक बार तो प्रदेश के तत्कालीन मुखिया के परिवार पर ही अनर्गल टिप्पणी कर बैठे थे। इस बार मंत्री बनने से पहले ही एसटीआर में अपने परम मित्र तहसीम के साथ मनाई गई’पिकनिक’को लेकर चर्चा में है। शाह आठ बार के विधायक और तीन बार मंत्री रह चुके हैं,लेकिन अंदाज आज भी वही फक्कड़पन वाला।’जंगल में मंगल’करना शाह को कहीं महंगा न पड़ जाए। यूं भी,इस बार एसटी कोटे से मंत्री पद के दावेदार कई हैं।

** ‘घर’ के ही जज
जब भांग पूरे कुंए में घुली हो तो फैसले इसी तरह के होते हैं,जैसे कि बाघ संरक्षित क्षेत्र में पूर्व वनमंत्री विजय शाह की चर्चित चिकन पार्टी मामले को लेकर लिया गया। मामला मीडिया की सुर्खी बना तो जांच कराना मजबूरी हो गई,लेकिन इसमें भी बीच का रास्ता निकाला गया। प्रधान मुख्य वन संरक्षक,वन्य प्राणी असीम श्रीवास्तव ने जांच एसटीआर डायरेक्टर एल.कृष्णमृर्ति को ही सौंप दी। कृष्णमूर्ति ने दिखावे के लिए यह जिम्मा अपने मातहत डिप्टी डायरेक्टर संदीप फैलोज को सौंप दिया। कृष्णमूर्ति अपनी कार्यशैली को लेकर पहले ही विवादों में रहे हैं।अब एक और दाग। संभव है कुछ अदने कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद मामला रफा-दफा हो जाए।

** कायम रही परंपरा
कांग्रेस का प्रदर्शन हो या जलसा-जुलूस। इसमें हंगामा न बरपे!यह कल्पना से परे है। पीसीसी के नए अध्यक्ष जीतू पटवारी के पदभार ग्रहण से पहले निकले जुलूस में पार्टी की परंपरा का बखूबी निर्वहन हुआ। पटवारी उज्जैन महाकाल मंदिर पहुंचे तो वहां कर्मचारियों से मारपीट,धक्का-मुक्की हुई।नंदी हाल में अनुमति से ज्यादा लोग जा पहुंचे। धक्का-मुक्की में दरवाजे के कांच फूटे तो पुलिस ने औपचारिकता दिखाते हुए अज्ञात के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया,लेकिन इस दौरान मंदिर में दर्शनार्थियों व जाम से राहगीरों को जो असुविधा हुई,उसका क्या? बड़ी बात तो उस छवि की,जो प्रभावितों के मन-मस्तिष्क में बस गई।

** यह आडंबर,क्यों जरूरी ?
कुछ दिवस मनाए जाने का जिम्मा सिर्फ प्रशासनिक तंत्र पर है। इसके चलते ये विशेष दिवस भी पूरी तरह सरकारी होकर रह गए। मसलन,पूर्व प्रधानमंत्री स्व.राजीव गांधी की जयंती 20 अगस्त पर सद्भावना दिवस व स्व.अटल जी की जयंती 25 दिसंबर पर सुशासन दिवस। इन अवसरों पर प्रशासनिक अमला शपथ इस अंदाज में लेता है,गोया ‘रामराज्य’अब आने ही वाला है। सालों से ली जा रही शपथ के बावजूद न सद्भावना पैदा हुई,न सुशासन आया। इन विशेष दिवसों को लेकर औपचारिकता भी ऐसी कि 3 दिन के अवकाश को देखते हुए सप्ताह के अंतिम वर्किंग -डे,यानी शुक्रवार 22 दिसंबर को ही दफ्तरों में सुशासन दिवस मना लिया गया। गत 20 अगस्त को रविवार होने से सद्भावना दिवस भी कुछ इसी अंदाज में मना था।

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