नई दिल्ली/भोपाल।
केंद्र सरकार ने कपास के आयात पर सीमा शुल्क में छूट की अवधि बढ़ा दी है।
अब यह राहत 31 दिसंबर 2026 तक मिलेगी।
इससे मध्य प्रदेश समेत देश की कपड़ा और कताई इकाइयों को फायदा हो सकता है।
सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता बढ़ाना है।
साथ ही, कपड़ा उद्योग की उत्पादन लागत कम करने की कोशिश है।
वित्त मंत्रालय ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की है।
हालांकि, इस फैसले का असर कपास उत्पादक किसानों पर भी पड़ सकता है।
खासकर निमाड़ और मालवा के किसानों की नजर अब बाजार की कीमतों पर रहेगी।
कपास आयात पर 11 प्रतिशत शुल्क से राहत
केंद्र सरकार ने कपास के आयात पर लागू सीमा शुल्क और संबंधित शुल्कों से कुल 11 प्रतिशत की राहत देने का फैसला किया था।
यह छूट 1 जून 2026 से लागू हुई थी। पहले इसकी अवधि 31 अक्टूबर तक निर्धारित थी।
अब इसे दो महीने और बढ़ा दिया गया है। इससे आयातकों को दिसंबर के अंत तक राहत मिल सकेगी।
फैसले से विदेशी कपास की खरीद की लागत कम हो सकती है।
इससे कपड़ा निर्माताओं को कच्चा माल जुटाने में मदद मिलेगी।
कमजोर उत्पादन से बढ़ा कपड़ा उद्योग पर दबाव
कपास की कीमतों का सीधा असर कपड़ा उद्योग पर पड़ता है।
कपास महंगी होने पर सूत और कपड़े की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है।
इस साल कपास की उपलब्धता और कीमतों को लेकर उद्योग के सामने चुनौतियां रही हैं।
मौसम की अनियमितता भी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में आयात शुल्क में छूट से उद्योग को राहत मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, वास्तविक फायदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों, रुपये की विनिमय दर और परिवहन लागत पर निर्भर करेगा।
मध्य प्रदेश में 230 कपड़ा और परिधान इकाइयां
मध्य प्रदेश में कपास उत्पादन के साथ कपड़ा और परिधान उद्योग भी महत्वपूर्ण है।
प्रदेश में सूत, कपड़े और रेडीमेड गारमेंट्स से जुड़ी इकाइयां काम कर रही हैं।
उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में प्रदेश में कपड़ा और परिधान निर्माण की स्थिति इस प्रकार थी।
उद्योग की श्रेणी कुल इकाइयां चालू इकाइयां
टेक्सटाइल निर्माण 162 148
परिधान निर्माण 68 67
कुल 230 215
इन इकाइयों के लिए कच्चे माल की नियमित उपलब्धता महत्वपूर्ण है।
कपास की कीमतों में तेजी आने पर उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
प्रदेश में 43 स्पिनिंग इकाइयां
कपड़ा उद्योग की एक महत्वपूर्ण कड़ी स्पिनिंग मिलें हैं। इनमें कपास से सूत तैयार किया जाता है।
उपलब्ध उद्योग संबंधी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में मध्य प्रदेश में स्पिनिंग से जुड़ी 43 फैक्ट्रियां दर्ज थीं। इनमें 42 चालू थीं।
कपास की नियमित आपूर्ति इन इकाइयों के लिए जरूरी है।
स्थानीय स्तर पर पर्याप्त मात्रा या मनचाही गुणवत्ता का कपास नहीं मिलने पर दूसरे राज्यों अथवा विदेशों से खरीद करनी पड़ सकती है।
विशेष रूप से अतिरिक्त लंबे रेशे वाले कपास की जरूरत पूरी करने के लिए आयात महत्वपूर्ण हो सकता है।
इंदौर से पीथमपुर तक फैला टेक्सटाइल कारोबार
मध्य प्रदेश में कपड़ा उद्योग के कई प्रमुख केंद्र हैं। इनमें इंदौर, पीथमपुर, भोपाल, उज्जैन और ग्वालियर शामिल हैं।
मालवा और निमाड़ में कपास उत्पादन होने से इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ जाता है।
प्रदेश में बुनाई, निटिंग और परिधान निर्माण से जुड़ी गतिविधियां भी होती हैं।
आयात शुल्क में छूट से इन क्षेत्रों की इकाइयों को संभावित राहत मिल सकती है।
खासकर उन उद्योगों को फायदा हो सकता है, जिन्हें लगातार बड़ी मात्रा में कपास खरीदना पड़ता है।
निमाड़-मालवा में कहां होता है सबसे ज्यादा कपास उत्पादन?
मध्य प्रदेश देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में शामिल है।
प्रदेश में इसकी खेती मुख्य रूप से निमाड़ और मालवा के क्षेत्रों में होती है।
खरगोन, खंडवा, बड़वानी, बुरहानपुर और धार प्रमुख कपास उत्पादक जिलों में शामिल हैं।
रतलाम और देवास के कुछ हिस्सों में भी कपास की खेती होती है।
कपास किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है।
यही फसल जिनिंग, स्पिनिंग और कपड़ा उद्योग को कच्चा माल उपलब्ध कराती है।
इसलिए कपास की कीमतों में होने वाले बदलाव का असर किसानों से लेकर कपड़ा कारोबारियों तक पड़ता है।
पांच साल में कितना रहा मध्य प्रदेश का कपास उत्पादन?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में कपास उत्पादन में पिछले वर्षों के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
कपास वर्ष उत्पादन
2020-21 13.38 लाख गांठ
2021-22 14.20 लाख गांठ
2022-23 14.33 लाख गांठ
2023-24 18.01 लाख गांठ
2024-25 15.35 लाख गांठ
एक गांठ में 170 किलोग्राम कपास मानी जाती है।
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023-24 में उत्पादन 18.01 लाख गांठ तक पहुंचा था।
इसके बाद 2024-25 में उत्पादन घटकर 15.35 लाख गांठ रह गया।
यह गिरावट कपास की उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
हालांकि, उत्पादन में बदलाव के साथ कीमतों पर मांग, गुणवत्ता और आयात का भी असर पड़ता है।
अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से आता है कपास
भारत में कपास का आयात कई देशों से होता है। इनमें अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं।
विदेशी कपास की मांग उसकी गुणवत्ता, रेशे की लंबाई और कीमत पर निर्भर करती है।
आयात शुल्क में छूट से कुछ किस्मों की खरीद अधिक किफायती हो सकती है।
हालांकि, विदेशी कपास हमेशा घरेलू कपास से सस्ता हो, यह जरूरी नहीं है।
अंतिम लागत में माल ढुलाई, बीमा और विनिमय दर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या कपास किसानों को कम कीमत मिलने का खतरा?
आयात शुल्क में छूट से कपड़ा उद्योग को राहत मिल सकती है। लेकिन घरेलू किसानों के लिए इसके प्रभाव पर भी नजर रखनी होगी।
यदि आयात बढ़ता है और घरेलू बाजार में कपास की उपलब्धता बढ़ जाती है, तो कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में किसानों को अपनी उपज का अपेक्षित मूल्य मिलने में कठिनाई हो सकती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आयात बढ़ने से कीमतें अनिवार्य रूप से गिरेंगी।
वास्तविक असर घरेलू उत्पादन, अंतरराष्ट्रीय बाजार और कपड़ा उद्योग की मांग पर निर्भर करेगा।
किसानों के हितों की रक्षा और उद्योग को उचित कीमत पर कच्चा माल उपलब्ध कराना सरकार के सामने दोहरी चुनौती है।
मध्य प्रदेश पर क्या होगा फैसले का असर?
कपड़ा उद्योग को संभावित फायदे
-आयातित कपास की खरीद लागत कम हो सकती है।
-स्पिनिंग और जिनिंग इकाइयों को कच्चा माल जुटाने में मदद मिल सकती है।
-सूत और कपड़े की उत्पादन लागत पर दबाव कम हो सकता है।
-कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट्स उद्योग को राहत मिल सकती है।
कपास किसानों के सामने संभावित चुनौतियां
-आयात बढ़ने पर घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
-निमाड़ और मालवा के किसानों को बाजार की कीमतों पर नजर रखनी होगी।
-घरेलू कपास की गुणवत्ता और मांग के आधार पर कीमतों में अंतर रह सकता है।
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