‘नया दौर’ से ‘तीसरी मंजिल ’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ से ‘उमराव जान’ और ‘इजाजत’ से ‘रंगीला’ तक, आशा भोसले ने हर बदलते समय के साथ खुद को इस तरह ढाला कि उनकी आवाज कभी पुरानी नहीं लगी।
पिता दीनानाथ मंगेशकर ( In Photo) से मिले संगीत के संस्कार ने बचपन से ही उनकी राह तय कर दी थी।
लता मंगेशकर जैसी महान गायिका की मौजूदगी में अपनी अलग पहचान बनाना लगभग असंभव माना जाता था।
‘पंचम दा’ यानि भारतीय सिनेमा के महान संगीतकार राहुल देव बर्मन (R. D. Burman)। आशा और बर्मन की जुगलबंदी ने हिंदी फिल्म संगीत को आधुनिकता और प्रयोगधर्मिता का नया आयाम दिया।
जहां कई पुराने कलाकार नए संगीत से दूरी बना लेते हैं। वहीं,आशा भोसले ने हर बदलाव को खुले दिल से स्वीकार किया।
आशा भोसले (Asha Bhosle) का जाना एक शारीरिक विदाई है। उनकी आवाज आज भी जिंदा है।