Bhopal: फेंसिंग विवाद के बीच वेस्टर्न बायपास को मंजूरी
भोपाल वेस्टर्न बायपास को एम्पावर्ड कमेटी की मंजूरी मिल गई है, लेकिन प्रस्तावित मार्ग के पास राजस्व भूमि पर वन विभाग की फेंसिंग विवादों में घिर गई है। मामला अदालत तक पहुंच चुका है। हालांकि,विभाग का दावा है कि नई फेंसिंग का वेस्टर्न बायपास से कोई संबंध नहीं है।
राजधानी भोपाल के लिए प्रस्तावित वेस्टर्न बायपास परियोजना को प्रशासनिक स्तर पर बड़ी मंजूरी मिल गई है, लेकिन इसके साथ ही एक नया विवाद भी सामने आ गया है। मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता वाली एम्पावर्ड कमेटी ने 35.61 किलोमीटर लंबे वेस्टर्न बायपास को मंजूरी दे दी है। अब प्रस्ताव कैबिनेट के समक्ष जाएगा। दूसरी ओर, प्रस्तावित मार्ग के समीप वन विभाग द्वारा खड़ी की गई फेंसिंग को लेकर कानूनी और प्रशासनिक सवाल उठने लगे हैं।
बायपास से पहले सीमा विवाद
सूत्रों के अनुसार, केरवा बीट क्षेत्र में वन विभाग ने करीब साढ़े चार किलोमीटर लंबाई में लगभग 13 फीट ऊंची फेंसिंग खड़ी की है। विवाद इस बात को लेकर है कि जिस भूमि पर यह फेंसिंग लगाई गई है, वह फिलहाल राजस्व विभाग के अधीन बताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई का विरोध शुरू हो गया है और चार प्रभावित पक्षों ने न्यायालय की शरण ली है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ स्थानों पर पहले से मौजूद निजी सुरक्षा दीवारों का उपयोग करते हुए नई फेंसिंग खड़ी कर दी गई, जिससे भूमि स्वामित्व और अधिकारों को लेकर सवाल पैदा हो गए हैं।
सुरक्षा या भूमि पर दावा?
केरवा वन बीट के रेंजर शिवपाल पिपरादे (In Photo) का तर्क है कि यह कदम वन्य प्राणियों और स्थानीय रहवासियों दोनों की सुरक्षा के लिए उठाया गया है। पिपरादे ने कहा कि राजस्व भूमि के वन विभाग को हस्तांतरण की प्रक्रिया जारी है और सुरक्षा के मामलों में केवल निजी दीवारों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।
उधर, डीएफओ लोकप्रिय भारती ने कहा कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने रेंजर कार्यालय से तथ्यात्मक जानकारी तलब की है।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि प्रस्तावित बायपास के सामने आते ही फेंसिंग का निर्माण शुरू होना कई सवाल खड़े करता है।
उनका आरोप है कि वन विभाग लंबे समय से इस क्षेत्र की भूमि को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रहा था।
वन्य प्राणियों की सुरक्षा पर भी बहस
फेंसिंग को लेकर सिर्फ भूमि विवाद ही नहीं, बल्कि वन्य प्राणियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंताएं सामने आई हैं। क्षेत्र में पहले से तारबाड़ और स्टोन वॉल मौजूद है।
नई फेंसिंग के बाद तीन स्तरीय अवरोध तैयार हो गया है।
जानकारों का मानना है कि यदि कोई वन्य प्राणी इन अवरोधों के बीच फंस जाए तो उसके लिए बाहर निकलना मुश्किल हो सकता है।
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि केरवा बीट बाघ या अन्य वन्य प्राणियों का स्थायी रहवास क्षेत्र नहीं है, बल्कि यहां उनकी कभी-कभार आवाजाही होती रही है।
ऐसे में नई फेंसिंग की आवश्यकता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठ रहे हैं।
41 से घटकर 35.61 किमी हुआ बायपास
इधर, एम्पावर्ड कमेटी ने परियोजना में संशोधन करते हुए बायपास की लंबाई करीब पांच किलोमीटर कम कर दी है। पहले इसकी लंबाई लगभग 41 किलोमीटर प्रस्तावित थी, जिसे घटाकर 35.61 किलोमीटर कर दिया गया है।
वेस्टर्न बायपास मंडीदीप के पास भोपाल-नर्मदापुरम मार्ग से शुरू होकर कोलार और रातीबड़ होते हुए इंदौर मार्ग पर फंदा कला के पास जुड़ेगा।
इसके निर्माण के बाद जबलपुर और नर्मदापुरम दिशा से आने वाला ट्रैफिक शहर में प्रवेश किए बिना सीधे इंदौर रोड तक पहुंच सकेगा।
एक घंटे का समय बचेगा
परियोजना के पूरा होने पर वाहन चालकों का लगभग एक घंटा समय और करीब 23 किलोमीटर की दूरी बचने का अनुमान है। करीब 2900 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस मार्ग का निर्माण हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल पर किया जाएगा।
दस लेन की क्षमता वाला कॉरिडोर
परियोजना को भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए दस लेन की क्षमता के अनुरूप डिजाइन किया गया है। इसमें छह लेन के स्ट्रक्चर पर प्रारंभिक चार लेन सड़क बनाई जाएगी। दोनों ओर दो-दो लेन की सर्विस रोड भी रहेंगी। मार्ग में एक रेलवे ओवरब्रिज, दो फ्लाईओवर, 15 अंडरपास और दो बड़े जंक्शन प्रस्तावित हैं।
अब बायपास परियोजना कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार कर रही है, जबकि दूसरी ओर फेंसिंग विवाद अदालत और प्रशासनिक जांच के केंद्र में आ चुका है। ऐसे में राजधानी के इस महत्वाकांक्षी यातायात प्रोजेक्ट की राह फिलहाल विकास और विवाद, दोनों के बीच से गुजरती नजर आ रही है।
“फेंसिंग एरिया वेस्टर्न बायपास का हिस्सा नहीं”
खबर प्रकाशित होने के बाद केरवा बीट के रेंजर शिवपाल पिपरादे ने स्पष्ट किया कि चंदनपुरा क्षेत्र में की गई फेंसिंग का प्रस्तावित वेस्टर्न बायपास परियोजना से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने बताया कि यह फेंसिंग चंदनपुरा की सीमा पर वन्य प्राणियों की आवाजाही को नियंत्रित करने और उन्हें रिहायशी क्षेत्रों में प्रवेश से रोकने के उद्देश्य से लगाई गई है।
रेंजर पिपरादे के अनुसार, जिस क्षेत्र में फेंसिंग की गई है वह वास्तविक रूप से वन क्षेत्र है। हालांकि, उपलब्ध सरकारी अभिलेखों में संबंधित भूमि अभी राजस्व विभाग के अधीन दर्ज है, जिसे लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है।