माता की आराधना में डूबे धमतरी के श्रद्धालु,जिपं सदस्य बाबर ने मां विंध्यवासिनी देवी में प्रज्ज्वलित किए दीप

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धमतरी। समूचे छत्तीसगढ़ में चैत्र नवरात्र पर्व पूरे श्रद्धाभाव से मनाया जा रहा है। सूबे के धमतरी नगर में भी श्रद्धालु जन माता की आराधना में डूबे हुए हैं। शहर के दुर्गा मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है।

शहर के एक छोर पर स्थित मां विंध्यवासिनी मंदिर में भी श्रद्धालु मां भगवती की पूजा-अर्चना करने बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। जिला पंचायत सदस्य सुश्री कविता बाबर एवं उनके परिवार की अन्य सदस्य महिलाओं ने मां विंध्यवासिनी मंदिर पहुंचकर दीप प्रज्ज्वलित किए एवं भगवती की पूजा-अर्चना कर प्रदेश की खुशहाली की कामना की।

अनेक देवी भक्त प्रज्वलित कराते हैं जोत
जंगलों के बीच धरती से निकली मां विंध्यवासिनी देवी की ख्याति बिलाई माता के रूप में है। शहर के अंतिम छोर पर दक्षिण दिशा में स्थित मंदिर में चैत्र और क्वांर नवरात्र में देश-विदेश में रहने वाले देवी भक्त जोत प्रज्वलित कराते हैं।

मंदिर का इतिहास


माता की उत्पत्ति के संबंध में मार्कण्डेय पुराण देवीमाहा 11/42 में उल्लेख है। मंदिर के संदर्भ में दो जनश्रुति प्रचलित है। पहली जनश्रुति के अनुसार मूर्ति की उत्पत्ति धमतरी के गोड़ नरेश धुरूवा के काल की है और दूसरी है कि कांकेर नरेश के शासनकाल में उनके मांडलिक के समय की है। जहां देवी का मंदिर है, वहां कभी घना जंगल था।

— और वहां से जल की धारा फूट पड़ी
जंगल भ्रमण के दौरान राजा के घोड़ों ने एक स्थान से आगे बढ़ना छोड़ दिया। खोजबीन करने पर राजा को एक छोटे पत्थर के दोनों तरफ जंगली बिल्लियां बैठी दिखाई दीं, जो अत्यंत डरावनी थीं। राजा के आदेश पर पत्थर को निकालने का प्रयास किया गया, लेकिन पत्थर बाहर आने के बजाय वहां से जल की धारा फूट पड़ी। इसके बाद राजा को स्वप्न में देवी ने कहा कि उन्हें वहां से निकालने का प्रयास व्यर्थ है। उसी स्थान पर पूजा-अर्चना की जाए।

राजा ने वहीं पर देवी की स्थापना करवाई।
कालांतर में इसे मंदिर का स्वरूप प्रदान किया गया। प्रतिष्ठा के बाद देवी की मूर्ति स्वयं ऊपर उठीं और आज की स्थिति में आई। पहले निर्मित द्वार से सीधे देवी के दर्शन होते थे। उस समय मूर्ति पूर्ण रूप से बाहर नहीं आई थी, किंतु जब पूर्ण रूप से मूर्ति बाहर आई तो चेहरा द्वार के बिल्कुल सामने नहीं आ पाया, थोड़ा तिरछा रह गया।

प्रदेश की पांच शक्तिपीठों में से एक
मां विंध्यवासिनी देवी की मूर्ति काली है। उन्हें विंध्यवासिनी देवी और छत्तीसगढ़ी में बिलाई माता कहा जाने लगा। इस मंदिर को प्रदेश की पांच शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है।