MP Election 2023: फिलहाल फुलझड़ी से चलाएं काम

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सत्ता के गलियारे से..रवि अवस्थी ** फिलहाल फुलझड़ी से चलाएं काम
दीपावली व मप्र विधानसभा चुनाव का गहरा नाता है। पांच साल के अंतराल से ही सही,प्रदेशवासियों को राजनीतिक दलों से बड़ी उम्मीद होती है। लेकिन नतीजा हर बार वही,’बम की जगह फुलझड़ी वाला’! अब प्रदेश में बीते 18 सालों से सत्तासीन बीजेपी को ही लीजिए। कर्मचारी वर्ग को उम्मीद थी कि वह पुरानी पेंशन जैसी कोई बड़ी घोषणा का बोनान्जा लाएगी।

धमाकेदार बम तो छोड़िए,कर्मचारियों को टिकली की डिब्बी भी नहीं ​मिली। कुछ वर्गों को तो बीते वर्षों वाले पुराने पटाखे थमा दिए गए। जिनके’धमाके’ की कोई गारंटी नहीं। यही हाल कांग्रेस का। उसे जैसे-जैसे बातें याद आ रही,वह वादों की फुलझड़ी चला रही है। मध्यमवर्गीय का तो कोई पुर्सान-ए-हाल नही। सरकारी योजनाएं हैं भी तो सिर्फ कर्ज वाली। यानी कर्ज लेकर सरकार का और बैंक का पेट भरना जैसे उसकी नियति है।आजाद देश के इन 76 वर्षों में शायद ही किसी सरकार ने इस तबके की सुध ली हो।

**पांडव और गजनी की भी एंट्री
प्रदेश में नई विधानसभा के लिए चुनाव प्रचार शबाब पर है।’शोले’व ‘मेरे अपने’के पात्रों की उपमा से शुरू हुए प्रचार में अब पांडव व धृतराष्ट्र की भी एंट्री हो चुकी है। कांग्रेस अ​ध्यक्ष मल्लिकार्जुन बीजेपी को पांडव बताकर खुद ही फंस गए। पलटवार में कांग्रेस को तत्काल कौरव की संज्ञा मिल गई। इससे पहले धर्म और जाति का तड़का भी लगाने के प्रयास हुए,लेकिन इस चुनाव में अब तक तो यह बेअसर ही नजर आ रहा है। मतदाता ज्यादा समझदार जो ठहरा। विशेषकर युवा पीढ़ी,जो इन चुनावी टोटकों से ज्यादा,नीति और नीयत को परखती है।

** छांछ को भी फूंक रहे हैं प्रत्याशी
मौजूदा विधानसभा चुनाव पिछले आम चुनावों की तुलना में कुछ ज्यादा ही अलग है। बागी पहले भी हुए,लेकिन ऐसी जिद पहली बार देखी जा रही है। मान-मनौव्व्ल व बड़ों की समझाइश के बाद बागी’नीलकंठ’बन ही जाता था। इस बार तो चुनाव के फेर में रिश्ते भी तार-तार हो रहे हैं। जो बागी हैं,वे तो सामने हैं। ज्यादा खतरा उनसे,जिन्हें मौके की तलाश रही। साथ हैं,लेकिन दिल में कुछ और। इसका अहसास पार्टियों को भी है। इसके चलते प्रचार से ज्यादा जोर भितरघातियों को साधने में देना पड़ रहा है। खतरे दोनों ही तरफ कम नहीं। ऐसे में भरोसा’दोनों’को सिर्फ मतदाताओं का है।

**चुनावी पर्व में कई की मौज
लोकतंत्र में चुनाव भी किसी पर्व से कम नहीं। हर तरफ ढोल-ढमाके। गाजे-बाजे पर झूमते,जोश भरते कार्यकर्ता। सबके अपने-अपने लक्ष्य। किसी की निगाह वोट पर तो किसी की’चोट’पर। कई के लिए यह रोजगार का जरिया जो ठहरा। जो नेता कभी अपने जेब से एक रुपया नहीं निकालते थे। वे देर रात तक’गड्डियों’की व्यवस्था में जुटे हैं। राजधानी में ही कुछ जगह वोटर आईडी दिखाओ और पांच सौ रुपए ले जाओ,जैसे इंतजाम हैं। ऐसे में जो अक्सर संदेह के दायरे में रहे वे भी खजांची का काम संभाले हुए हैं। इधर,प्रत्याशी की हालत घोड़े पर सवार उस दूल्हे की तरह,जिसके मुंह में ठूंसा गया पान का बीड़ा उसे चुप रहने और चेहरे पर झूलता सेहरा उसे सिर्फ लक्ष्य पर निगाह रखने को मजबूर कर रहा है।

** थमाया खाली गुलदस्ता
शादी समारोह में बेनामी खाली लिफाफा व पुराने गुलदस्ते थमाने के किस्से तो आमतौर पर सुने जाते हैं। लेकिन कोई कार्यकर्ता अपनी पार्टी की शीर्षस्थ नेता को ही सार्वजनिक मंच पर खाली गुलदस्ता थमा दे तो उसकी’नेतागिरी’को दाद दी जानी चाहिए। इंदौर में देवेंद्र यादव नामक कांग्रेस कार्यकर्ता ने ऐसा ही किया। उन्होंने प्रियंका गांधी का खाली गुलदस्ता थमाया तो प्रियंका भी देवेंद्र की’समझदारी’पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सकीं। वह भी समझ गईं कि यह’मंझा’हुआ कार्यकर्ता है। बहरहाल,मामला सार्वजनिक हो चुका था,लिहाजा प्रियंका ने अपने भाषण में इस प्रसंग का हवाला तो दिया लेकिन निशाना बीजेपी पर लगाया।

** तो दावा गलत भी नहीं
मामला मप्र का तो नहीं लेकिन इसकी सहभागिता इसमें जरूर है।आयकर विभाग के मुताबिक,पहली बार देशभर में नेट डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 22 प्रतिशत बढ़कर 10.60 लाख करोड़ रुपये रहा। यह लक्ष्य से 58 प्रतिशत से अधिक है। यही नहीं,बीते 8 माह में 1.77 लाख करोड़ रुपए करदाताओं को वापस मिले। आर्थिक जानकारों का मानना है कि केंद्र को अगले वित्त वर्ष में कर से ही 1.9 खरब रुपये मिलेंगे। यह रकम देश की कुल जीडीपी का 0.6 प्रतिशत होगी। अब पीएम मोदी यदि,अगले 5 साल में देश को दुनिया की तीसरी आर्थिक शक्ति बनाने का दावा करते हैं तो इसमें हैरत नहीं होना चाहिए। आजादी के 76 साल बाद कर वसूली में बढ़ोत्तरी यानी चोरी पर रोक एक बड़ी उपलब्धि है।

** ऐसी भी क्या जल्दी?
कहते हैं,राजनीति में उम्र से ज्यादा अनुभव मायने रखता है। अब कांग्रेस के युवा नेता व सांसद नकुलनाथ को ही लीजिए। वह अब अपने नए बयान को लेकर चर्चा में है। इस बार उन्होंने मतदाताओं से मप्र की भावी आईपीएल टीम के लिए खिलाड़ियों के नाम सुझाने की अपील कर डाली। इससे पहले वह अपने पिता के मुख्यमंत्री पद की शपथ समारोह की तिथि बताकर व इसके लिए लोगों को आमंत्रित कर चर्चा में रहे।अब विरोधियों को तो मौका चाहिए। नकुल की जल्दबाजी ने उनके साथ ही अन्य नेता पुत्रों व उनके बुजुर्गों को भी बीजेपी के निशाने पर ला दिया।

** अखिलेश की परेशानी
उप्र में मिली निराशा के बाद मप्र में अपनी जमीन तलाश रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। गठबंधन के सहारे मप्र की आधा दर्जन सीटों पर पार्टी के दिन बहुरने की उम्मीद लगाए अखिलेश को ऐन वक्त पर मिले धोखे से गहरी चोट लगी। इसके चलते वह चुनावी सभाओं में पानी पी-पीकर कांग्रेस की नीति को कोस रहे हैं। यही नहीं,उन्होंने उप्र में ‘निपटने’तक की चेतावनी दे डाली। इधर,सपा के प्रत्याशियों का आलम यह,कि दो ने तो ऐन चुनाव के बीच दूसरे दलों का दामन थाम लिया। जो डटे हैं,वे पार्टी से बड़ा चुनावी फंड मिलने की उम्मीद लगाए हुए हैं।

** उमा ने फिर बदला फैसला
बीजेपी की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं।धैर्य की परीक्षा से गुजर रहीं उमा को पहले तो स्टार प्रचारकों की सूची में जगह नहीं मिली। जैसे-तैसे प्रचार का जिम्मा मिला तो प्रोटोकॉल व पैर की मोच आड़े आ गई। नई खबर यही,कि उमा ने आगे प्रचार से तौबा कर ली है। वैसे,अभी भी तीन-चार दिन का वक्त बाकी है।

** यह भी खूब रही
चुनाव नेताओं का लेकिन फजीहत होती है प्रशासनिक अमले की। इनमें भी पुलिस का काम तो कुछ ज्यादा ही कसौटी पर होता है। बड़वानी में सीएम शिवराज सिंह चौहान सभा करने पहुंचे। उनका हेलिकाॅप्टर जैसे ही उतरने लगा,उसकी तेज हवा में वहां लगे बैरिकेड्स उड़ गए और इनका सहारा लेकर खड़े जवान भी जमीन पर पड़े नजर आए।

** बहरहाल,कम लिखा,ज्यादा समझें। शेष शुभ!हैप्पी दीपावली।