ऋषभ जैन,टीकमगढ़/भोपाल।
मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय (PHQ) के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद टीकमगढ़ के बड़ागांव थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी समेत पांच पुलिसकर्मी करीब डेढ़ वर्ष तक थानों में ड्यूटी करते रहे। मामला तब फिर सुर्खियों में आया, जब न्यायालय ने आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए। अब सवाल यह उठ रहा है कि अदालत के संज्ञान लेने और एफआईआर दर्ज होने के बाद भी इन पुलिसकर्मियों के विरुद्ध विभागीय स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जनवरी 2025 में कोर्ट ने लिया था संज्ञान

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 11 जनवरी 2025 को तत्कालीन थाना प्रभारी संतोष चौरसिया, तत्कालीन उपनिरीक्षक राजवीर यादव, आरक्षक धर्मेंद्र, मनोज अहिरवार और वर्षा यादव के विरुद्ध धारा 323/34 के तहत संज्ञान लिया था। मामला 181 हेल्पलाइन शिकायत वापस नहीं लेने पर एक 66 वर्षीय बुजुर्ग और उसके परिजनों से कथित मारपीट से जुड़ा है।
कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई एफआईआर


अदालत के संज्ञान के बाद RCT/129/2025 के आधार पर संबंधित थाने में धारा 323, 34 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। इसके बावजूद सभी आरोपी पुलिसकर्मी विभिन्न थानों में अपनी नियमित सेवाएं देते रहे।
अब जारी हुए गिरफ्तारी वारंट
मामले में अब न्यायालय ने आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए हैं। अधिवक्ता जतिन कालरा के मुताबिक,इनमें तीन आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी व दो के विरुद्ध जमानती वारंट जारी हैं। इनमें से एक ने स्थगनादेश हासिल करने याचिका भी दायर की है।
वारंट जारी होने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है और पुलिस मुख्यालय के उन निर्देशों पर सवाल उठ रहे हैं, जिनमें अदालत द्वारा संज्ञान लेने या गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी पुलिसकर्मियों के संबंध में आवश्यक विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
PHQ के निर्देशों पर उठे सवाल

पुलिस मुख्यालय समय-समय पर ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करता रहा है कि गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायालय द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाए। ऐसे में सवाल यह है कि जनवरी 2025 में अदालत के संज्ञान, एफआईआर दर्ज होने और अब वारंट जारी होने के बावजूद आरोपी पुलिसकर्मी लंबे समय तक थानों में पदस्थ कैसे बने रहे?
प्रशासन से कार्रवाई की मांग
स्थानीय स्तर पर अब यह मांग उठ रही है कि पूरे मामले में पुलिस मुख्यालय और जिला पुलिस प्रशासन तथ्यात्मक जांच कर यह स्पष्ट करे कि न्यायालय के आदेशों के बावजूद आरोपियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई और वे अब तक सेवा में कैसे बने रहे।