मनुकुमार शाह,सिंगरौली।
बारिश हर साल होती है।
नदियां और नाले भी हर साल उफनते हैं।
फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें और पुलिया हर बारिश में क्यों जवाब दे जाती हैं?
और आखिर हर बार इसकी कीमत ग्रामीणों को ही क्यों चुकानी पड़ती है?
देवसर जनपद की ग्राम पंचायत जियावन में चौराडाड के पास पुलिया टूटने के बाद यही सवाल फिर खड़ा हो गया है।
रामधनी ढाबा के पास बनी पुलिया के ध्वस्त होने से चार गांवों का मुख्य मार्ग से संपर्क प्रभावित हो गया है।
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चार गांवों की राह हुई मुश्किल
पुलिया टूटने से चौराडाड, गैमटिया, भदवारी और अकौरी गांव प्रभावित हुए हैं।
अब ग्रामीणों को वैकल्पिक रास्तों से आना-जाना पड़ रहा है।
लेकिन बारिश के कारण ये रास्ते कीचड़ से भरे हैं।
कहीं फिसलन है तो कहीं पानी भरा हुआ है।
नतीजतन, रोजमर्रा का आवागमन मुश्किल हो गया है।
सबसे अधिक परेशानी बच्चों और मरीजों को हो रही है।
बच्चों का स्कूल जाना भी बना चुनौती
ग्रामीणों के सामने अब केवल आवागमन की समस्या नहीं है।
बच्चों को स्कूल पहुंचाने की भी चिंता है।
उन्हें कीचड़ और फिसलन भरे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है।
ऐसे में अभिभावक किसी हादसे की आशंका से चिंतित हैं।
दूसरी ओर, किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाना भी मुश्किल हो सकता है।
आपात स्थिति में यही समस्या और गंभीर हो जाएगी।
पुलिया का दम निकला, जिम्मेदारी किसकी?
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री मार्ग पर करीब दस वर्ष पहले इस पुलिया का निर्माण कराया गया था।
अब इसके टूटने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं।
क्या निर्माण के समय भविष्य की जरूरतों का सही आकलन किया गया था?
क्या बारिश और बढ़ते जलप्रवाह को ध्यान में रखकर इसका डिजाइन तैयार किया गया था?
यदि इस मार्ग से लगातार भारी वाहनों की आवाजाही होती रही,
तो पुलिया की क्षमता और मजबूती की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
और यदि अतिवृष्टि को ही इसके टूटने का कारण माना जाए,
तब भी यह सवाल बना रहता है कि क्या प्रशासन के पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था थी?
ग्रामीणों को संकट के बीच छोड़ देना किसी भी विकास योजना की सफलता नहीं कहा जा सकता।
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सड़क सिर्फ रास्ता नहीं, जरूरतों की कड़ी है
ग्रामीण क्षेत्र में सड़क सिर्फ आने-जाने का साधन नहीं होती।
यही सड़क बच्चों को स्कूल पहुंचाती है।
यही मरीजों को अस्पताल तक ले जाती है।
इसी रास्ते से लोग बाजार पहुंचते हैं।
सरकारी सेवाओं तक पहुंच भी इसी पर निर्भर करती है।
इसलिए पुलिया का टूटना केवल एक निर्माण ढांचे का नुकसान नहीं है।
इसका सीधा असर चार गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।
पहले रास्ता खोलें, फिर जिम्मेदारी तय करें
प्रशासन के सामने फिलहाल पहली चुनौती सुरक्षित आवागमन बहाल करने की है।
इसके लिए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी है।
लेकिन केवल अस्थायी रास्ता बनाना काफी नहीं होगा।
पुलिया के निर्माण की गुणवत्ता की तकनीकी जांच भी जरूरी है।
इसके डिजाइन और क्षमता की भी समीक्षा होनी चाहिए।
साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि इसका रखरखाव किस स्तर पर और कैसे किया गया।
यदि जांच में निर्माण या रखरखाव में कमी सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
ग्रामीण चाहते हैं स्थायी समाधान
ग्रामीण केवल रास्ता खुलने की मांग नहीं कर रहे हैं।
वे यहां मजबूत और स्थायी पुलिया का निर्माण चाहते हैं।
उनकी यह मांग जायज भी है।
क्योंकि हर बरसात में संपर्क टूटना ग्रामीण विकास की योजनाओं पर सवाल खड़े करता है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पुलिया कब बनेगी।
सवाल यह भी है कि आखिर ग्रामीणों को हर बारिश में ऐसी परेशानी से कब मुक्ति मिलेगी?
और फिर वही बड़ा सवाल—
चार गांवों की राह बंद होने के बाद आखिर विकास की ऐसी तस्वीर कब बदलेगी?
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