अमृत मिशन 1 में केंद्र से पैसा शहरों में साफ हवा,पानी देने मिला,लेकिन सरकार को निजी बस मालिकों की चिंता ज्यादा रही। नतीजा,सूत्र सेवा नाम से अंतर शहरी बसें चलवाईं गईं। वह भी 40 % अनुदान देकर। बदले में मिला धोखा और इंदौर के भागीपुरा कांड जैसा मामला।
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प्रमुख 5 बिंदु
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अमृत मिशन की राशि का उद्देश्य से विचलन,जल-सीवेज छोड़ बस कारोबार को बढ़ावा।
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40% वीजीएफ का खेल,घाटे की पूर्ति के नाम पर निजी ट्रांसपोर्टरों को भारी सब्सिडी।
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बसें कागजों पर चलीं,कई रूट पर संचालन नहीं, बसें बेचकर मुनाफा।
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निगरानी फेल,जुर्माने का अधिकार होते हुए भी कार्रवाई नहीं।
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एक कंपनी को लाभ-इंदौर-भोपाल में चार्टर्ड बस को सबसे ज्यादा अनुबंध।
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रवि अवस्थी,भोपाल।
शहरी नागरिकों को साफ पेयजल और मजबूत सीवेज व्यवस्था देने के लिए शुरू हुआ अमृत मिशन मध्यप्रदेश में अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। मिशन की करोड़ों रुपए की राशि सूत्र परिवहन सेवा के नाम पर निजी बस कारोबारियों को सौंप दी गई।
नतीजा यह हुआ कि कुछ ट्रांसपोर्टर मालामाल हुए और शहरों में रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते रहे। इंदौर का भागीरथपुरा कांड, जहां पानी और सीवेज लाइन साथ बहती रहीं और 24 लोगों की जान गई, इसी व्यवस्था की भयावह विफलता का प्रतीक बन गया।
देशभर के 500 शहरों में लागू अमृत मिशन (पहला चरण) का मकसद जलापूर्ति, सीवेज सुधार, हरियाली बढ़ाना और प्रदूषण घटाने के लिए गैर-मोटर परिवहन को बढ़ावा देना था।
लेकिन मध्यप्रदेश में इस मिशन के भीतर ऐसा प्रयोग कर दिया गया, जिसका न नियमों में उल्लेख था और न ही मूल उद्देश्यों से उसका कोई सीधा संबंध।
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अचानक ‘सूत्र परिवहन’ की एंट्री
नगरीय प्रशासन विभाग ने अमृत मिशन में सूत्र परिवहन सेवा जोड़ने का ड्राफ्ट केंद्र सरकार को भेजा।
इसे ‘हब एंड स्पोक मॉडल’ नाम दिया गया। केंद्रीय मंत्रालय की अपेक्स समिति से मंजूरी मिलते ही योजना प्रदेश के 20 शहरों में लागू कर दी गई। यहीं से मिशन का फोकस पानी-सीवेज से हटकर बस संचालन पर आ गया।

असल खेल: 40% सब्सिडी, नाम दिया वीजीएफ
सूत्रों के मुताबिक, योजना का असली आकर्षण था 40 प्रतिशत वायबिलिटी गैप फंड (VGF)। यानी बस खरीद और संचालन में होने वाले घाटे की भरपाई सरकार करेगी।
इसके लिए अलग-अलग कंपनियां बनाकर ट्रांसपोर्टरों से अनुबंध किए गए। वीजीएफ शब्द को शॉर्ट फॉर्म में इतना गोपनीय रखा गया कि आमतौर पर अनुबंध पढ़ने वाला भी सब्सिडी की पूरी तस्वीर न समझ पाए।
अनुबंध के अनुसार, बस की लागत का 40% वीजीएफ चार समान किस्तों में मिलना था—हर दो साल में 25%-और वह भी तभी, जब बसें तय रूट पर चल रही हों। लेकिन हकीकत इससे उलट निकली।
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बसें चलीं कागजों पर, मुनाफा जमीन पर
जिन रूटों पर बसें चलनी थीं, उनमें से कई पर बसें कभी चली ही नहीं। कई जगह कुछ महीने संचालन के बाद बसें खड़ी कर दी गईं। जैसे ही वीजीएफ की रकम हाथ आई, कई ट्रांसपोर्टरों ने बसें लागत से ज्यादा कीमत पर बेच दीं।
तय रूट पर बस न चलाने पर परिवहन विभाग को ₹1500 प्रतिदिन जुर्माना लगाने का अधिकार था, लेकिन अफसरों ने आंखें मूंदे रखीं।
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एक कंपनी, सबसे ज्यादा फायदा
सूत्र परिवहन सेवा अंततः 8 नगरीय निकायों तक सिमट गई। इंदौर और भोपाल में अहमदाबाद की चार्टर्ड स्पीड प्राइवेट लिमिटेड सबसे बड़ी लाभार्थी बनकर उभरी। इंदौर की एआईसीटीएसएल में 163 और भोपाल की सिटी लिंक के तहत इसी कंपनी की 58 बसें अनुबंधित हुईं।
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विज्ञापन और पास से भी कमाई


















