नई दिल्ली: दशहरा यानी विजयादशमी को भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हर साल इस अवसर पर देशभर में रावण के पुतले का दहन किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण के वध के बाद उसका अंतिम संस्कार किसने किया था? धार्मिक मान्यताओं और रामचरितमानस में वर्णित प्रसंग के अनुसार, रावण का अंतिम संस्कार उसके छोटे भाई विभीषण ने किया था। हालांकि, इसके लिए भगवान श्रीराम को उन्हें समझाना पड़ा था।
रामायण की यह कथा केवल रावण के अंत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शत्रु के प्रति भी मानवीय कर्तव्य निभाने और मृत्यु के बाद वैर समाप्त करने का संदेश मिलता है।
रावण की मृत्यु के बाद विभीषण ने क्यों किया संकोच?
राम और रावण के बीच लंका में हुए युद्ध के दौरान भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। रावण लंका का शक्तिशाली राजा और विभीषण का बड़ा भाई था। हालांकि, विभीषण ने अधर्म का साथ देने के बजाय भगवान राम का पक्ष लिया था।
रावण की मृत्यु के बाद विभीषण के सामने अपने बड़े भाई का अंतिम संस्कार करने का सवाल आया। वह अपने भाई की मृत्यु से दुखी थे और इस जिम्मेदारी को निभाने में संकोच कर रहे थे।
रामचरितमानस में वर्णित प्रसंग के अनुसार, विभीषण की इस स्थिति को देखते हुए भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण को उनके पास भेजा। लक्ष्मण ने विभीषण को समझाया कि उन्हें शोक से बाहर निकलकर अपने भाई की अंत्येष्टि करनी चाहिए।
इसके बाद विभीषण भगवान राम के पास लौटे। श्रीराम ने भी उन्हें शोक त्यागकर उचित विधि से रावण का अंतिम संस्कार करने के लिए कहा।
भगवान राम ने शत्रु के अंतिम संस्कार का क्यों दिया संदेश?
रावण भगवान श्रीराम का विरोधी था और उसने माता सीता का हरण किया था। इसके बावजूद रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम ने उसके अंतिम संस्कार को आवश्यक बताया।
इस प्रसंग को इस संदेश से जोड़कर देखा जाता है कि किसी व्यक्ति के साथ शत्रुता होने पर भी मृत्यु के बाद उसके प्रति मानवीय कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
रामायण की परंपरा में भगवान श्रीराम को मर्यादा, न्याय और धर्म का प्रतीक माना जाता है। रावण के अंतिम संस्कार से जुड़ा प्रसंग भी इसी दृष्टिकोण को सामने लाता है कि व्यक्तिगत विरोध और कर्तव्य के बीच अंतर समझना जरूरी है।
रावण के अंतिम संस्कार के बाद विभीषण बने लंका के राजा
धार्मिक कथा के अनुसार, रावण का अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद लंका के शासन की जिम्मेदारी विभीषण को सौंपी गई। भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण और वानर सेना के प्रमुख योद्धाओं को विभीषण के राजतिलक की व्यवस्था करने के लिए भेजा।
इस प्रसंग में भगवान राम ने अपने पिता के वचन का पालन करने का भी उल्लेख किया। इसी कारण उन्होंने स्वयं लंका में प्रवेश करने के बजाय अपने प्रतिनिधियों को राजतिलक के लिए भेजा।
विभीषण का राज्याभिषेक रामायण की कथा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इसके साथ लंका में रावण का शासन समाप्त हुआ और विभीषण के नेतृत्व में नए शासन की शुरुआत हुई।
रावण की मृत्यु का रहस्य विभीषण ने ही बताया था
रामायण की प्रचलित कथा के अनुसार, युद्ध के दौरान रावण को पराजित करना भगवान श्रीराम के लिए आसान नहीं था। रावण शक्तिशाली योद्धा था और उसके पास अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे।
ऐसी मान्यता है कि विभीषण ने भगवान राम को रावण की नाभि में अमृत कुंड होने का रहस्य बताया था। इसके बाद भगवान राम ने रावण की नाभि को निशाना बनाकर उसका वध किया।
इस तरह विभीषण ने युद्ध में भगवान राम की सहायता की और रावण की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी निभाई।
दशहरे पर क्या मिलता है इस कथा से संदेश?
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। रावण का वध उसके अहंकार और अधर्म के अंत के रूप में देखा जाता है। वहीं, उसके अंतिम संस्कार की कथा कर्तव्य, करुणा और मानवीय मूल्यों की याद दिलाती है।
यह प्रसंग बताता है कि धर्म का पालन केवल युद्ध में विजय प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। कठिन परिस्थितियों में भी सही कर्तव्य निभाना महत्वपूर्ण है।
दशहरे के अवसर पर रावण दहन के साथ इस कथा को याद करना भी प्रासंगिक है। जहां रावण का अंत अहंकार के पतन का प्रतीक है, वहीं विभीषण द्वारा अपने भाई का अंतिम संस्कार करना कर्तव्य और मानवीय संवेदना का संदेश देता है।